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Special Report: पाकिस्तानी फिल्म इंडस्ट्री ‘लॉलीवुड’ तबाह होने के कगार पर क्यों है?

पाकिस्तानी फिल्मों की स्थिति तो पहले से ही खराब था मगर कोरोना ने पाकिस्तानी फिल्मों को आखिरी सांस लेने पर मजबूर कर दिया है।

इस्लामाबाद: एक वक्त था जब पाकिस्तानी फिल्म इंडस्ट्री साल में 140 के करीब फिल्में प्रोड्यूस कर करने की स्थिति में पहुंच गया था लेकिन अब पाकिस्तानी फिल्म इंडस्ट्री बर्बादी की कगार पर पहुंच चुका है। विभाजन के बाद भारतीय फिल्म इंडस्ट्री को बॉलीवुड से तो पाकिस्तानी फिल्म इंडस्ट्री को 'लॉलीवुड' के नाम से पुकारा गया मगर भारतीय फिल्म इंडस्ट्री अब कई मायनों में हॉलीवुड को चुनौती देने की कोशिश में लगा है तो पाकिस्तानी फिल्म इंडस्ट्री अस्तित्व बचाने के लिए संधर्ष करता दिख रहा है। ऐसे में अब पाकिस्तान में सवाल ये पूछे जाने लगे हैं कि आखिर पाकिस्तानी फिल्म इंडस्ट्री का भविष्य क्या होने वाला है?

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ठहरा रहा पाकिस्तान फिल्म इंडस्ट्री

पाकिस्तान में भारतीय फिल्मों पर बैन लगा हुआ है और पाकिस्तानी फिल्में उस स्तर की बनती नहीं है जिन्हें लोग थियेटर में पैसे खर्च कर देखने जाएं और रही सही कसर कोरोना वायरस ने पूरी कर दी है। विश्व का सिनेमा बाजार लगातार तरक्की करता रहा लेकिन पाकिस्तानी प्रोड्यूसर्स के पास फिल्मों में लगाने को पैसे नहीं है। पाकिस्तान में सिर्फ 150 फिल्मी स्क्रिन्स हैं और अगर एक पाकिस्तानी फिल्म पाकिस्तान में सुपर-डुपर हिट माना जाता है तो इसका मतलब है कि फिल्म ने करीब 50 करोड़ की कमाई की है। भारतीय फिल्म बजरंगी भाई जान और सुल्तान ने सबसे ज्यादा 23 और 37 करोड़ की कमाई की थी। लेकिन, भारतीय फिल्में बैन होने के बाद अब पाकिस्तानी फिल्म इंडस्ट्री कुछ ही फिल्मों को प्रोड्यूस कर पाता है, जिसका बजट 20 से 25 करोड़ से ज्यादा नहीं होता। जाहिर है, कम बजट की फिल्मों का चलना काफी मुश्किल होता है। पाकिस्तानी फिल्में इतनी पीछे रह गई हैं कि विदेशों फिल्मों से उनकी तुलना की नहीं जा सकती हैं और ना ही पाकिस्तानी फिल्में किसी और देश में रिलीज हो पाती हैं।

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पाकिस्तान में अभी भी भारतीय फिल्में चोरी-छिपे देखी जाती हैं। पाकिस्तानी स्टार्स के मुकाबले अभी भी सलमान खान, शाहरूख खान, रणबीर कपूर और रणवीर सिंह ही युवाओं में पसंद किए जाते हैं। पिछले कुछ महीनों से पाकिस्तान में तुर्की की फिल्में और सीरिज काफी पसंद की जाती हैं। लेकिन, ऐसे सीरिज पाकिस्तानी दर्शक यू ट्यूब पर ज्यादा देख लेते हैं, लिहाजा तुर्की सीरिज भी पाकिस्तानी फिल्मों को काफी नुकसान कर रहा है।

कट्टरपंथ और पाकिस्तानी फिल्म

कट्टरपंथी विचारधारा ने पाकिस्तानी फिल्म इंडस्ट्री का काफी नुकसान किया है। जनरल जिया उल हक जब पाकिस्तान की सत्ता के सिरमौर बने तो उन्होंने पाकिस्तानी में इस्लामी शालन लागू कर दिया, जिसका सबसे बड़ा असर पाकिस्तीन फिल्मों पर पड़ा। इस्लामी नियम लागू होने के साथ ही पाकिस्तानी फिल्म उद्योग तबाही के कगार की तरफ बढ़ने लगा। बीसीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक 'जिया उल हक के कार्यकाल से पहले पाकिस्तान का शाहनूर स्टूडियो लाहौर शहर के केन्द्र में बने इलाके में फैला था लेकिन अब ये सिकुड़ कर बहुत कम रह गया है। फ़िल्मों का काम बंद होने की वजह से अब उस ज़मीन पर एक रिहायशी कॉलोनी बन चुकी है जबकि कस्टम विभाग वालों ने भी कुछ जमीन किराए पर ले कर चोरी की गाड़ियों के लिए गोदाम बना दिया है'। शाहनूर स्टूडियो के शाहजहां रिजवी बताते हैं कि एक वक्त लाहौर में 8 स्टूडियो में दिन रात फिल्मों की शूटिंग होती रहती थी मगर अब लाहौर में सिर्फ 3 स्टूडियो हैं।

