NATO में शामिल होगा भारत? जानिए कैसे इसका हिस्सा बनने के बाद देश की मुश्किलें बढ़ जाएंगी
NATO Member: भारत को कई बार नाटो में शामिल होने के लिए कहा जा रहा है लेकिन अभी तक इस पर भारत सरकार ने कोई फैसला नहीं लिया है।

Image: Oneindia
नाटो की एक वरिष्ठ अधिकारी ने भारत के इस ग्रुप में शामिल होने को लेकर बड़ी बात कही है। अमेरिका की स्थायी प्रतिनिधि जूलियन स्मिथ ने कहा है कि नाटो के दरवाजे भारत के लिए हमेशा खुले हुए हैं। वह जब चाहे तब इसमें शामिल हो सकता है। नाटो की प्रतिनिधि के इस ऑफर को लेकर कई तरह कई तरह की चर्चाएं चलने लगी हैं। कई विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान और चीन जैसे दो परमाणु संपन्न 'शत्रु पड़ोसियों' के रहते नाटो में शामिल होना एक अच्छा विकल्प हो सकता है। हालांकि कई विशेषज्ञों ने इसके कई नुकसान भी गिनाए हैं। आइए जानते हैं कि NATO में शामिल होने से क्या नुकसान हो सकते हैं!
1. भारत एक करीबी साथी खो देगा
नाटो मेंबर बनने से भारत और रूस के बीच लंबे समय से स्थापित मजबूत संबंधों पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। अमेरिका और भारत के संबंध बीते 2 दशक में बेहतर हुए हैं लेकिन रूस से भारत का रिश्ता आजादी के बाद से ही मधुर रहा है। रूस ने कई मौकों पर भारत की मदद की है। वो सोवियत का दौर हो या फिर उसके बाद रूस का... वहां के नेताओं ने हमेशा से ही भारत और उसके लोगों को उचित सम्मान दिया है। ऐसे में यदि भारत नाटो का हिस्सा बनता है तो भारत का एक दृढ़ और वफादार दोस्त छिन जाएगा। इससे भारत की छवि को भी नुकसान पहुंचेगा।
2. मजबूरी नहीं चलेगी, हर हाल में लड़ना होगा
भारत हमेशा से ही शांति का पक्षधर रहा है। लेकिन यदि भारत नाटो ग्रुप का मेंबर बनता है तो भारत को इसके फैसले मानने को बाध्य होना पड़ेगा। नाटो ग्रुप के अनुच्छेद 5 के तहत यदि किसी नाटो सहयोगी देश पर हमला होता है तो भारत को भी हर हाल में उस युद्ध में शामिल होना होगा। भारत के सामने भी ठीक वही मजबूरी होगी जिससे अभी तुर्की जूझ रहा है। तुर्की, रूस का करीबी मित्र रहा है मगर यदि रूस की नाटो संग लड़ाई होती है तो तुर्की के सैनिकों को रूस के खिलाफ लड़ना होगा।
3. अमेरिका के इशारे पर चलने की मजबूरी
नाटो ग्रुप वर्तमान में अपने सभी दायित्वों को पूरा करने के लिए अमेरिका के संसाधनों पर निर्भर है। नाटो को चलायमान रखने के लिए धन पर अत्यधिक निर्भरता ने कुछ देशों को मुश्किल स्थिति में डाल दिया है। क्या होगा यदि अमेरिका राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे की आड़ में किसी राष्ट्र पर हमला कर देता है? अमेरिका के लिए नाटो ग्रुप में बहुमत हासिल करना मुश्किल नहीं होगा। ऐसे में भारत को भी बहुमत के साथ चलते हुए अमेरिका के इशारों पर चलने की मजबूरी बन जाएगी।
4. जीडीपी का 2 फीसदी खर्च करना जरूरी
अमेरिका लंबे समय से यूरोपीय नाटो के सदस्य देशों की आलोचना करता रहा है कि वे नाटो के लिये पर्याप्त भुगतान नहीं करते हैं। वर्ष 2014 के वेल्स शिखर सम्मेलन में नाटो के सहयोगी सदस्य देशों ने जीडीपी का 2 फीसदी खर्च करने पर सहमति व्यक्त की थी। लेकिन महज 5 देश हैं जो 2 फीसदी से अधिक योगदान करते हैं। अमेरिका नाटो में अपनी जीडीपी का 3.61 फीसदी योगदान देता है। अमेरिका के अलावा, सिर्फ ग्रीस, यूनाइटेड किंगडम, एस्टोनिया और पोलैंड अपने फंडिंग दिशानिर्देशों को पूरा कर रहे हैं। वहीं, लक्जमबर्ग अपने राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद का केवल 0.44% योगदान देता है। जर्मनी भी 2 फीसदी खर्च नहीं कर पा रहा है। कनाडा, स्लोवेनिया, स्पेन और बेल्जियम सभी 1% जीडीपी से कम खर्च कर रहे हैं।
5. विश्वयुद्ध का खतरा बढ़ेगा
भारत यदि नाटो का हिस्सा बनता है तो ये ग्रुप बेहद मजबूत बन जाएगा। इससे न सिर्फ चीन बल्कि रूस, ईरान, उत्तरी कोरिया जैसे देश घबरा जाएंगे। ऐसी स्थिति में ये देश एकजुट होकर नाटो के खिलाफ ग्रुप बनाएंगे जिससे तीसरे विश्वयुद्ध का खतरा बढ़ जाएगा। तीसरा विश्वयुद्ध में परमाणु हमले की संभावना बढ़ जाएगी। जिसके दुनिया के लिए विनाशकारी परिणाम होंगे और ये हर एक शख्स को प्रभावित करेगा। इससे न केवल भारत बल्कि इस ग्रह पर मौजूद हर देश प्रभावित होगा। इसके परिणाम समस्त मानव जाति के लिए विनाशकारी साबित होंगे।












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