क्या पाकिस्तान के दर्द का 'चीनी इलाज' ही कराएंगे इमरान ख़ान?

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पाकिस्तान में 25 जुलाई को हुए चुनाव में दो दशक पहले बनी तहरीक-ए-इंसाफ़ पार्टी को सबसे ज़्यादा सीटें मिली हैं.

पूर्व क्रिकेटर इमरान ख़ान की इस पार्टी को बहुमत के लिए 22 सीटें और चाहिए. ख़ान इस महीने गठबंधन सरकार बनाने जा रहे हैं और वो पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री होंगे.

ख़ान उस देश का प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं जो क़र्ज़ के जाल में लगातार फंसता जा रहा है. पाकिस्तान की मौजूदा हालात पर कहा जा रहा है कि वो अपना क़र्ज़दाता बदल सकता है, लेकिन क़र्ज़ के अलावा कोई विकल्प नहीं है.

चुनाव से पहले तक ख़ान की पार्टी विपक्ष की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी थी. ख़ान ने पाकिस्तानी जनता से सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा का वादा किया है, लेकिन वो इन वादों को निभाएंगे कैसे?

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पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति सबसे बुरे दौर में है. पाँच साल पहले जब नवाज़ शरीफ़ ने प्रधानमंत्री पद संभाला था, उसकी तुलना में अब पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार आधा हो गया है. विश्लेषकों के मुताबिक पहले की सरकार ने चीन के वन बेल्ट वन रोड में इतना खर्च किया कि मुल्क का ख़जाना आख़िरी सांसें ले रहा है.

कई अर्थशास्त्रियों का कहना है कि तीन सालों के भीतर पाकिस्तान का क़र्ज़ भुगतान उसके सभी तरह के टैक्स राजस्व के आधा से भी ज़्यादा हो जाएगा. पाकिस्तान 13वीं बार अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में जाने की तैयारी कर रहा है, लेकिन यह भी उसके लिए इतना आसान नहीं है.

चीनी क़र्ज़ पर क्या करेगा पाकिस्तान?

पाकिस्तान में चीन की वन बेल्ट वन रोड परियोजना के तहत उसकी मुख्य रेलवे लाइन पर भी काम चल रहा है. पाकिस्तान में अब भी रेलवे के ज़्यादातर इंजन डीज़ल चालित ही हैं. साल 2022 तक सभी लाइनों का दोहरीकरण होना है.

अगर ये काम हो जाते हैं तो पाकिस्तान में ट्रेन की स्पीड 160 किलोमीटर प्रति घंटे हो जाएगी.

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वन बेल्ट वन रोड परियोजना के तहत पाकिस्तान में जितने काम हो रहे हैं वो चीनी पूंजी की बदौलत आगे बढ़ रहे हैं. चाइना पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर 62 अरब डॉलर की परियोजना है और इसमें लगने वाले पैसे का बड़ा हिस्सा चीन का है.

पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पिछले दो साल से 5 फ़ीसदी की दर से आगे बढ़ रही है. इस वृद्धि दर में चीनी निवेश की बड़ी भूमिका है.

पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था के भीतर जो संकट है वो काफ़ी गहरा और स्पष्ट है. चाइना पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर का एक संकट जो सबसे गहरा है, वो है चीन से आयात बढ़ना. कंस्ट्रक्शन उत्पादों का आयात चीन से करने के लिए पाकिस्तान पर काफ़ी दबाव रहता है.

आलम यह है कि चीन से ही क़र्ज़ लेकर पाकिस्तान को उसी से सामान ख़रीदना पड़ रहा है.

पाकिस्तान के सरकारी आंकड़ों के अनुसार वित्तीय वर्ष 2018 में चीन से पाकिस्तान का व्यापार घाटा 10 अरब डॉलर का है. पिछले पांच सालों में यहा पांच गुना बढ़ा है.

इसका नतीजा यह हुआ कि पाकिस्तान का कुल व्यापार घाटा बढ़कर 31 अरब डॉलर हो गया. पिछले दो सालों में पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार में 10 अरब डॉलर की कमी आई है.

20 जुलाई तक पाकिस्तान के ख़ज़ाने में महज 9 अरब डॉलर विदेशी मुद्रा बची थी.

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दबाव में पाकिस्तान

पाकिस्तान पर क़र्ज़ों के भुगतान करने का भी दवाब है. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुसार वित्तीय वर्ष 2018 के अंत तक पाकिस्तान पर क़र्ज़ उसकी जीडीपी के 28.5% के बराबर था.

