यूक्रेन संकट: रूस से लड़ने के लिए अमेरिका अपने सैनिक क्यों नहीं भेज रहा?
पिछले कुछ दिनों में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने यूक्रेन के ख़िलाफ़ रूस के हमले को 'रूस की आक्रामकता' करार देते हुए कूटनीतिक तरीके से इसका जवाब देने की काफी कोशिश की है.
बाइडन प्रशासन पिछले कई हफ़्तों से लगातार रूसी आक्रामकता को लेकर चेतावनी जारी कर रहा था, जो आख़िर में सही साबित हुई. यही नहीं, अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के दांव पर लगे होने की बात भी कही गई थी.
लेकिन इन सबके बीच बाइडन ने ये भी बताया कि वह इस युद्ध में भाग लेने के लिए अमेरिकी सैनिकों को यूक्रेन नहीं भेजेंगे.
उन्होंने कहा कि अमेरिकी नागरिकों को बचाने के लिए भी वो यूक्रेन में अमेरिकी सैनिक नहीं भेजेंगे. हालांकि, रूसी सैनिक स्पष्ट रूप से यूक्रेन में युद्ध में शामिल हैं.
इसके साथ ही उन्होंने यूक्रेन में सैन्य सलाहकार और निरीक्षकों के रूप में काम कर रहे अमेरिकी सैनिकों को भी वापस बुला लिया है
ऐसे में सवाल ये उठता है कि बाइडन ने अपने कार्यकाल के सबसे गंभीर विदेश नीति संकट को लेकर ये कदम क्यों उठाया?
दांव पर नहीं लगे हैं राष्ट्रीय हित
बाइडन के इस फ़ैसले के लिए ज़िम्मेदार कारणों में सबसे पहला कारण ये है कि यूक्रेन अमेरिका का पड़ोसी देश नहीं है. यह अमेरिकी सीमा से सटा मुल्क नहीं है और यूक्रेन में उसका कोई सैन्य अड्डा भी नहीं है.
इसके साथ ही यूक्रेन के पास ऐसे तेल भंडार भी नहीं हैं जो रणनीति रूप से बेहद अहम हों. और वह अमेरिका का बड़ा व्यापारिक साझेदार भी नहीं है.
लेकिन बाइडन से पहले ऐसे कई राष्ट्रपति हुए हैं जिन्होंने अमेरिकी हितों पर ख़तरा नहीं मंडराने पर भी दूसरों के लिए अपनी आर्थिक और सैन्य ताकत का इस्तेमाल किया है.
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने साल 1995 में यूगोस्लाविया के बिखरने के बाद युद्ध में सैन्य हस्तक्षेप किया था. इसके बाद साल 2011 में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने बिलकुल ऐसा ही कदम लीबियाई गृहयुद्ध के समय उठाया. दोनों ही बार लोगों को बचाने और मानवाधिकारों की रक्षा करने की बात की गई थी.
इससे पहले साल 1990 में पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज एच डब्ल्यू बुश ने इराक़ को कुवैत से बाहर निकालने के लिए अंतरराष्ट्रीय सैन्य गठबंधन बनाया था. उन्होंने इसे जंगलराज बनाम क़ानून व्यवस्था के बीच जंग में क़ानून व्यवस्था की रक्षा करने के लिए ज़रूरी कदम बताते हुए उचित ठहराया था.
बाइडन के शीर्ष राष्ट्रीय सुरक्षा अधिकारियों ने जब रूस से अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा सिद्धांतों को ख़तरा होने की बात कही तो उन्होंने लगभग ऐसी ही भाषा का इस्तेमाल किया. लेकिन वह सैन्य अभियान की जगह कड़े प्रतिबंधों के ज़रिए आर्थिक चोट करने का सुझाव दे रहे थे.
क्या बाइडन सैन्य हस्तक्षेप से परहेज़ करते हैं?
बाइडन प्रशासन के इस रुख़ के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन का व्यक्तिगत रुख़ भी मायने रखता है.
बाइडन को सैन्य अभियानों के ज़रिए हस्तक्षेप करने वालों में नहीं गिना जाता है. हालांकि, उनका ये रुख़ भी धीरे-धीरे ही बना है.
साल 1990 में उन्होंने बालकन क्षेत्र में जारी रही नस्ली हिंसा में अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप का समर्थन किया था. इसके बाद 2003 में उन्होंने अमेरिका के इराक़ अभियान का भी समर्थन किया था. लेकिन इसके बाद से वह अमेरिका की सैन्य शक्ति के प्रयोग को लेकर सतर्क होते गए.
उन्होंने बराक ओबामा के अफ़ग़ानिस्तान में सैनिकों की संख्या बढ़ाने से लेकर और लीबिया में सैन्य हस्तक्षेप करने के उनके फ़ैसले का विरोध भी किया.
इसके बाद जब वह राष्ट्रपति बने तो अपने पूर्ववर्ती के फ़ैसले के अनुसार उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी सेना को वापस बुलाया. इस वजह से अफ़ग़ानिस्तान में फैली अफरा-तफरी और मानवीय संकट पैदा होने के बाद भी उन्होंने अपने पुरज़ोर तरीके से अपने फ़ैसले का बचाव किया.
बाइडन प्रशासन की विदेश नीति को शक्ल देने वाले ब्लिंकन ने भी राष्ट्रीय सुरक्षा को परिभाषित करते हुए सैन्य हस्तक्षेप की तुलना में जलवायु परिवर्तन, वैश्विक बीमारियों से लड़ने और चीन के साथ प्रतिद्वंदिता को तरजीह दी है.
