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Explainer: लाल सागर से इराक तक, सीरिया से पाकिस्तान तक.. ईरान एक साथ कई जगहों पर क्यों लड़ने लगा लड़ाई?

Iran-Pakistan Conflict: इजराइल के खिलाफ लड़ाई में हमास का समर्थन, लाल सागर में जहाजों पर हमला करने के लिए हूती विद्रोहियों का समर्थन, यमन में अमेरिकी हमले के खिलाफ हूतियों का समर्थन, लेबनान, सीरिया, इराक और अब पाकिस्तान...।

1,800 मील की इस दूरी में फैले संघर्ष में एक नाम जो हर फ्लैशप्वाइंट पर गूंज रहा है, वो नाम है ईरान का। तेहरान ने लेबनान और यमन जैसे स्थानों में लड़ाकों को पर्दे के पीछे से समर्थन देकर और इस सप्ताह इराक, सीरिया और पाकिस्तान में लक्ष्यों पर सीधे मिसाइल हमलों के साथ दुनिया की राजनीति को गर्म कर दिया है।

Iran-Pakistan Conflict

कई देशों में समान विचारधारा वाले तत्वों के साथ अलग अलग मीलिशिया का दशकों से निर्माण करना और जियो-पॉलिटिक्स को अपने हिसाब से कंट्रोल करने की चाहत में ईरान आज एक ऐसा देश बन चुका है, जिसके इस क्षेत्र में दोस्त से ज्यादा दुश्मन हैं।

हालांकि, ईरान के पड़ोसी देश भी ऐसी ही नीति अपनाते रहे हैं, लिहाजा पड़ोसी देशों की ही तरह, ईरान को भी सशस्त्र अलगाववादी आंदोलनों और आतंकवादी समूहों का सामना करना पड़ता है, जो आसानी से ईरान की सीमाओं पर फैले हुए हैं।

लेकिन, इजराइल-हमाल के बीच चल रही लड़ाई के बीच सवाल ये उठ रहे हैं, कि पाकिस्तान का गाजा से क्या लेना-देना है? आइये जानते हैं, कि कि ईरान हाल के तनावों को एक साथ कैसे जोड़ रहा है?

ईरान की अतीत की कहानी

1979 की क्रांति के बाद से, जिसने ईरान को शिया मुस्लिम देश बना दिया, वह अलग-थलग पड़ गया है और खुद को चारों तरफ से घिरा हुआ महसूस कर रहा है।

ईरान, संयुक्त राज्य अमेरिका और इज़राइल को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानता है - चार दशकों से ज्यादा समय से ईरान के अलग अलग नेताओं ने इज़राइल को नष्ट करने की कसम खाई है। यह खुद को फारस की खाड़ी क्षेत्र में सबसे शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में भी स्थापित करना चाहता है, जहां इसका मुख्य प्रतिद्वंद्वी सऊदी अरब है, जो अमेरिका का सालों से अहम सहयोगी रहा है, और ईरान, सउदी अरब (हालिया समय में दोस्ती की कोशिशों को छोड़कर) के साथ साथ कुछ अन्य मुख्य रूप से सुन्नी मुस्लिम अरब पड़ोसियों के साथ शत्रुतापूर्ण संबंध रखता है।

लिहाजा, मिडिल ईस्ट में अपना वर्चस्व कायम रखने के लिए ईरान ने दशकों से कई आतंकी संगठनों को फंड दिए हैं, हथियार पहुंचाए हैं और यहां तक की, टेक्नोलॉजिक सपोर्ट और युद्ध को लेकर दिशा-निर्देश भी दिए हैं। हालांकि ईरानी सेनाएं, सीरिया और इराक में युद्धों में सीधे तौर पर शामिल रही हैं, लेकिन तेहरान ने ज्यादातर विदेशों में अपने दुश्मनों के जरिए छद्म तरीके से लड़ाई लड़ी है।

