इंडोनेशिया के इस फ़ैसले से क्या वाक़ई भारत की परेशानी बढ़ेगी
पाम तेल पर इंडोनेशिया के प्रतिबंध से भारत के लिए भी मुश्किल स्थिति हो सकती है.
ख़ास कर वैसे वक़्त में जब रूस और यूक्रेन की जंग के चलते महंगाई की आग पहले से भड़की हुई है.
भारत के लिए मुसीबत कुछ ज़्यादा ही बड़ी है. मुसीबत इसलिए भी है कि यह खाने के तेल का दुनिया का सबसे बड़ा उपभोक्ता है.
भारत में हर साल 2.5 करोड़ टन खाने का तेल इस्तेमाल होता है, लेकिन घरेलू उत्पादन सिर्फ 1.11 करोड़ टन ही है. मांग और आपूर्ति का फ़ासला क़रीब 56 फ़ीसदी का है. इस कमी को आयात के ज़रिए पाटा जाता है.
भारत बाहर से जो तेल मंगाता है, उसमें सबसे ज्यादा हिस्सा पाम ऑइल का है. लगभग 60 फ़ीसदी. सोयाबीन तेल की हिस्सेदारी 25 और सूरजमूखी तेल की हिस्सेदारी 12 फ़ीसदी है.
रसोई में दिखता नहीं पर हर जगह है पाम
भारतीय घरों में खाना पकाने में पाम ऑइल का सीधे इस्तेमाल भले न होता हो लेकिन ये हर जगह मौजूद है.
'इंडियन एक्सप्रेस' के रूरल अफ़ेयर्स और एग्रीकल्चर एडिटर हरीश दामोदरन इसे 'अदृश्य' तेल कहते हैं, जो किचन में तो नजर नहीं आता लेकिन इसका इस्तेमाल व्यापक है. ब्रेड, नूडल्स, मिठाइयों और नमकीन से लेकर कॉस्मेटिक्स, साबुन, डिटर्जेंट जैसे एफएमसीजी उत्पाद बनाने में पाम तेल का ख़ूब इस्तेमाल होता है.
भारतीय घरों में इस्तेमाल होने वाले रिफाइंड तेल में भी ये मौजूद होता है. सोयाबीन, मूंगफली, राइस ब्रान जैसे खाने के तेल में इसकी मिलावट की जाती है. बाज़ार ने इसे एक शालीन शब्द दे दिया है- 'ब्लेंडिंग'. हालांकि रिफाइंड तेल उत्पादक इस मिलावट की बात से इनकार करते हैं.
भारत की विडंबना ये है कि यह दुनिया में सबसे ज़्यादा तेल खाने वालों का देश है, लेकिन इस मामले में आत्मनिर्भर नहीं है और निकट भविष्य में भी ये शायद ही अपनी जरूरत घरेलू उत्पादन से पूरी कर सकेगा. बिना तेल के भारतीय भोजन की कल्पना भी नहीं जा सकती.
पिछले कुछ सालों में लोगों का खान-पान भी तेजी से बदला है. बढ़ते शहरीकरण और कामकाज़ी लोगों की तादाद बढ़ने से फास्ट फूड कल्चर तेजी से फैला है.
लिहाजा खाद्य तेल की खपत भी बढ़ी है. पिछले पाँच साल में तो देश में खाद्य तेल की खपत में और तेज़ी आई है. 2012 में भारत में प्रति व्यक्ति खाद्य तेल की खपत 14.2 लीटर थी लेकिन अब ये बढ़ कर 19 - 19.5 लीटर तक पहुंच चुकी है.
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विदेशी मुद्रा भंडार पर बड़ा बोझ
भारत कच्चा तेल (पेट्रोल) , गोल्ड के बाद सबसे ज्यादा विदेशी मुद्रा भी खाद्य तेल के आयात पर खर्च करता है. 2019-20 में भारत में 1.34 करोड़ टन खाद्य तेल बाहर से मंगाया गया और इसकी कीमत थी 61,559 करोड़ रुपए. अब यह बिल एक लाख करोड़ रुपए से ऊपर पहुँच चुका है. इसका बड़ा हिस्सा पाम ऑयलतेल मंगाने में खर्च किया गया था.
ऐसे हालात में अगर पाम तेल का सबसे बड़ा निर्यातक देश (इंडोनेशिया) निर्यात पर प्रतिबंध लगा दे तो भारत में खाद्य तेल का महंगा होना स्वाभाविक है.
पेट्रोल-डीजल महंगा होने से भारी महंगाई से जूझ रहे भारत के लोगों के लिए ये और मुसीबत बढ़ाने वाला है.
