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Explainer: पटरी से उतरे भारत-अमेरिका के संबंध, वामपंथी-जिहादी ताकतों के आगे बाइडेन नतमस्तक?

India-US Ties: अमेरिका को भारत के प्रति अपनी शीत युद्ध वाली मानसिकता को त्यागने की जरूरत है।

भारत में ये चुनाव का समय है और चुनावी तारीखों के ऐलान के साथ ही घरेलू राजनीति का रथ अपनी रफ्तार से चलने लगा है। अमेरिका में भी 5 नवंबर को राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव होने वाले हैं और साल के अंत में होने वाला चुनाव, एक बार फिर से बाइडेन बनाम डोनाल्ड ट्रंप बन चुका है।

us india conflict

अमेरिका की घरेलू राजनीति को समझिए

जो बाइडेन, जिनका कार्यकाल अब खत्म होने की तरफ बढ़ चला है, उनकी लोकप्रियता में पिछले चार सालों में भारी गिरावट आई है। हालांकि, उन्होंने डेमोक्रेटिक पार्टी की तरफ से भले ही फिर से उम्मीदवारी हासिल कर ली हो, लेकिन हकीकत में वो यादाश्त की समस्या के साथ साथ कई तरह की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे हैं। वो 81 साल के बूढ़े शख्स हैं, जिसकी चाहत फिर से राष्ट्रपति बनने की है।

ऐसा नहीं है, कि बाइडेन की अलोकप्रियता की वजह उनकी उम्र या उनकी यादाश्त संबंधी समस्या है, बल्कि 76% से ज्यादा अमेरिकियों का मानना है, कि उनका देश गलत दिशा में जा रहा है। मुद्रास्फीति, यूरोप और मध्य पूर्व में युद्ध, अमेरिकी शहरों में बढ़ते अपराध, फेंटेनाइल और मानसिक स्वास्थ्य महामारी के साथ साथ ध्वस्त सीमाओं ने बाइडेन को अलोकप्रिय राष्ट्रपति बना दिया है।

हालांकि, डोनाल्ड ट्रंप काफी ज्यादा लोकप्रिय बन चुके हैं, लेकिन कानूनी अड़चनों में बुरी तरह से उलझे हुए हैं। बावजूद उन्होंने अपनी रिपब्लिकन पार्टी में मौजूदगी को काफी मजबूत कर लिया है।

ट्रंप समर्थक माइक जॉनसन पहले से ही अमेरिकी सदन के स्पीकर बन चुके हैं। सीनेट में जीओपी नेता मिच मैककोनेल ने चुनाव के बाद रिटायर होने की घोषणा कर दी है, जिसके बाद वो सीट भी डोनाल्ड ट्रंप के ही किसी विश्वासपात्र के पास जाने की संभावना प्रबल हो चुकी है। यानि, ये वक्त मौजूदा राष्ट्रपति जो बाइडेन के लिए परेशानी से भरा है।

दुनिया में चौतरफा चिंता

बाकी दुनिया की तरह, भारत भी अमेरिका में होने वाले चुनावों को बहुत करीब से और चिंता के स्तर के साथ देख रहा होगा। बाइडेन के चार सालों के कार्यकाल के दौरान दुनिया अस्थिर रही है। पहले अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों को अराजक वापसी, फिर यूक्रेन युद्ध और अब गाजा युद्ध.. ये दुनिया हर दिन परमाणु युद्ध और तीसरे विश्वयुद्ध की आशंका से जूझ रही है।

लिहाजा, अमेरिका में बाइडेन की नीतियों के सिर्फ 36 प्रतिशत समर्थक ही बचे हैं।

भारत जानता है, कि उसकी क्षेत्रीय सुरक्षा और समृद्धि शत्रुतापूर्ण पड़ोसियों के बीच अमेरिका के साथ गहराई से जुड़ी हुई है। लेकिन, अमेरिका भी यह मानता है, कि चीन के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला करने के लिए उसे इंडो-पैसिफिक में एक विश्वसनीय भागीदार की आवश्यकता है और भारत ही वह भागीदार हो सकता है। और इसमें कोई शक नहीं, कि अमेरिका और भारत ने समय के साथ इस साझेदारी को मजबूत करने के लिए ठोस कदम उठाए हैं।

लेकिन, पिछले साल पीएम मोदी की अमेरिकी यात्रा और उसके बाद राष्ट्रपति बाइडेन का नई दिल्ली में G20 सम्मेलन के लिए आना और गर्मजोशी दिखाने के बाद अमेरिका-भारत संबंधों में जो गति बनी थी, उसमें बाधा आ गई है।

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कहां से पटरी से उतरने लगे भारत-अमेरिका संबंध?

