भभक उठी खिलाफत की आग: क्या ‘वार्ड फॉर्मूला’ लागू कर कमलनाथ ने अपने हाथों, मार ली अपने पैर पर कुल्हाड़ी?

कुछ समय पहले कमलनाथ ने चुनाव को लेकर दावेदारों से एफिडेविट भरवाने का फरमान जारी किया था। जिसके बाद मप्र के कई हिस्सों में कमलनाथ के फैसले के खिलाफ विरोध के स्वर बुलंद हुए।

जबलपुर, 13 जून: बीजेपी जैसे सशक्त राजनीतिक दल की चुनौतियों के सामने मध्यप्रदेश कांग्रेस कितना टिकेगी, यह लाख टके का सवाल है। एक दिन पहले नगरीय निकाय चुनाव को लेकर कांग्रेस की तरफ जारी हुए 'वार्ड फॉर्मूले' ने भी अब पार्टी की किरकिरी कराना शुरू कर दिया है। क्या कमलनाथ ने 'वार्ड फॉर्मूला' लागू कर अपने हाथ से पूरी पार्टी के पैर पर कुल्हाड़ी ली? सोशल मीडिया के जरिए पार्टी के भीतर सुलग रही खिलाफत की आग ने अब इस सवाल को भी जन्म दे दिया है। यह तब जब अभी पार्षद टिकट के लिए माथा-पच्ची जारी है। प्रदेश की 16 में से 15 नगर-निगम के महापौर प्रत्याशियों की जारी हुई सूची के बाद की तस्वीरें भी देखी जा चुकी है कि किस तरह कई जगह पर कांग्रेसी बागी हो गए।

कमलनाथ के ‘वार्ड फ़ॉर्मूला’ की खिलाफत

कमलनाथ के ‘वार्ड फ़ॉर्मूला’ की खिलाफत

कुछ समय पहले कमलनाथ ने चुनाव को लेकर दावेदारों से एफिडेविट भरवाने का फरमान जारी किया था। जिसके बाद मप्र के कई हिस्सों में कमलनाथ के फैसले के खिलाफ विरोध के स्वर बुलंद हुए। बाद में मौके की नजाकत को देखते हुए मप्र कांग्रेस कमेटी को अपना फैसला वापस लेना पड़ा। अब जब चुनाव में नामांकन प्रक्रिया चालू गई और टिकट की फाइनल लिस्ट तैयार होने को है, उससे पहले आग में घी डालने की तरह 'वार्ड फॉर्मूले' को लागू कर दिया गया। जिसका कांग्रेसी सोशल मीडिया पर विरोध करते नजर आ रहे है। जबलपुर में उत्तर मध्य विधानसभा में रहने वाले पार्टी के बूथ प्रबंधन विभाग के प्रदेश सचिव आलोक गुप्ता जमकर भन्नाए हुए है। उन्होंने फेसबुक पर पोस्ट डाली, जिसमें कमलनाथ का नाम तो नहीं लिया, लेकिन उनके हवाले से नए निर्देश की चिट्ठी जारी करने वाले प्रदेश प्रभारी चंद्रप्रभाष शेखर पर हमला बोला है। गुप्ता ने लिखा कि यह तुगलकी आदेश है, पार्टी कार्यकर्ताओं और दावेदारों में विद्रोह फैले उससे पहले चिट्ठी का खंडन किया जाए। उज्जैन से भी अशोक देवड़ा ने फेसबुक पर एक ऐसी ही पोस्ट की है। जबलपुर के आलोक लंबे वक्त से कांग्रेस से जुड़े है। वह सेवा दल में विभिन्न पदों पर भी रहे।

आखिर क्या है ‘वार्ड फॉर्मूला और क्यों लाया गया?

आखिर क्या है ‘वार्ड फॉर्मूला और क्यों लाया गया?