देश में खाद्य तेल के दामों ने शिखर पर पहुँचने के बाद हाल में कुछ नरमी दिखाई है. लेकिन पाम तेल के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने के इंडोनेशियाई फ़ैसले ने खाद्य तेल के दामों को एक बार फिर खौलाने का इंतज़ाम कर दिया है.
क्या भारत के पास इस संकट का जवाब है?
हरीश दामोदरन कहते हैं, '' भारत में खाद्य तेल की खपत बहुत ज़्यादा है. घरेलू उत्पादन चाहे जितना भी बढ़ा लें, तेज़ी से बढ़ रही इस खपत का मुक़ाबला नहीं कर सकते. ''
''हमारे यहाँ सरसों पारंपरिक तेल है. पूर्वी और उत्तर भारत में यह प्रमुख खाद्य तेल है. लेकिन इसकी पैदावार क्षमता बहुत कम है. सरसों की अधिकतम पैदावार क्षमता दो टन प्रति हेक्टेयर है. पूरे सरसों का तेल नहीं निकलता.
अगर आप अधिकतम 40 फ़ीसदी तेल निकालने में भी सफल रहते हैं तो 800 किलो तेल निकलेगा. लेकिन पाम ऑयल चार गुना निकलेगा. तो उत्पादकता के हिसाब से पाम ऑयल का कोई मुक़ाबला नहीं है. ''
वह कहते हैं, '' दुनिया में पाम तेल से सस्ता कोई तेल नहीं है. यही वजह है कि भारत जैसे बड़े खाद्य तेल उपभोक्ता देश में इसका इतना ज़्यादा आयात होता है.''
भारत की चिंता कितनी बड़ी?
पाम तेल पर इतनी ज़्यादा निर्भरता की वजह से इंडोनेशियाई बैन ने भारत की चिंता बढ़ा दी है. लेकिन वनस्पति तेल उत्पादक और कारोबार संगठन सॉल्वेंट एक्स्ट्रैक्टर एसोसिएशन ऑफ इंडिया के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर डॉ. बी वी मेहता इससे ज्यादा चिंतित नहीं दिखते.
बीबीसी हिंदी से बातचीत में वो कहते हैं, ''अभी भारत में हर महीने छह लाख टन पाम तेल आता है. इसमें 50 फ़ीसदी यानी तीन लाख टन इंडोनेशिया से आता है. इंडोनेशिया के पास पहले से पचास लाख टन का स्टॉक है और हर महीने चालीस लाख टन का उत्पादन हो रहा है. स्थानीय खपत महज 15 लाख टन है. सवाल है कि इतने अधिक स्टॉक के लिए जगह कहाँ बचेगी. पाम इंडोनेशिया की विदेशी मुद्रा कमाई का बहुत बड़ा स्त्रोत है. इसलिए बैन बहुत दिनों तक नहीं टिकेगा. ''
मेहता कहते हैं, ''इंडोनेशियाई सरकार ने निर्यातकों को सबक सिखाने के लिए ये क़दम उठाया है. पाम ऑयल उत्पादकों ने वहाँ घरेलू बाज़ार में सप्लाई कम कर दी थी. वो निर्यात से ज़्यादा कमाई करने में लगे थे. लिहाजा घरेलू बाजार में इसके दाम बढ़ते जा रहे थे और भाव 14000 रुपया ( इंडोनेशियाई मुद्रा) प्रति किलो से बढ़ कर 20000 रुपया पर पहुँच गया था. सरकार इसे फिर 14 हज़ार रुपया के भाव पर लाना चाहती है.''
इंडोनेशिया के पाम तेल बैन का भारत में खाद्य तेल की क़ीमतों पर क्या असर होगा?
इस पर मेहता कहते हैं,, ''आप देखिएगा इंडोनेशिया का पाम तेल निर्यात का यह बैन एक महीने से ज़्यादा नहीं टिकेगा. अगर ये आगे भी बरकरार रहता है तो भी भारत को सप्लाई के मोर्चे पर ज़्यादा दिक्क़त नहीं आएगी. हर महीने एक-डेढ़ लाख टन पाम ऑयल मलेशिया से मंगा सकते हैं. हाँ, खाने की तेल की क़ीमतों में मामूली बढ़त दिख सकती है. लेकिन वह भी थोड़े दिनों के लिए. ''
मेहता कहते हैं, ''भारत में इस बार सरसों के तेल का उत्पादन बढ़ा है. इसलिए खाद्य तेल के दाम अब और ज़्यादा बढ़ने के आसार नहीं दिखते. ये ठीक है कि फ़िलहाल इंडोनेशियाई पाम तेल की क़ीमतों में 100 से 150 डॉलर प्रति टन की बढ़ोतरी हुई. ये मांग और आपूर्ति का मामला है. लेकिन ये ट्रेंड टिकेगा नहीं. ये एक महीने का खेल है. हम चाहेंगे कि सरकार दूसरे खाद्य तेलों का आयात शुल्क घटा दे ताकि लोगों को क़ीमतों में राहत मिल सके.''
