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पाकिस्तान में क्यों छप रहा है चीनी अख़बार?

चीन- पाकिस्तान
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चीन- पाकिस्तान

पाकिस्तान के समाज में चीन की पकड़ धीरे-धीरे बढ़ रही है और यहां के स्थानीय मीडिया- टेलीविज़न, रेडियो, प्रिंट, विज्ञापन और सिनेमा में इस बात के सबूत स्पष्ट तौर पर देखे जा सकते हैं.

चीन के 62 अरब डॉलर की चीन-पाकिस्तान इकोनोमिक कॉरिडोर परियोजना के तहत कई चीनी कंपनियां पाकिस्तान में कई इलाकों में सड़कें, बिजली संयंत्र और इंडस्ट्रियल ज़ोन बना रहा है. ऐसे में हाल के महीनों में हज़ारों चीनी पाकिस्तान का रुख़ कर रहे हैं और दोनों देशों के बाशिंदों के बीच दोस्ती बढ़ रही है. इस कारण दोनों देशों का आपसी संबंध भी पारंपरिक 'दोस्ती' से हट कर एक अलग स्तर पर पहुंच रहा है.

चीनी लोगों के पाकिस्तान आने के साथ-साथ यहां की मीडिया में ख़ास तरह की ख़बरें छपने लगी हैं जो ख़ास तौर पर उनके नए दोस्तों के लिए है.

पाकिस्तान आप्रवासन से संबंधित तथ्य सार्वजनिक तौर पर जारी नहीं करता, लेकिन एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार देश में लगभग चार लाख चीनी रहते हैं. स्थानीय मीडिया में छपे एक लेख के अनुसार इसे 'चीनी क्रांति' कहा जा रहा है जो पूरे देश में फैल रही है.

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चीन के टीवी धारावाहिक
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चीन के टीवी धारावाहिक

पाकिस्तान में चीनी धारावाहिक

पाकिस्तान में चीनियों के लिए ख़ास कार्यक्रमों में महत्वपूर्ण है इसी साल शुरू हुआ चीनी धारावाहिक. पाकिस्तान के सरकारी टेलीविज़न पीटीवी पर प्रसारित होने वाला ये धारावाहिक 'बीजिंग यूथ' 4 नवंबर से शुरू हुआ है.

ये 39 एपिसोड का एक चीनी धारावाहिक है जिसे उर्दू में डब किया गया है और हर सप्ताह शनिवार को प्रसारित किया जाता है.

इस धारावाहिक का पहला एपिसोड यूट्यूब पर भी उपलब्ध है.

लेकिन ये धारावाहिक पाकिस्तान में इस तरह का पहला कार्यक्रम नहीं है. जीयो न्यूज़ की वेबसाइट में चीन के महत्वाकांक्षी 'बेल्ट एंड रोड' परियोजना से संबंधित डॉक्यूमेन्ट्री और एनिमेशन सिरीज़ पोस्ट करता है. ये सभी कार्यक्रम भी चीनी भाषा से उर्दू में अनुवाद किए गए होते हैं.

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विज्ञापनों और सिनेमा में चीनी धमक

विज्ञापन की दुनिया में भी इसके उदाहरण देखने को मिल रहे हैं.

पाकिस्तानी मसालों की एक कंपनी ने अपने विज्ञापन के लिए एक चीनी दंपति का इस्तेमाल किया है जो चीन से आकर लाहौर में बस गए हैं. पाकिस्तान के कई शहरों में इस कंपनी की दुकानें हैं.

शायद इस विज्ञापन के पीछे यही धारणा होगी कि खाना अलग-अलग तरह के लोगों को साथ लाता है. इस विज्ञापन में अंग्रेज़ी और उर्दू दोनों भाषाओं में सबटाइटल्स दिए गए हैं. विज्ञापन में खाने की मेज़ पर नूडल्स खा रहे चीनी दंपति एक दूसरे से बात कर रहे हैं और व्यक्ति अपनी पत्नी से कहता है, "यहां कुछ दोस्त बना लो."

उनकी पत्नी दुख के साथ कहती हैं, "ये आसान नहीं है. हम लोग तो एक तरह का खाना भी नहीं खाते."

इसके बाद पत्नी एक दिन तय करती है कि वो पाकिस्तान में लोकप्रिय माना जाने वाला खाना, बिरयानी बनाएगी. इसके साथ ही वो अपने पड़ोसियों का दिल जीत लेती है. देखें विज्ञापन.

इसी साल अप्रैल में रिलीज़ हुई फ़िल्म 'चले थे साथ' की कहानी में भी चीन से संबंध दिखाया गया था. ये एक प्रेम कहानी थी जिसमें सीमा के पार एक चीनी व्यक्ति और पाकिस्तानी महिला के प्यार की कहानी दिखाई गई थी.

रेडियो सेक्टर में भी आधिकारिक तौर पर दोनों देशों की मीडिया की सहभागिता को प्रोत्साहित किया जा रहा है. दिसंबर 2016 को पाकिस्तान और चीन ने साथ मिलकर एक रेडियो चैनल 'एफ़एम98 दोस्ती' शुरू किया.

पहले तो इसका वक्त दिन में कुछ घंटों तक ही सीमित था लेकिन हाल में इसने 24x7 कार्यक्रम प्रसारित करना चालू कर दिया है. इसमें घंटे भर का एक ख़ास कार्यक्रम भी प्रसारित किया जाता है जिसका नाम है 'चीनी सीखें'.