पिछले साल सितंबर के अंत में, भारत में अमेरिकी राजदूत एरिक गार्सेटी ने खुलासा किया था, कि पीएम मोदी ने 26 जनवरी 2024 को भारत के भव्य गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि बनने के लिए राष्ट्रपति बाइडेन को आमंत्रित किया था।

लेकिन, उसके एक महीने बाद व्हाइट हाउस ने बाइडेन के अमेरिका दौरे से इनकार कर दिया, जो भारत के लिए अपमानजनक था।

ये वो वक्त था, जब कनाडाई प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने खालिस्तानी आतंकवादी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के लि्ए भारत पर आरोप लगा दिए और बाद में पता चला, कि अमेरिका ने कथित सबूत कनाडा को सौंपे हैं, लिहाजा ये पहला मौका था, जब दोनों देशों के संबंध में दरार पड़े। इसके बाद अमेरिका ने भी एक खालिस्तानी आतंकवादी की हत्या की कोशिश के तार भारत सरकार के एक अधिकारी से जोड़ दिए। और इस घटना ने दोनों देशों के संबंध को काफी कमजोर करने का काम किया।

माना जाता है, कि अमेरिका ने भारतीय डिप्लोमेट्स के फोन कॉल रिकॉर्ड किए हैं, जो डिप्लोमेसी के बुनियादी सिद्धांतों के ही खिलाफ है।

अमेरिका को नजरिया बदलने की जरूरत

जियो-पॉलिटिक्स में अमेरिका कब पलटी मार दे, ये कोई नहीं कह सकता है और ऐसा पिछले हफ्ते इजराइल के साथ ही हुआ है। जब न्यूयॉर्क के सीनेटर चक शूमर, जो अमेरिकी सीनेट के सर्वोच्च रैंकिंग वाले अधिकारी हैं, उन्होंने खुले तौर पर इजराइल में शासन परिवर्तन की वकालत कर दी।

ये इजराइल के आंतरिक मामलों में सीधा हस्तक्षेप है। चक शूमर ने यहां तक कह दिया, कि प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को हटाने के लिए इजराइल में नये चुनाव कराए जाएं। उन्होंने लगभग धमकी भरे लहजे में कहा, कि अगर इजराइल के लोगों ने अपने नेतृत्व को नहीं बदला, तो अमेरिका के पास हस्तक्षेप कर सरकार बदलने के अलावा कोई और विकल्प नहीं होगा।

निश्चित तौर पर ये अमेरिका के घमंड को दिखाता है। ये साबित करता है, कि उसे अपने सहयोगियों की संप्रभुता से कोई मतलब नहीं है, जबकि हर एक मिनट वो अपनी संप्रभुता की बात करता है।

इसके अलावा, इसी हफ्ते अमेरिकी विदेश विभाग की मीडिया ब्रीफिंग के दौरान प्रवक्ता मैथ्यू मिलर ने भारत के नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) पर टिप्पणी की। उन्होंने कहा, कि अमेरिका "बारीकी से निगरानी कर रहा है कि इस [नागरिकता संशोधन] अधिनियम को [भारत में] कैसे लागू किया जाएगा।"

वहीं, भारत में अमेरिकी राजदूत एरिक गार्सेटी ने बाद में कहा, "धार्मिक स्वतंत्रता का सिद्धांत... लोकतंत्र की आधारशिला है... [और] आप सिद्धांतों को नहीं छोड़ सकते।"

भारत ने अमेरिका के बयानों पर तीखी प्रतिक्रिया दी। भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अमेरिकी राजदूत की इतिहास की समझ पर भी सवाल उठाए।

इसके बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी पर भी अमेरिका ने बयान दिए।

जाहिर तौर पर भारत के खिलाफ ऐसी बयानबाजियां साफ तौर पर दर्शाती हैं, कि बाइडेन प्रशासन अपनी पार्टी के वामपंथी-जिहादी विचारधारा वाले और एंटी-इंडिया एजेंडा चलाने वाले नेताओं के आगे नतमस्तक हैं। जो अमेरिका की इंडो-पैसिफिक नीति के लिए ही खतरनाक साबित हो सकता है।

भारत और इजराइल के खिलाफ बयानबाजी दर्शाता है, घरेलू राजनीति में बाइडेन प्रशासन पर वामपंथी-जिहादी विचारधारा इस कदर हावी है, कि अमेरिका की विदेश नीति काफी कमजोर और असहाय नजर आ रही है। असहाय इसलिए, क्योंकि ऐसा इतिहास में पहली बार हुआ है, कि यूनाइटेड नेशंस में इजराइल के खिलाफ पेश किए गये प्रस्ताव को वीटो कर रोकने के बजाए अमेरिका वोटिंग से ही गैर-हाजिर हो गया।

ये साफ बताता है, कि आने वाले चुनाव में मुस्लिम मतदाताओं को खुश करना अब बाइडेन प्रशासन का मुख्य मकसद है। अमेरिका में रहने वाला मुस्लिम समुदाय कई बार बाइडेन का बहिष्कार करने की बात कर चुका है, और इससे पता चलता है, कि चुनाव जीतने के लिए बाइडेन प्रशासन मुस्लिम तुष्टिकरण करेगा, भले ही इससे उसके संबंध अपने सबसे पुराने सहयोगी इजराइल और इंडो-पैसिफिक के महत्वपूर्ण सहयोगी भारत से रिश्ते क्यों ना खराब करना पड़े। चाहे ताइवान खतरे में क्यों ना आ जाए, बाइडेन प्रशासन वामपंथी-जिहादी तत्वों के आगे सरेंडर करके रहेंगे, जो काफी खतरनाक साबित हो सकता है।

अमेरिका को भारत के प्रति अपनी शीत युद्ध की मानसिकता को त्यागने और अपने ऐसे नीति निर्माताओं से दूर रहने की जरूरत है, जो भारत को डबल स्टैंडर्ड के चश्मे से देखते हैं।

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