2021 के वित्तीय वर्ष में पाकिस्तान पर क़र्ज़ अदायगी बढ़कर उसकी जीडीपी का 6.6 फ़ीसदी हो जाएगा जबकि 2018 में यह आंकड़ा 3.5 फ़ीसदी था.

पाकिस्तान की जीडीपी में 14 फ़ीसदी टैक्स राजस्व का योगदान होता है. इनमें से आधी रक़म विदेशी क़र्ज़ चुकाने में खर्च होगी.

अमरीकी थिंक टैंक द सेंटर फोर ग्लोबल डिवेलपमेंट ने मार्च महीने में अपनी रिपोर्ट में कहा था कि पाकिस्तान दुनिया के उन आठ देशों में शामिल है जो चीन के वन बेल्ट वन रोड में शामिल होने के कारण क़र्ज़ के जाल में उलझ चुका है.

इमरान ख़ान 11 जुलाई को पीएम पद की शपथ लेंगे. पूर्व क्रिकेटर सोशल सेक्टर में खर्च को बढ़ाना चाहते हैं, लेकिन ऐसा वो बेहाल अर्थव्यवस्था में कैसे कर पाएंगे?

दुनिया भर के विश्लेषकों का कहना है कि पाकिस्तान के पास अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. ब्रिटेन के स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक का कहना है, ''नई सरकार को आपातकालीन स्थिति में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के पास जाना पड़ेगा. ऐसा कैबिनेट गठन के तत्काल बाद ही होगा.''

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पाकिस्तान का आईएमएफ़ के पास जाना

हालांकि यह पाकिस्तान के लिए कोई असामान्य सी बात नहीं है. पाकिस्तान को सितंबर 2013 में ही अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से 6.1 डॉलर का क़र्ज़ मिला था. नवाज़ शरीफ़ भी आईएमएफ़ जाना चाहते थे, लेकिन पाकिस्तान में इसका विरोध हुआ था.

सीपीईसी के तहत पाकिस्तान को चीन ने जिन शर्तों पर क़र्ज़ दिया है वो पूरी तरह से गोपनीय है. अगर आईएमएफ़ चीन के साथ हुए समझौते की बुक मांगता है तो उसके लिए मुश्किल होगा.

चीन इस पर आपत्ति जता सकता है. कहा जा रहा है कि पाकिस्तानी सेना ने चुनाव में इमरान ख़ान का समर्थन किया था, लेकिन सेना भी नहीं चाहेगी कि चीन की शर्तों को सार्वजनिक किया जाए.

फाइनैंशियल टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार इस गोपनीयता के कारण चीन पाकिस्तान को ज़रूरत पड़ने पर क़र्ज़ देता है, क्योंकि उसे डर सताता है कि कहीं सीपीईसी के फंड सिस्टम की शर्तें सार्वजनिक ना हो जाए.

कई विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान का वित्तीय संकट उसके पड़ोसियों के लिए भी चिंता की बात है. पाकिस्तान एक परमाणु शक्ति संपन्न देश है और दूसरे परमाणु शक्ति संपन्न देश भारत से शत्रुता कश्मीर को लेकर छुपी नहीं है.

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अमरीका पाकिस्तान पर अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान को काबू में करने के लिए दबाव बनाता रहा है, लेकिन ट्रंप के आने बाद अमरीकी दबाव दोनों देशों के संबंधों में कड़वाहट का कारण बना.

पाकिस्तान में यह चुनाव काफ़ी विवादों में रहा है. नवाज़ शरीफ़ की मुस्लिम लीग-नवाज़ ने पिछले हफ़्ते चुनावी नतीजों को ख़ारिज कर दिया था. मुस्लिम लीग-नवाज़ का कहना है कि चुनाव में धांधली हुई है. कुछ पार्टियों ने तो दोबारा चुनाव की मांग करते हुए संसद का बहिष्कार करने का फ़ैसला किया है.

इमरान ख़ान को जो पाकिस्तान मिला है उसमें दो चीज़ें काफ़ी अहम हैं. क्या वो चीनी क़र्ज़ में उलझे पाकिस्तान को उलझाएंगे या कुछ साहस दिखाएंगे? चीनी मलहम पाकिस्तान के दर्द का इलाज है या पाकिस्तान के फैलते ज़ख़्म को छुपाने का तरीक़ा यह इमरान ख़ान को तय करना होगा.

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