तालिबान-चीन गठजोड़ से अफगानिस्तान पर क्यों मंडराया नया खतरा ? जानिए
नई दिल्ली, 30 अगस्त: अफगानिस्तान में चीन तालिबान से सिर्फ पाकिस्तान के लिए ही साठगांठ नहीं कर रहा है। इसमें उसके अपने हित भी छिपे हुए हैं। शी जिनपिंग को लगता है कि तालिबान से दोस्ती करेंगे तो वह शिंजियांग प्रांत पर मंडराते खतरे को टाल सकता है। कहने की जरूरत नहीं है कि शिंजियांग प्रांत चीन के लिए अल्पसंख्यकों को प्रताड़ित करने की कैसी धरती है। यहां उइगर मुसलमानों पर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना के जुल्म की कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट आ चुकी है। चीन को अब लगता है कि तालिबान उइगरों पर जुल्म ढाते रहने में उसकी मदद कर सकता है।

ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट पर लगाम कसना चाहता है ड्रैगन
अफगानिस्तान पर दबदबे को लेकर तालिबान के विभिन्न गुटों में मतभेद की रिपोर्ट पहले ही सामने आ चुकी हैं। खुफिया जानकारी के मुताबिक कंधार में तालिबान लीडरशिप को लेकर बड़ा संघर्ष चल रहा है। लेकिन,चीन जिस तरह से अफगानिस्तान की आग में अपना हाथ डालने की कोशिश कर रहा है, उसके पीछे उसका सिर्फ यही मकसद नहीं है कि अमेरिका के जाने के बाद वहां पर अपनी पैठ बढ़ाना चाहता है। या फिर अपने राजनयिक और सैन्य दोस्त पाकिस्तान की मदद करना चाहता है। बल्कि, उसकी नजर उन 500 ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट (ईटीआईएम) के 500 लड़ाकों पर है, जो उइगरों के लिए शिंजियांग प्रांत को चीन से आजाद कराना चाहते हैं। 500 लड़ाकों का संकेत संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट से मिलता है।

ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट के आतंकी कौन हैं ?
यूएन की रिपोर्ट के मुताबिक ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट के 500 आतंकियों में से ज्यादातर तालिबान से ही निकले हैं। इसके अलावा उनमें ताजिक, उज्बेक, हजारा और चेचन अल्पसंख्यक लड़ाके शामिल हैं। यह लड़ाके मुख्य तौर पर अफगानिस्तान के उत्तर में स्थित बदख्शां प्रांत में हैं,जो कि वखान कॉरिडोर के जरिए चीन के शिंजियांग से जुड़ा हुआ है। वैसे तो परंपरागत रूप से तालिबान का ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट से नजदीकी रिश्ता है, लेकिन तालिबान में इसके उलट पश्तूनों का वर्चस्व है, जिनका दबदबा खासकर दक्षिणी अफगानिस्तान में हैं। उत्तरी अफगानिस्तान में तालिबान के कैडरों में पश्तून नहीं हैं और वहां अल्पसंख्यक ताजिक, उज्बेक, हजारा और चेचन ही उसके अधिकतर कैडर हैं।

चीन और तालिबान की साठगांठ से क्या होगा ?
चीन चाहता है कि तालिबान ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट पर लगाम लगाए। वह यह भी चाहता है कि अमेरिका इसे फिर से वैश्विक आतंकी संगठन घोषित करे। भले ही वह जैश ए मोहम्मद को संयुक्त राष्ट्र से वैश्विक आतंकी घोषित करने में खुद तीन साल तक अड़ंगा लगा चुका है। आशंका ये है कि कहीं चीन के दबाव में तालिबान ने अफगान अल्पसंख्यकों की प्रताड़ना शुरू करता है तो यह गैर-पश्तून ताकतें पंजशीर की शरण में जा सकते हैं। पहले से ही अफगानी और तुर्की खुफिया रिपोर्ट हैं कि अगर ईटीआईएम के खिलाफ तालिबान ने कार्रवाई शुरू की तो वह इस्लामिक स्टेट ऑफ खुरासान की गोद में जा सकता है; और यह पहले से ही तालिबान से अपनी अदावत जाहिर कर चुका है। यानी 31 अगस्त को अमेरिकी सेना की अफगानिस्तान से पूरी तरह से वापसी के बाद वहां जो हालात बनते नजर आ रहे हैं, उसमे स्थिरता आने की दूर-दूर तक कोई संभावना नजर नहीं आ रही है।(ऊपर की तस्वीरें-सांकेतिक)

तालिबान को अपनी ढाल बनाना चाहता है ड्रैगन
चीन का तालिबान शासन से एक और स्वार्थ है। वह तालिबान के सुन्नी पश्तून सरगनाओं से यह चाहता है कि वह अपनी बिरादरी के तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान पर दबाव डाले ताकि वह पाकिस्तान में चाइना पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (सीपीईसी) प्रोजेक्ट को बाधित ना करें। गौरतलब है कि हाल के दिनों में सीपीईसी से जुड़े प्रोजेक्ट में काम करने वाले चीनी नागरिकों को पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा से लेकर पीओके, बलूचिस्तान और ग्वादरर तक निशाना बनाया गया है।












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