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चीनी भाषा का अख़बार

चीनी भाषा का पाकिस्तान में प्रकाशित होने वाला पहला अख़बार है 'हुआशांग' जिसे इस्लामाबाद के बाहर से प्रकाशित किया जाता है. इस अख़बार का अंग्रेज़ी संस्करण भी प्रकाशित किया जाता है.

अख़बार के फ़ेसबुक पन्ने के अनुसार हुआशांग की शुरुआत चीन-पाकिस्तान इकोनोमिक कॉरिडोर परियोजना के तहत चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के जवाब में ही हुई है ताकि दोनों देशों के बीच 'आपसी रिश्ते को और गहरा बनाया जा सके.'

दो साल पहले शुरू हुए इस अख़बार के चीनी भाषा और अंग्रेज़ी भाषा के संस्करण की लगभग दस हज़ार प्रतियां प्रकाशित की जाती हैं और पाकिस्तान में इसके करीब साठ हज़ार पाठक हैं.

हाल में आई मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो ये अख़बार देश में बढ़ते चीनी नागरिकों को ध्यान में रखते हुआ काम करता है.

इसके अलावा पाकिस्तान की मीडिया में भी चीन से जुड़ी ख़बरें प्रकाशित होती रहती हैं और वो चीनी मीडिया की ख़बरों को भी अपने पन्नों पर जगह देते हैं. इसके साथ ही बीच-बीच में दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों से जुड़े लेख प्रकाशित किए जाते हैं.

दिसंबर की शुरुआत में अंग्रेज़ी अख़बार 'द न्यूज़' ने अपने पाकिस्तानी पाठकों के लिए चाइना डेली के एशिया वीकली की 32 पन्नों की एक पत्रिका छापी थी.

वहीं, उम्मत जैसे इस्लामी समर्थक अख़बारों ने हर रविवार को अपने साप्ताहिक बाल पन्ने के लिए चीनी भाषा का पाठ छापना शुरू किया है.

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'सांस्कृतिक टकराव'

हालांकि, हर कोई आशावादी नहीं होता क्योंकि कुछ पाकिस्तानी मीडिया ने चीनी उपस्थिति के प्रभाव से स्थानीय परंपरा और व्यवसाय को बचाने की वकालत की है.

चीन के बढ़ते सांस्कृतिक प्रभाव के पीछे आर्थिक कारणों की पहचान करते हुए प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार 'डॉन' पूछता है, "कैसे 'मेड इन चायना' उत्पाद पूरे पाकिस्तान में इतनी आसानी से उपलब्ध हो गए हैं और ऐसी कीमतों पर हैं जिसे हर कोई ख़रीद सकता है?"

वह आगे लिखता है, "इसका जवाब चीन और पाकिस्तान के बीच मुक्त व्यापार समझौते में है."

रूढ़िवादी अंग्रेज़ी अख़बार द नेशन अपने एक कॉलम में 'सांस्कृतिक टकराव' पर धावा बोलता है.

वह लिखता है, "सीपीईसी परियोजना से जो अवसर मिले हैं वे निर्विवाद और स्पष्ट हैं लेकिन क्या हम इसके सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभाव को नज़रअंदाज़ कर सकते हैं?"

इस लेख को लिखने वालीं ज़हरा नियाज़ी आगे लिखती हैं, "सीपीईसी परियोजना के परिणामस्वरूप चीनी प्रवाह से पाकिस्तान में सांस्कृतिक टकराव हो सकता है."

इस लेख में आगे कहा गया है कि 'सस्ते चीनी उत्पादों की बाढ़' अभी स्थानीय बाज़ारों में मौजूद है और पाकिस्तानी निर्माता पूरी तरह बाहर हो सकते हैं.

वहीं, चीन के पाकिस्तानी समाज पर पड़ने वाले अघोषित प्रभाव को सकारात्मक मानते हुए एक अख़बार लिखता है, "दो महान देशों का यह मेल दोनों विविध समाजों को लाभ देगा. इस क्षेत्र में नई संस्कृति बन रही है."

उर्दू अख़बार 'डेली एक्सप्रेस' लिखता है कि चीनी जनता स्थानीय लोगों से 'बिल्कुल भिन्न' है लेकिन वह आगे लिखता है कि यह 'खाड़ी पर पुल' जैसा है.

इसमें आगे है, "दोनों देशों को सिनेमाघरों में एक दूसरे की चुनी गई फ़िल्मों को दिखाना चाहिए. चीन और पाकिस्तान के आधुनिक और क्लासिक साहित्य को पुस्तकालयों में रखना चाहिए ताकि दोनों देशों के लोग एक-दूसरे को समझ सकें."

डॉन में एक लेख में शाज़िया हसन लिखती हैं कि पाकिस्तान 'चीन के अवसरों की ज़मीन' तय कर रहा है और 'कई चीनी नागरिक घर से दूर बेहतर व्यावसायिक अवसर तलाश रहे हैं.'

वह आगे लिखती हैं, "सीपीईसी से दोनों देशों की दोस्ती और मज़बूत होगी. सीपीईसी पाकिस्तान-चीन के रिश्तों को भविष्य में कैसा आकार देता है यह दोनों देशों के दृष्टिकोण पर निर्भर करता है लेकिन एक चीज़ तय है कि पाकिस्तान फिर से वही नहीं रहने वाला है."

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