युद्ध नहीं चाहते अमेरिकी नागरिक
हाल ही में हुए एपी-एनओआरसी सर्वेक्षण में सामने आया है कि 72 फीसद अमेरिकी नागरिकों का मानना है कि रूस-यूक्रेन विवाद में अमेरिका कोई भूमिका न निभाए या फिर केवल छोटी-सी भूमिका अदा करे.
इस सर्वेक्षण में भाग लेने वाले लोगों का ध्यान ज़मीनी मुद्दों जैसे बढ़ती मुद्रा स्फिति पर अधिक था. अमेरिका में मध्यावधि चुनाव नज़दीक आ रहे हैं. ऐसे में माना जा रहा है कि बाइडन के लिए इन मुद्दों का ध्यान अधिक ज़रूरी है.
अमेरिका की राजधानी वॉशिंगटन में इस मुद्दे पर सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष में कड़े प्रतिबंधों की मांग उठ रही है.
टेड क्रूज़, जैसे रिपब्लिकन सीनेटर जो ताकत का इस्तेमाल करने के समर्थक माने जाते हैं, भी ये नहीं चाहते कि बाइडन अमेरिकी सेना को यूक्रेन में भेजकर "पुतिन के साथ सीधे तौर पर" युद्ध शुरू करें.
टेड क्रूज़ जैसे ही एक अन्य रिपब्लिकन सीनेटर मार्को रुबियो ने भी कहा है कि दुनिया की सबसे बड़ी परमाणु ताकतों के बीच युद्ध किसी के लिए अच्छा नहीं होगा.
महाशक्तियों के बीच संघर्ष का ख़तरा
अमेरिका के रूस-यूक्रेन मामले में सैन्य हस्तक्षेप न करने का सबसे बड़ा ये कारण है, कि पुतिन के पास परमाणु हथियारों का बड़ा जखीरा है.
बाइडन यूक्रेन में रूसी और अमेरिकी सैनिकों के बीच आमने-सामने के संघर्ष का जोख़िम उठाकर "विश्व युद्ध" शुरू कर नहीं करना चाहते.
इसी महीने एनबीसी को दिए एक इंटरव्यू में बाइडन ने कहा था कि "हम किसी आतंकी संगठन से मुक़ाबला नहीं कर रहे हैं. हम दुनिया की सबसे बड़ी सेनाओं में से एक का सामना कर रहे हैं. ये बहुत जटिल समस्या है और स्थितियां तेज़ी से बिगड़ सकती हैं."
संधि से जुड़ी बाध्यता नहीं
इसके साथ ही अमेरिका पर किसी संधि की वजह से ये जोखिम उठाने की बाध्यता भी नहीं हैं. नेटो के आर्टिकल 5 में कहा गया है कि किसी भी नेटो सदस्य देश पर हमले को सभी सदस्य देशों पर हमला माना जाएगा और सभी को एक दूसरे को बचाने की दिशा में कदम उठाने होंगे.
लेकिन यूक्रेन का मामला अलग है, वो नेटो का सदस्य नहीं है. ये तर्क देते हुए ब्लिंकन ने कहा था कि अमेरिका उन मूल्यों की रक्षा के लिए क्यों नहीं लड़ेगा जिन पर वह ज़ोर देता है.
यह एक बिडंबना जैसा भी है क्योंकि इस संघर्ष के पीछे पुतिन की मांग है जिसमें उन्होंने यूक्रेन को नेटो में शामिल न करने की गारंटी मांगी थी. हालांकि नेटो ने रूस की मांग को मानने से मना कर दिया था.
हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर और विदेश नीति से जुड़े मामलों के जानकार स्टीफ़न वॉल्ट ने अपने एक लेख में कहा है कि अमेरिका, यूरोप और नेटो देश रूस के ख़िलाफ़ कड़े बयान तो दे रहे हैं लेकिन सैन्य हस्तक्षेप के मामले में वो या तो इनकार कर रहे हैं या फिर शांत हैं, ये समझना मुश्किल है.
बाइडन ने यूक्रेन में अपनी सेना भेजने की बजाय यूक्रेन में मौजूद अमेरिकी सेना से जुड़े लोगों को वापिस बुलाया है, जिससे अलग संदेश गया है.
क्या उद्देश्य बदल जाएंगे?
बाइडन यूक्रेन में सेना नहीं भेज रहे, लेकिन यूक्रेन और रूस की सीमा से सटे नेटो सदस्य देशों को मजबूती देने के लिए वो यूरोप में अपनी सैन्य टुकड़ियां भेज रहे हैं और वहां तैनात सैनिकों को दूसरी जगह तैनात कर रहे हैं.
बाइडन प्रशासन ने बताया है कि कभी सोवियत संघ का हिस्सा रहे इन देशों को आश्वस्त करने के लिए ये कदम उठाया गया है. ये देश इस बात से घबराए हुए हैं कि पुतिन अपने व्यापक लक्ष्य के तहत नेटो पर इस बात का दबाव डालेगा कि नेटो सेनाएं उसके पूर्वी छोर से पीछे हट जाएं.
लेकिन इस हफ़्ते यूक्रेन पर हुए हमले ने एक व्यापक संघर्ष की आशंकाओं को जन्म दिया है जो या तो दुर्घटनावश शुरू हो सकता है या फिर रूस के हमले की वजह से बड़ा आकार ले सकता है.
अगर ऐसा हुआ तो इससे एक बड़े संघर्ष की शुरूआत हो सकती है क्योंकि फिर इस युद्ध में नेटो सदस्य देशों को उतरना होगा. और दोनों ही सूरतों में अमेरिका को युद्ध में सीधे तौर पर शिरकत करनी होगी.
बाइडन ने पहले ही रूस की तरफ इशारा करते हुए कहा था "अगर वह नेटो देशों में कदम रखते हैं तो हमें भी (युद्ध में) शामिल होना होगा."
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