Trump Peace Board: गाजा पीस बोर्ड में भारत क्यों नहीं हुआ शामिल? अब आई असली वजह सामने
Trump Peace Board: भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने सोशल मीडिया पर बताया था कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गाजा के लिए बनाए गए 'बोर्ड ऑफ पीस' (BoP) में शामिल होने का न्योता दिया है। गोर के मुताबिक, भारत के इजरायल के साथ मजबूत रिश्ते हैं, वह फिलिस्तीनियों का समर्थन करता है और गाजा के पीड़ितों को मानवीय सहायता देने के लिए हमेशा तैयार रहता है। इन्हीं वजहों से ट्रंप को लगता है कि भारत इस बोर्ड के लिए सही विकल्प हो सकता है।
भारत की सुरक्षा और रणनीतिक सोच
हालांकि, सर्जियो गोर को भारत की रणनीतिक और सुरक्षा चिंताओं को पूरी तरह समझने में अभी वक्त लगेगा। उन्होंने हाल ही में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को अपने राजदूत के तौर पर परिचय पत्र सौंपे हैं। भारत संयुक्त राष्ट्र (UNO) का संस्थापक सदस्य है और इसी वजह से उसके लिए इस बोर्ड में शामिल न होने का एक बड़ा कारण यह है कि ट्रंप का यह BoP असल में संयुक्त राष्ट्र के विकल्प की तरह पेश किया जा रहा है, जो उसकी वैधता को सीधे चुनौती देता है।

'बोर्ड ऑफ पीस' क्या है?
ट्रंप ने सितंबर 2025 में 'बोर्ड ऑफ पीस' का प्रस्ताव रखा था। इसे "संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में स्थिरता, वैध शासन और स्थायी शांति" लाने की पहल बताया गया। लेकिन आलोचकों का मानना है कि इसके पीछे मानवीय भावना से ज़्यादा व्यापारिक सोच है। खासकर गाजा के रियल एस्टेट में संभावनाओं को देखते हुए ट्रंप ने इसे "मिडिल ईस्ट का असफल रिवेरा" तक कह दिया था।
गाजा को लेकर ट्रंप की सोच
पिछले साल फरवरी में इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ व्हाइट हाउस में हुई बैठक के दौरान ट्रंप ने गाजा को एक "विध्वंस स्थल" बताया। उन्होंने कहा कि यहां बड़े पैमाने पर पुनर्विकास की संभावना है। यहां तक कि उन्होंने सुझाव दिया कि अमेरिका गाजा को "अपने कब्जे में" लेकर इसे "खुद का" बना सकता है।
एक-व्यक्ति शो जैसा बोर्ड
15 जनवरी को इस बोर्ड की औपचारिक घोषणा हुई। ट्रंप ने कहा कि "संयुक्त राष्ट्र ने मेरी कभी मदद नहीं की।" खुद को 'चेयरमैन ट्रंप' बताते हुए उन्होंने साफ किया कि इस बोर्ड में वे बिना किसी सलाह के फैसले ले सकते हैं। इस पहल में वीटो की ताकत भी सिर्फ उनके पास होगी। इतना ही नहीं, स्थायी सदस्यता के लिए देशों से 1 बिलियन डॉलर की फीस की उम्मीद भी जताई गई है।
भारत क्यों सतर्क है?
भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और कूटनीतिक विश्वसनीयता के लिए जाना जाता है। वह ट्रंप के प्रयासों की मंशा की सराहना कर सकता है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र को कमजोर करने वाली किसी भी व्यक्तिगत, बिना मतलब के या पक्षपातपूर्ण शांति पहल से दूरी बनाए रखेगा। ट्रंप की व्यक्तिगत सोच पर आधारित यह बोर्ड भारत के लिए ऐसा मंच नहीं है, जिसमें शामिल होने का जोखिम लिया जाए। खासकर तब, जब ट्रंप के पद छोड़ने के बाद इसके खत्म हो जाने की भी पूरी संभावना है।
भारत की विदेश नीति की बुनियाद
आजादी के बाद से भारत की विदेश नीति गुटनिरपेक्षता, बहुपक्षवाद और राष्ट्रीय स्वाभिमान पर टिकी रही है। भले ही भारत को संयुक्त राष्ट्र के कामकाज पर कुछ आपत्तियां हों, लेकिन इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष या गाजा के पुनर्विकास जैसे संवेदनशील मुद्दों को वह हमेशा संयुक्त राष्ट्र के संस्थागत ढांचे के भीतर ही सुलझाने के पक्ष में रहा है।
ट्रंप बनाम भारत का नजरिया
इजरायल-फिलिस्तीन मुद्दे पर ट्रंप का रुख काफी हद तक इजरायल के पक्ष में झुका हुआ रहा है। उन्होंने यरूशलम को इजरायल की राजधानी मानने में जल्दबाजी दिखाई और फिलिस्तीनी प्राधिकरण (PA) को लगभग हाशिए पर डाल दिया। यह भारत की सोच से अलग है। भारत तेल अवीव को इजरायल की राजधानी मानता है और शांति प्रक्रिया में फिलिस्तीनी प्राधिकरण की अहम भूमिका का समर्थन करता है।
दो-राज्य समाधान पर भारत का फैसला, तीसरे की जरूरत नहीं
भारत लगातार इस बात पर जोर देता रहा है कि इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष का समाधान दो-राज्य सिद्धांत के तहत शांतिपूर्ण बातचीत से ही संभव है। चाहे यह संघर्ष हो या रूस-यूक्रेन युद्ध, भारत ने हमेशा आपसी बातचीत या संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में समाधान को प्राथमिकता दी है, न कि किसी तीसरे देश की मध्यस्थता को।
बिना BoP के भी भारत की भूमिका
ट्रंप के बोर्ड में शामिल न होने का मतलब यह नहीं है कि भारत मिडिल ईस्ट के मुद्दों से दूरी बना लेगा। भारत मानवीय और चिकित्सा सहायता, गाजा के पुनर्निर्माण में सहयोग, फिलिस्तीनी शरणार्थियों के लिए UNRWA का समर्थन, सभी पक्षों के साथ शांत कूटनीति, रामल्लाह में अपने प्रतिनिधि कार्यालय और संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व वाले अन्य प्रयासों के जरिए अपनी भूमिका निभा सकता है।
पहले भी लिया है ऐसा फैसला
यह पहली बार नहीं है जब भारत ने किसी एकतरफा अमेरिकी पहल से दूरी बनाई हो। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में भारत ने 2003 में इराक में सेना भेजने से इनकार कर दिया था। तब भारत ने साफ कहा था कि वह केवल संयुक्त राष्ट्र के तहत चलने वाले शांति अभियानों में ही हिस्सा लेगा।
आगे का रास्ता क्या?
अगर भारत ट्रंप के निजी प्रोजेक्ट का समर्थन करता है, तो उसकी अंतरराष्ट्रीय विश्वसनीयता को नुकसान पहुंच सकता है, क्योंकि इस बोर्ड को संयुक्त राष्ट्र की मान्यता नहीं है। भारत के लिए बेहतर रास्ता यही है कि वह व्हाइट हाउस पर दबाव बनाए कि 'बोर्ड ऑफ पीस' को संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियान विभाग (DPO) के तहत लाया जाए। यही विभाग गाजा समेत दुनिया के संघर्षग्रस्त इलाकों में शांति और सुरक्षा बनाए रखने के लिए काम करता है।
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