न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज में मध्य पूर्व नीति के एक वरिष्ठ साथी हसन अलहसन ने कहा, कि "ईरान खुद को और इन मिलिशिया को अमेरिका और इजराइली शक्तियों के खिलाफ एक धूरी बताता है और इस लड़ाई को 'अपनी निजी लड़ाई' ठहराता है।"

ईरानी नेता अपने इस संघर्ष को देश की रक्षा की रणनीति बताते हैं और कहते हैं, कि अपनी रक्षा के लिए देश को अपनी सीमाओं के बाहर कार्रवाई करनी होगी।

अलहसन ने कहा, "अगर ईरान को अपनी जमीन पर इजराइल और अमेरिका के खिलाफ लड़ाई लड़ने से बचना है, तो उसे देश के बाहर जंग फैलानी होगी। और वह इराक, सीरिया, यमन, फिलिस्तीन, अफगानिस्तान में है।"

लिहाजा, अब यह सवाल उठ रहे हैं, कि ईरान की यह रणनीति कितनी अच्छी तरह से काम कर रही है?

हाल ही में ईरान की धरती पर आतंकी समूहों ने हमला किया है और ईरान के सैन्य ठिकानों, खासकर परमाणु ठिकानों पर इजराइल कई बार हमले कर चुका है, जिसमें ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े कई लोग मारे गये हैं और ईरानी परमाणु ठिकाने भी नष्ट हुए हैं।

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नये-नये संघर्ष क्यों फैला रहा ईरान?

हालांकि, ईरान अपनी शक्ति और प्रभाव का प्रदर्शन भी करना चाहता है, लेकिन वह संयुक्त राज्य अमेरिका या उसके सहयोगियों, खासतौर पर इजराइल से सीधे तौर पर भिड़ने की हिम्मत नहीं रखता है, क्योंकि ये ईरान के लिए आत्मघाती कदम होगा।

ईरान के नेता सत्ता पर अपनी पकड़ को लेकर कितना सुरक्षित महसूस करते हैं, यह भी साफ नहीं रहता है। लेकिन वे जानते हैं, कि दशकों के प्रतिबंधों ने ईरान की सैन्य ताकत और उसकी अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर दिया है, और उनकी दमनकारी सरकार को तीव्र घरेलू विरोध का सामना करना पड़ रहा है।

ईरान ने परमाणु हथियार विकसित करके अपनी कमजोरियों की भरपाई करने की उम्मीद की है, जो इसे पाकिस्तान और इज़राइल के बराबर और सऊदी अरब से आगे खड़ा कर देगा। लेकिन अभी तक इसके परमाणु कार्यक्रम से कोई बम नहीं बन पाया है।

इसके अलावा, प्रॉक्सी फोर्स (जैसे हमास, हूती विद्रोही, हिज्बुल्लाह) में निवेश - लेबनान, इराक और यमन में साथी शिया, और गाजा पट्टी में सुन्नी हमास - ईरान को अपने दुश्मनों के लिए परेशानी पैदा करने की इजाजत देता है, और हमला होने पर और अधिक परेशानी पैदा करने की संभावना बढ़ाता है।

वेस्ट पॉइंट पर कॉम्बैटिंग टेररिज्म सेंटर ने दिसंबर की एक रिपोर्ट में लिखा गया है, कि "प्रॉक्सी ताकतों ने ईरान को कुछ हद तक ग्लोबल पॉलिटिक्स में अपनी पूछ बरकरार रखने की अनुमति दी है, और ईरान के दुश्मन अकसर प्रॉक्सीज से लड़ाई में उलझे रह जाते हैं।"

ईरानी अधिकारियों ने सार्वजनिक रूप से इज़राइल पर हमास के 7 अक्टूबर के हमले में शामिल होने या आदेश देने से इनकार किया है, जिसमें लगभग 1,200 लोग मारे गए थे। लेकिन उन्होंने हमास के हमले को, एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में भी सराहा, और चेतावनी दी, कि अगर इजराइल, गाजा में हमास के खिलाफ युद्ध जारी रखता है, तो उनका क्षेत्रीय नेटवर्क इजरायल के खिलाफ कई मोर्चे खोलेगा।

जैसे हिज्बुल्लाह के लड़ाके लेबनान से इजराइल के खिलाफ हमले कर रहे हैं।

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ईरान के लिए ये प्रॉक्सी लड़ाके कौन हैं?