गेहूँ-चावल में आत्मनिर्भर पर खाद्य तेल में क्यों नहीं?
पाम तेल पर इंडोनेशिया के बैन के बाद भारत की खाद्य तेल आत्मनिर्भरता पर बहस तेज़ हो गई है. लोग पूछ रहे हैं कि कृषि प्रधान देश भारत गेहूँ, चावल में आत्मनिर्भर हो सकता है तो खाद्य तेल में क्यों नहीं?
मेहता कहते हैं, "1991-92 के दौरान पाम तेल पर हमारी निर्भरता सिर्फ़ तीन फ़ीसदी थी जो आज बढ़ कर 60 फ़ीसदी से ऊपर हो चुकी है. इस बीच पाम तेल इतना सस्ता रहा कि सरकार भारत में तिलहन उत्पादन को लेकर उदासीन रही. सिर्फ़ 1986 के बाद पाँच साल तक तिलहन उत्पादन तेज़ी से बढ़ा था. उस वक़्त आयात शुल्क काफ़ी कम था. लिहाजा भारतीय किसानों को अच्छा दाम मिल रहा था. लेकिन बाद में सरकार ने तेल आयात शुल्क लगातार घटाना शुरू किया और किसानों ने तिलहन उत्पादन में अपनी दिलचस्पी खो दी.''
बाद की सरकारों की आयात शुल्क घटाने की नीति का बड़ा नुकसान दिखा है. खाद्य तेल आयात बिल अब बहुत ज़्यादा हो गया है. वित्त वर्ष 2020-21 में खाद्य तेल आयात बिल बढ़ कर 1.17 लाख करोड़ रुपए का हो गया. अब सरकार को लग रहा है कि ये बोझ काफ़ी भारी पड़ रहा है. लिहाजा उसने भारत में खाद्य तेल उत्पादन की दिशा में कदम बढ़ाने शुरू किए हैं.
- मोदी सरकार का 'मिशन पाम ऑयल' कैसे करेगा काम, क्या हैं ख़तरे?
- रिफाइंड, सरसों के तेल और दूसरे खाद्य तेलों के क्यों बढ़ रहे हैं दाम?
साल 2021 में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पाम तेल उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए नेशनल ऑयल मिशन नाम से एक योजना की शुरुआत की थी.
इस स्कीम के तहत पूर्वोत्तर और अंडमान-निकोबार में पाम की खेती को बढ़ावा देना है. सरकार ने इसके लिए 11,400 करोड़ रुपये खर्च करने का फ़ैसला किया. लेकिन दिक्क़त ये है कि ये लंबी अवधि की योजना है क्योंकि पाम के पेड़ तैयार होने में चार से पाँच साल लग जाते हैं. इसके बाद ही इनसे पाम ऑयल उत्पादन हो सकता है.
भारत में पाम ऑयल उत्पादन योजना का क्या हो रहा है? क्या भारत अपनी खाद्य तेल निर्भरता कभी हासिल कर पाएगा? क्या भविष्य में वह अपनी खपत के बराबर तेल पैदा कर सकेगा?
इस बारे में दामोदरन कहते हैं, ''भारत में तिलहन उत्पादन की जो क्षमता है, उसे कितना भी बढ़ा लें हमें सत्तर-अस्सी लाख टन तेल तो बाहर से ही मंगाना होगा. हाँ, पाम तेल का उत्पादन कर सकें तो हम आयात को घटा कर 60-70 लाख टन तक ला सकते हैं. भारत के लिए इससे ज़्यादा करना संभव नहीं होगा. इसके साथ ही आने वाले दिनों में हमारा खाद्य तेल खपत और ज़्यादा बढ़ेगा, घटेगा नहीं.''
वो कहते हैं, ''खाद्य तेल निर्भरता भारत के लिए मुश्किल है. फ़िलहाल हम अपनी ज़रूरत का 70 फ़ीसदी खाद्य तेल आयात करते हैं और 30 फ़ीसदी पैदा करते हैं. कोशिश करें तो हम इस पैटर्न को बदल सकते हैं. 70 फ़ीसदी उत्पादन और 30 फ़ीसदी आयात एक आदर्श स्थिति होगी. इस बीच, पाम की खेती को बढ़ावा दिया जा सकता है. लेकिन इसकी अपनी मुश्किलें हैं. पाम के पेड़ चार-पांच साल में तैयार होते हैं और तब तक हमें किसानों को कुछ न कुछ देना होगा.''
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