प्रदेश कांग्रेस प्रभारी और उपाध्यक्ष चंद्रप्रभाष शेखर के हस्ताक्षर से जारी हुए पत्र में कहा गया है कि चुनाव लड़ने के इच्छुक पार्टी के दावेदार सिर्फ उसी वार्ड से चुनाव लड़ सकेंगे, जिस वार्ड में उनका निवास स्थान है। एक तरह से उक्त दावेदार शहर के किसी अन्य वार्ड से चुनाव लड़ने अतिक्रमण नहीं कर सकता। इस गणित के पीछे की असली वजह दावेदारों की लंबी फेहरिस्त मानी जा रही है। प्रदेश के भोपाल, इंदौर, जबलपुर, ग्वालियर समेत अन्य बड़े शहरों के नगरीय निकाय में कई ऐसे वार्ड है जहाँ दर्जन भर से ज्यादा लोग चुनाव लड़ने दावेदारी पेश कर रहे है। उनमें से कुछ नाम ऐसे है जिनका उस वार्ड ने निवास स्थान नहीं है, लेकिन वह चुनाव लड़ने के लिए कई महीने पहले से जमीन तैयार कर रहे थे। नए फरमान के बाद दबी जुबान में अब उन दावेदारों का कहना है कि जब मलाई खाने का वक्त आया तो तुगलकी आदेश से उनकी मलाई दूसरों को खिलाई जा रही है।

छोटे दल नया ठिकाना या फिर निर्दलीय

छोटे दल नया ठिकाना या फिर निर्दलीय

इस बार के स्थानीय चुनाव में जनता के सामने सियासत की कसौटी पर खरा उतरना दावेदारों के लिए खुली चुनौती भी है। लिहाजा भाजपा हो या फिर कांग्रेस, टिकट से महरूम रहने वाले कई नेताओं ने अब ही से अपना नया ठिकाना तलाश लिया है। वह फ़ाइनल लिस्ट की राह तक रहे है। उसके बाद वह आम आदमी पार्टी, बसपा, शिवसेना का दामन थामने एक टांग से खड़े है। इस बगावत का यदि सबसे ज्यादा किसी को नुकसान होगा, तो वह कांग्रेस को। क्योकि भाजपा अपने भीतर किसी भी तरह के डेमेज कंट्रोल को साधने की हर कला में निपुण है और कांग्रेस इससे कोसो दूर है। कमलनाथ के नए फॉर्मूले के हिसाब से फिट न बैठने वाले कुछ दावेदार निर्दलीय के रूप में भी नजर आ सकते है।

जब चुनाव आयोग की बंदिश नहीं, तो पार्टी की क्यों?

जब चुनाव आयोग की बंदिश नहीं, तो पार्टी की क्यों?

अब जो नेता पार्टी की नई गाइडलाइन से खफा है, वह चुनाव आयोग के नियम-निर्देशों की दलील दे रहे है। उनका कहना है कि जब आयोग की तरफ से ऐसी कोई ठोस पाबंदी नहीं है, तो फिर पार्टी की ओर से बंदिश क्यों? चुनाव से जुड़े राजनीतिक पंडित भी प्रदेश कांग्रेस के इस फैसले पर चुटकियाँ ले रहे है। उनका कहना है कि जब चुनाव चल रहे है, उस दौरान कमलनाथ ने नया फरमान जारी कर खुद अपने हाथ से अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने का काम किया है। किसी को टिकट देना या नहीं देना, यह पार्टी का विशेषाधिकार है। बेहतर तो यह होता कि पहले की तरह चुनाव चयन समिति के द्वारा प्रत्याशियों की सूची जारी हो। कोई दावेदार यदि अपने निवास स्थान वाले वार्ड को छोड़कर दूसरे वार्ड से दावेदारी जता रहा है तो उसे टिकट देना या नहीं देने का अंतिम निर्णय तो पार्टी की चयन समिति को ही करना है। ऐसे में ताकतवर भाजपा के सामने कांग्रेस अपने ही भीतर बगावत की आग से कही भस्म न हो जाए?

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