लेबनान में हिजबुल्लाह, जिसे व्यापक रूप से ईरान-सहयोगी सेनाओं में सबसे शक्तिशाली और हथियारों से लैस माना जाता है, उसकी स्थापना 1980 के दशक में ईरानी सहायता से की गई थी, विशेष रूप से दक्षिणी लेबनान पर इजरायली कब्जे से लड़ने के लिए। यह समूह, जो लेबनान में एक राजनीतिक दल भी है, लड़ाई की स्थिति में वो भले इजराइल से जीत नहीं सकता, लेकिन इजराइल को गंभीर नुकसान पहुंचाने की हैसियत रखता है।

इस वक्त भी हिजबुल्लाह, करीब करीब हर दिन इजराइल के खिलाफ गोलीबारी करता रहता है।

यमन में हौथी आंदोलन ने दो दशक पहले सरकार के खिलाफ विद्रोह शुरू किया था। अमेरिकी और मध्य पूर्वी अधिकारियों और विश्लेषकों के अनुसार, एक समय जो रैगटैग विद्रोही बल था, उसने कम से कम कुछ हद तक ईरान से गुप्त सैन्य सहायता के कारण शक्ति प्राप्त की।

ईरान का दूसरा प्रॉक्सी है, हूती विद्रोही। इसने 2014 और 2015 में यमन के अधिकांश हिस्से पर कब्ज़ा कर लिया। जिसका नतीजा ये हुआ, कि सऊदी अरब के नेतृत्व वाली गठबंधन सेना, यमन की सरकार का समर्थन करते हुए कई सालों से हूती विद्रोहियों के खिलाफ जंग लड़ रही है।

यमन में साल 2022 में आखिरकार युद्धविराम लागू हुआ, लेकिन यमन के उत्तर-पश्चिम और इसकी राजधानी सना पर अभी भी हूती विद्रोहियों का ही नियंत्रण है।

गाजा में युद्ध शुरू होने के बाद से, हूती विद्रोहियों ने इजरायली बमबारी के तहत फिलिस्तीनियों के साथ एकजुटता में एक अभियान चलाया है। उन्होंने इजराइल पर मिसाइलें और ड्रोन लॉन्च किए हैं, और स्वेज नहर की ओर या उससे आने वाले दर्जनों जहाजों पर हमला करके दुनिया के शिपिंग के एक महत्वपूर्ण हिस्से को बाधित कर दिया है।

ईरान की मदद से हूती विद्रोही इतने शक्तिशाली तो हो ही चुके हैं, कि अमेरिका और ब्रिटेन भी यमन के अंदर उनके ठिकानों पर बमबारी कर रहे हैं, लेकिन हूतियों को ज्यादा नुकसान नहीं हो पाया है।

हूती विद्रोहियों को फिलिस्तीनी क्षेत्रों में हमास को भी ईरान से हथियार और प्रशिक्षण प्राप्त हुआ है, और उसने इज़राइल के साथ बार-बार युद्ध लड़े हैं।

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ईरान ने पाकिस्तान के खिलाफ सीधे हमला क्यों किया?

