Zorawar Tank: जर्मनी ने किया था 'अपमान', अब भारत ने दूसरे दोस्त की मदद से बनाया विनाशक टैंक, जानें ताकत

Zorawar Tank: लद्दाख में चीन के साथ सीमा पर तैनात भारतीय सशस्त्र बलों को एक और विनाशक हथियार सौंपा जाएगा, जिससे भारतीय जवानों की शक्ति और बढ़ जाएगी।

भारत रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) और निजी क्षेत्र की कंपनी लार्सन एंड टुब्रो (L&T) ने 6 जुलाई को स्वदेशी हल्के टैंक, 'जोरावर' (Zorawar Tank) का अनावरण कर दिया है। सबसे खास बात ये है, कि डेडलाइन से 2 साल पहले ही इस विनाशक टैंक का निर्माण कर लिया गया है, जो भारतीय डिफेंस फोर्स के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

drdo tests Zorawar Tank

रिपोर्ट्स के मुताबिक, जोरावर टैंक (Zorawar Tank) ने गुजरात के हजीरा में एलएंडटी के भारी इंजीनियरिंग प्लांट में अपने शुरुआती इंटरनल टेस्ट्स को कामयाबी के साथ पूरा कर लिया है। एलएंडटी के भारी इंजीनियरिंग प्लांट में टेस्ट के दौरान जोरावर लाइट टैंक ने 20 डिग्री के झुकाव को आसानी से पार करने की अपनी क्षमता का प्रदर्शन किया है। टैंक को 30 डिग्री से ज्यादा के झुकाव को संभालने के लिए डिजाइन किया गया है।

अब टेस्टिंग के अगले चरण में इस टैंक को भारतीय सेना को सौंपा जाएगा और रेगिस्तान की कठोर परिस्थितियों में टैंक का परीक्षण किया जाएगा, जिसके बाद चुनौतीपूर्ण इलाकों और अत्यधिक सर्दियों की परिस्थितियों में इसके प्रदर्शन का मूल्यांकन करने के लिए इसे लद्दाख के हाई एल्टीट्यूड वाले क्षेत्रों में टेस्ट के लिए भेजा जाएगा।

यदि प्लान के मुताबिक ही टेस्ट कामयाब होते जाते हैं, तो टैंकों को 2027 की शुरुआत में भारतीय सेना में शामिल किया जा सकता है। इसके अलावा, रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे संघर्ष से सबक सीखते हुए डिजाइन किए गए जोरावर टैंक में मानव रहित सतह वाहन (यूएसवी) शामिल हैं, जो घूमने वाले हथियारों से लैस हैं।

जोरावर टैंक: डिजाइन और क्षमता

25 टन वजनी जोरावर, इतने कम समय में डिजाइन और परीक्षण के लिए तैयार किया गया पहला टैंक है। इस टैंक का नाम 19वीं सदी के डोगरा जनरल जोरावर सिंह के सम्मान में रखा गया है, जो लद्दाख और पश्चिमी तिब्बत में अपने सैन्य अभियानों के लिए जाने जाते थे।

शुरुआत में, भारतीय सेना को 59 जोरावर टैंक दिए जाएंगे, जिससे 295 और एडवांस बख्तरबंद वाहनों को शामिल करने वाले एक बड़े कार्यक्रम के लिए मंच तैयार होगा। माना जा रहा है, कि अगले 12 से 18 महीनों में टैंक को लेकर हर तरह के टेस्ट कर लिए जाएंगे, जिससे भारतीय सेना में उन्हें शामिल करने का रास्ता साफ हो जाएगा।

DRDO प्रमुख डॉ. समीर वी. कामत ने टैंक के कामयाब परीक्षण के बाद कहा, कि "हम सभी के लिए लाइट टैंक को एक्शन में देखना वाकई एक महत्वपूर्ण दिन है। दो से ढाई साल की छोटी अवधि में, हमने न केवल इस टैंक को डिजाइन किया है, बल्कि इसका पहला प्रोटोटाइप भी बना लिया है और अब पहला प्रोटोटाइप अगले छह महीनों में विकास परीक्षणों से गुजरेगा, और फिर हम इसे अपने उपयोगकर्ताओं को उपयोगकर्ता परीक्षणों के लिए पेश करने के लिए तैयार होंगे। जोरावर को सभी परीक्षणों के बाद 2027 तक भारतीय सेना में शामिल किए जाने की उम्मीद है।"

जोरावर टैंक काफी कम वजन वाला टैंक हैं, जिसे खासतौर पर दुर्गम परिस्थितियों में काम करने के लिए डिजाइन किया गया है और ये टैंक जमीन के साथ साथ पानी में भी चल सकता है। जोरावर टैंक, भारी टी-72 टैंक और टी-90 टैंकों की तुलना में खड़ी पहाड़ी चढ़ाई और नदियों और अन्य जल निकायों को ज्यादा कुशलता से पार करने में माहिर है।

