शी जिनपिंग का फेवरिट प्रोजेक्ट BRI पैदा कर सकता है चीन और भारत के संबंधों में तनाव!
पिछले दिनों चीन में संविधान प्रस्ताव को पास करके यहां पर राष्ट्रपति शी जिनपिंग के लिए आजीवन शासन करने का रास्ता खुल गया है। लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग का महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट बेल्ट एंड इनीशिएटिव (बीआरआई) भारत के लिए चीन के साथ संबंधों में बड़ा रोड़ा बन सकता है।
बीजिंग। पिछले दिनों चीन में संविधान प्रस्ताव को पास करके यहां पर राष्ट्रपति शी जिनपिंग के लिए आजीवन शासन करने का रास्ता खुल गया है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के लिए यह एक बड़ी चुनौती है। विशेषज्ञ कहते हैं कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग का महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट बेल्ट एंड इनीशिएटिव (बीआरआई) भारत के लिए चीन के साथ संबंधों में बड़ा रोड़ा बन सकता है। जिनपिंग ने साल 2013 में इस प्रोजेक्ट को लॉन्च किया था और साल 2012 में उन्होंने पहली बार चीन की सत्ता संभाली थी। जिनपिंग का यह प्रोजेक्ट कई बिलियन डॉलर का है और यह पीओके से होकर गुजरता है। बीआरआई, चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (सीपैक) का हिस्सा है।

भारत करता है जिनपिंग बीआरआई के प्रोजेक्ट का विरोध
भारत हमेशा से ही इस प्रोजेक्ट का विरोध करता आया है और उसकी वजह से इसका पीओके से होकर गुजरना है। भारत ने पिछले वर्ष चीन की ओर से आयोजित बेल्ट एंड रोड फोरम का भी बायकॉट किया था। चीन के प्रभाव को पूरी दुनिया में फैलाने के लिए जिनपिंग ने रोड, पोर्ट और रेल नेटवर्क बिछाने के मकसद से बीआरआई प्रोजेक्ट को लॉन्च किया था। आपको बता दें कि 11 मार्च को चीन की नेशनल पीपुल्स कांग्रेस (एनपीसी) की ओर से राष्ट्रपति के लिए दो वर्षों तक की कार्यकाल सीमा को खत्म कर दिया गया है। इसके बाद जिनपिंग के लिए चीन पर आजीवन शासन करने के रास्ते खुल गए हैं और माना जा रहा है कि अब वह इस प्रोजेक्ट पर पूरा ध्यान देंगे।

दोनों देशों के सुधरते संबंधों के बीच चीन का अहम फैसला
चीन में एनपीसी ने यह ऐतिहासिक फैसला उस समय लिया है जब सीपैक और 73 दिनों तक चले डोकलाम विवाद के बाद भारत-चीन दोबारा अपने रिश्ते ठीक करने की तरफ बढ़ रहे हैं। रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण अगले महीने चीन की यात्रा पर जाएंगे, जिसे अधिकारी दोनों देशों के रिश्ते सुधरने की दिशा में अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए सख्त संदेश मान रहे हैं। ऑफिशियल चाइना इंस्टीट्यूटऑफ कॉन्टेम्पररी इंटरनेशनल रिलेशंस के डायरेक्टर हू शिशेंग कहते हैं कि दोनों देशों की तरफ से संबंधों को सुधारने के लिए गंभीर प्रयास किए जा रहे हैं और चीन के लिए इस क्षेत्र में भारत के साथ संबंधों का बहुत महत्व है। उन्होंने कहा कि दोनों देशों को डोकलाम के अलावा जैश सरगना मसूद अजहर को आतंकी घोषित करने, न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप में भारत की एंट्री जैसे मुद्दों पर मतभेदों को दूर करना है, ऐसे में उन्हें बीआरआई को लेकर मौजूद मतभेदों को दूर करने के लिए कुछ समाधान खोजना चाहिए।

चीन ने दिया कश्मीर मुद्दे पर असर न पड़ने का भरोसा
हू के मुताबिक अब शी का लंबे समय तक राष्ट्रपति रहना तय है और वह बीआरआई को बेहद गंभीरता से लेंगे, क्योंकि यह उनका प्रोजेक्ट है। चीन लगातार यह कहता है आ रहा है कि बीआरआई का कश्मीर को लेकर उसके रुख पर कोई असर नहीं पड़ेगा और इस मुद्दे को भारत-पाकिस्तान को सुलझाना चाहिए। चीन ने भारत की आपत्तियों को दूर करने के लिए सीपैक का नाम बदलने तक का प्रस्ताव दिया है। अधिकारियों का कहना है कि भारत में चीन की तरफ से होने वाले निवेश पर असर पड़ा है क्योंकि हाल के सालों में चीन अपना सारा बाहरी निवेश सिर्फ बीआरआई के तहत कर रहा है।

दोनों देशों को सबक लेने की जरूरत
भारत, बीसीआईएम यानी बांग्लादेश, चाइना, इंडिया, म्यांमार कॉरिडोर का भी हिस्सा है, जिसमें बहुत कम प्रगति देखने को मिली है। अधिकारियों की माने तो साल 2015 में जब जिनपिंग भारत आए थे तो उन्होंने 20 अरब डॉलर निवेश का वादा किया था लेकिन अभी तक यह सिर्फ 3.5 अरब डॉलर ही है। हू कहते हैं कि दोनों देशों को लचीला रुख अपनाना होगा। जहां एक तरफ चीन को भारत के ऊपर निवेश पाने के लिए बीआरआई का हिस्सा बनने का दबाव नहीं डालना चाहिए तो वहीं, भारत को भी इसी तरह का रवैया अपनाना चाहिए। चीनी विदेश मंत्रालय से मान्यता प्राप्त चाइना इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के वाइस प्रेसीडेंट रॉन्ग यिंग की मानें तो दोनों देशों को विश्वास की कमी दूर करने की जरूरत है। उन्होंने हालांकि यह भी कहा कि शी के लंबे कार्यकाल से डरने की कोई जरूरत नहीं, बस दोनों देशों को डोकलाम विवाद से सही सबक लेने की जरूरत है। तभी हम एक स्थायी रिश्ते के लिए काम कर सकते हैं।












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