कट्टरपंथी रवैये की वजह से फिल्म निर्माताओं को आजादी नहीं मिल पाती है। फिल्मों के स्क्रिप्ट को बार बार बदला जाता है, उसमें कांट-छांट की जाती है। किसी तरह का विवाद ना हो उसके लिए स्क्रिप्ट में इतने बदलाव किए जाते हैं कि आखिर में स्क्रिप्ट ही हटा दिया जाता है। पाकिस्तानी फिल्म प्रोड्यूसर्स का मानते हैं कि क्रिएटिव स्वतंत्रता के बिना आप फिल्मों का निर्माण नहीं कर सकते हैं।

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पाकिस्तानी फिल्मों में भारत के खिलाफ जहर

पाकिस्तान में जमीनी मुद्दों पर आप फिल्म नहीं बना सकते हैं और ज्यादा बजट की फिल्मे बनाना संभव नहीं है लिहाजा पाकिस्तानी फिल्म प्रोड्यूसर्स के खिलाफ भारत के खिलाफ फिल्में बनाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचता है। 1971 के बाद पाकिस्तानी फिल्मों से भारत के खिलाफ घृणा फैलाई जाने लगी। पाकिस्तानी फिल्मों में यह दिखाया जाने लगा कि भारत पाकिस्तान के नहीं बल्कि इस्लाम के खिलाफ है। जिहाद, घर कब आओगे फिल्मों के जरिए सिर्फ घृणा बेचने की कोशिश की गई। फिल्मों के खलनायक कश्मीर के सैनिक होते हैं जिनके माथे पर तिलक लगाया हुआ दिखाया जात था। शुरूआत में ऐसी फिल्में खूब चलीं मगर एक वक्त बाद एक तरह की फिल्में चलना भी बंद होने लगी और अब स्थिति ये है कि पाकिस्तानी फिल्म इंडस्ट्री के पास कुछ नया दिखाने को बचा नहीं है।

सरकार की नजर में फिल्म इंडस्ट्री नहीं

पाकिस्तानी फिल्म प्रोड्यूसर्स बेहद दुखी मन से कहते हैं कि पाकिस्तान सरकार की प्रायोरिटी लिस्ट में फिल्में कहीं नहीं है। पाकिस्तानी फिल्म प्रोड्यूसर राशिद कहते हैं कि उन्होंने 50 लाख रुपये खर्च कर 'जर्नी ऑफ आइकॉन्स' बनाया। हालांकि, मुझे इस बात की उम्मीद थी कि इस फिल्म से इतना पैसा वापस नहीं आ पाएगा लेकिन उन्हें इस वक्त नाउम्मीदी हासिल हुई जब पाकिस्तान सरकार ने भी इस फिल्म पर ध्यान नहीं दिया। राशिद बताते हैं कि पाकिस्तान सरकार के लिए पाकिस्तानी फिल्म इंडस्ट्री कोई महत्व नहीं रखता है। पाकिस्तानी फिल्म प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन (PFPA) के चेयरमैन अमजद राशिद बताते हैं कि उन्होंने 17-18 पाकिस्तानी प्रोड्यूसर्स के साथ मिलकर पाकिस्तान सरकार के प्रतिनिधियों के साथ 13 बार मुलाकात की और उन्हें पाकिस्तानी फिल्म की स्थितियों से अवगत कराया और सबसे आखिरी बार मीटिंग के बाद सरकारी प्रतिनिधियों ने कहा है कि उन्होंने पाकिस्तानी फिल्मों पर रिपोर्ट बनाकर प्रधानमंत्री इमरान खान को सौंपी है।

OTT प्लेटफॉर्म ने खेल और बिगाड़ा

कोरोनाकाल में ज्यादातर फिल्में OTT प्लेटफॉर्म पर रिलीज होने लगी हैं। हॉलीवुड फिल्में जिस दिन थियेटर में आती हैं, उसी दिन OTT प्लेटफॉर्म पर भी। लेकिन पाकिस्तानी फिल्म इंडस्ट्री के लिए ऐसा करना आसान नहीं है। फिल्मों को OTT पर रिलीज करने से फिल्मों की लागत नहीं निकल पाएगी और उन्हें काफी नुकसान होगा। 'सॉरी डार्लिंग' समेत कई पाकिस्तानी फिल्में बनने के बाद रिलीज सिर्फ इसलिए नहीं हो रही हैं क्योंकि अबतक थियेटर में लोगों ने पूरे मन से आना शुरू नहीं किया है।

ARY फिल्म प्रोडक्शन हाउस का कहना है कि एक फिल्म 'टिक बटन' उनके प्रोडक्शन हाउस में बनकर तैयार है और 'लंडन नहीं जाऊंगा' फिल्म की शूटिंग चल रही है लेकिन अब ये प्रोडक्शन हाउस जमीन और आसमान के बीच फंसा हुआ है। इन दोनों फिल्मों में इतना पैसा लग चुका है और ये फिल्में रिलीज तब होंगी, कुछ पता नहीं है ऐसे में इस प्रोडक्शन हाउस के पास 2022 में ना तो रिलीज करने के लिए फिल्में होंगी और ना ही बनाने के लिए क्योंकि इसके पास पैसों की भारी कमी होगी।

पाकिस्तानी फिल्मों का आने वाला वक्त क्या होगा, इस सवाल के जबाव पर पाकिस्तानी प्रोड्यूसर्स यही कहते हैं, 'उम्मीद पर दुनिया कामय है' लेकिन वो भी कहते हैं कि कहीं एक दिन सारी उम्मीदें ही खत्म ना हो जाए।

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