इसका घरेलू स्तर पर सरकार की समस्याओं से बहुत संबंध है।

जैसे-जैसे पूरे क्षेत्र में तनाव बढ़ रहा है, तेहरान तेजी से निशाना बनता जा रहा है।

पिछले महीने, एक अलगाववादी समूह ने दक्षिणपूर्वी ईरान में एक पुलिस स्टेशन पर हमला किया था, जिसमें 11 लोगों की मौत हो गई थी। सीरिया में दो वरिष्ठ ईरानी कमांडरों की हत्या कर दी गई, जिसके लिए ईरान ने इजराइल को दोषी ठहराया है।

फिर इस महीने, ईरान के करमान में आत्मघाती बम विस्फोटों में लगभग 100 लोग मारे गए - इस्लामिक गणराज्य की स्थापना के बाद से ईरान में हुआ ये सबसे घातक आतंकवादी हमला था, जिसकी जिम्मेदारी इस्लामिक स्टेट ने ली है।

ईरान के विश्लेषकों और सेना के करीबी ईरानियों का कहना है, कि सरकार उन कट्टरपंथियों पर नजर रखते हुए अपनी ताकत का प्रदर्शन करना चाहती थी, जो उसके समर्थन का आधार हैं, और जो पहले से ही इजरायली हमलों से नाराज थे, लिहाजा ईरान आक्रामक हो गया है।

इस सप्ताह ईरान ने कहा, कि उसने सीरिया में इस्लामिक स्टेट पर मिसाइलें दागी हैं और दावा किया, उसने उत्तरी इराक में खुफिया जानकारी जुटाने के लिए एक इजरायली जासूस अड्डे को भी उड़ा दिया है। (इराकी सरकार ने इस बात से इनकार किया, कि जिस इमारत पर हमला किया गया, उसका संबंध इजराइल से था।)

और इसी कड़ी में ईरान ने पाकिस्तान में भी हमला कर दिया।

न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप के ईरान परियोजना के डायरेक्टर अली वेज़ ने कहा, कि "ईरान ने स्पष्ट रूप से संकेत दिया है, कि वह अपनी मातृभूमि की रक्षा से कम किसी भी चीज़ के लिए उन क्षमताओं को तैनात करने को तैयार नहीं है।"

पाकिस्तान का भला गाजा से क्या लेना देना?

अलगाववादी समूह जैश अल-अदल, ईरान और पाकिस्तान के कुछ हिस्सों में बलूच जातीय समूह के लिए एक मातृभूमि बनाना चाहता है, और यह सीमा के दोनों तरफ काम करता है। इसने पिछले महीने एक ईरानी पुलिस स्टेशन पर हुए घातक हमले की भी जिम्मेदारी ली थी।

ऐसा माना जाता है, कि जैश अल-अदल का गठन पाकिस्तान की सेना ने ईरान के खिलाफ प्रॉक्सी युद्ध लड़ने के लिए तैयार किया हुआ है। और दोनों देशों ने एक-दूसरे पर आतंकवादियों को सीमा पार करने से रोकने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाने का आरोप लगाया है।

ईरान ने कहा है, कि पाकिस्तान में उसके हमलों में जैश अल-अदल के ठिकानों को निशाना बनाया गया, लेकिन पाकिस्तान ने ईरान के तर्क को खारिज कर दिया और कहा, कि ईरानी हमले में कुछ बच्चे मारे गये हैं। गुरुवार को, पाकिस्तान ने ईरान के अंदर आतंकवादी ठिकानों पर बमबारी करके जवाब दिया है।

पाकिस्तान और ईरान के बीच अधिकतर सौहार्दपूर्ण संबंध रहे हैं, और उनके बीच के मतभेदों का ईरान के अन्य क्षेत्रीय संघर्षों से कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन पाकिस्तान के अंदर हमला करने के ईरान के फैसले से पाकिस्तान के साथ उसके रिश्ते खराब होने की कगार पर हैं। लिहाजा, एक्सपर्ट्स का कहना है, कि पाकिस्तान के अंदर जाकर हमला करने का स्टंट ईरान पर भारी भी पड़ सकता है और एक नये क्षेत्रीय संघर्ष को जन्म दे सकता है।

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