माना जा रहा है, कि लद्दाख में दुर्गम पहाड़ियों में इसे ऑपरेट करने के लिए खास तौर पर डिजाइन किया गया है, ताकि पहाड़ी इलाकों में ये दुश्मनों पर आग बरसा सके।

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, तस्वीरों को देखने से पता चलता है, कि नए टैंक में कई प्रमुख विशेषताएं हो सकती हैं। ये टैंक 105-एमएम राइफल गन और मल्टी-रेंजिंग सेंसर (MRS) से लैस प्रतीत होता है। इसमें एक बीईएल रिमोट वेपन स्टेशन (RWS) और सफ्रान पासेओ ऑप्टिक्स के साथ-साथ दो एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल (ATGMs) भी शामिल हैं। टैंक में एक नई लाइट वेट राइफल (LWR), एक एक्टिव प्रोटेक्शन सिस्टम (APS) और ऐड-ऑन मॉड्यूलर आर्मर ब्लॉक के ऑप्शन भी हैं। यह बेहतर कार्यक्षमता के लिए कम्पोजिट रबर ट्रैक्स (CRT) और अतिरिक्त कैमरों से सुसज्जित है।

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जोरावर टैंक बनाने में अमेरिका ने की है मदद

जोरावर टैंक को सेना की प्रोजेक्ट-जोरावर के तहत विकसित किया गया है, जिसका मकसद उच्च ऊंचाई वाले क्षेत्रों में स्वदेशी हल्के टैंकों की तेजी से तैनाती हो सके। सेना ने अपनी पर्वतीय युद्ध क्षमताओं को मजबूत करने के लिए लगभग छह रेजिमेंटों का गठन करते हुए कुछ चरणों में लगभग 350 हल्के टैंक हासिल करने की योजना बनाई है।

लद्दाख में चीन के साथ संघर्ष के दौरान, सेना ने अपने भारी टी-90 और टी-72 टैंकों के साथ-साथ पैदल सेना के लड़ाकू वाहनों को भी तैनात किया था। रूसी मूल के इन टैंकों का वजन 40 से 50 टन के बीच है, जबकि अर्जुन टैंक का वजन 68.5 टन है। ये भारी टैंक पर्वतीय युद्ध के लिए उपयुक्त नहीं हैं, फिर भी भारत ने इन्हें चीन को रोकने के लिए तैनात किया हुआ है। लिहाजा भारत की कोशिश हल्के टैंकों का निर्माण करना था और इसीलिए प्रोजेक्ट जोरावर को लॉंच किया गया था।

जोरावर के लिए इंडियन आर्मी ने जो आयाम बनाया था, उसके मुताबिक ही ये हवा, सड़क या पानी से परिवहन की सुविधा प्रदान करते हैं और आर्मी की डिमांड थी, कि ये टैंक सभी मौसम की स्थिति में काम करने में सक्षम होना चाहिए।

दिलचस्प बात यह है, कि जोरावर में अमेरिकी इंजन लगा है। शुरुआत में, इसे MTU जर्मनी से जर्मन इंजन का उपयोग करने के लिए तैयार किया गया था, लेकिन जर्मन सरकार ने धोखा देते हुए एन वक्त तक निर्यात लाइसेंस वापस ले लिया, जिसकी वजह से टैंक के निर्माण में कम से कम एक साल की देरी हो गई।

जर्मनी की धोखेबाजी के बाद DRDO ने प्रोटोटाइप स्टेज के लिए अमेरिकी कमिंस इंजन का विकल्प चुना। बाद में जाकर फिर से जर्मनी ने मंजूरी दे दी, लेकिन इस बार DRDO ने जर्मन इंजन खरीदने से इनकार कर दिया। और अमेरिका में निर्मित कमिंस 750 hp इंजन को चुना।

ये दूसरी बार था, जब जर्मनी ने भारत को धोखा दिया था। इससे पहले अर्जुन Mark 1A टैंक प्रोजेक्ट के दौरान भी जर्मनी ने इंजन देने से मना कर दिया था और भारत के इस प्रोजेक्ट में देरी हो गई थी।

लेकिन अमेरिका एक विश्वसनीय भागीदार साबित हुआ है, जिसके कारण भारतीय रक्षा अधिकारियों ने जोरावर लाइट टैंक प्रोजेक्ट के लिए अमेरिकी कमिंस इंजन का उपयोग करने के लिए प्रतिबद्धता जताई है। जोरावर के अलावा, भारत लद्दाख के चुनौतीपूर्ण उच्च-ऊंचाई वाले इलाकों और शुष्क रेगिस्तानी क्षेत्रों में अमेरिका निर्मित स्ट्राइकर बख्तरबंद पैदल सेना के लड़ाकू वाहनों की टेस्ट करने की भी तैयारी कर रहा है। यह पहल भारतीय सेना की अपनी लड़ाकू क्षमताओं को आधुनिक बनाने और अपने पुराने रूसी मूल के BMP-2 वाहनों को बदलने की व्यापक रणनीति का हिस्सा है।

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