अंतरिक्ष में क्यों भटकते हैं यान

Provided by Deutsche Welle

फ्लाईबाई -यानी अंतरिक्ष में किसी ग्रह का चक्कर लगाना. वैसे तो ये कोई नयी बात नहीं है. लेकिन एक दिन के अंतराल में एक ही ग्रह की दो फ्लाईबाई? ये तो खास है. अंतरिक्ष में पहली बार, अगस्त में दो यान शुक्र ग्रह के पास से गुजरे- बेपीकोलम्बो ने बुध का रुख किया और सोलर ऑरबिटर, सूरज के सफर पर है.

फ्लाईबाई न करें तो अपने लक्ष्य तक पहुंचना उनके लिए मुमकिन नहीं, ग्रैविटी भी मददगार होती है. लेकिन अफसोस, दोनों एक-दूसरे की फोटो नहीं उतार पाए. वे थे भी तो पांच लाख 75 हजार किलोमीटर दूर!

अंतरिक्ष यान की मदद करता है गुरुत्व

बेपीकोलम्बो अंतरिक्षयान शुक्र के पास से इसलिए गुजरा कि अपनी रफ्तार को धीमी करने में उससे मदद मिल सके. उसे अपनी "कक्षीय ऊर्जा" का बुध की कक्षीय ऊर्जा से मिलान कराना होता है. तभी वो बुध की कक्षा में दाखिल हो पाएगा.

बेपी चला था, धरती की कक्षीय ऊर्जा लेकर, जो काफी ज्यादा होती है. लेकिन अब उसे इतनी तेजी नहीं चाहिए. सीधी सी बात ये कि अपनी ऊर्जा वो शुक्र को दे रहा है और ग्रैविटी यानी गुरुत्व से उसे मदद मिल रही है- गुलेल जैसा खिंचाव और बदला हुआ रास्ता.

शुक्र पर शीत युद्ध

शीत युद्ध का दौर था जब अंतरिक्ष यात्रा की होड़ शुरू हुई थी. सबसे पहले सोवियत संघ ने 1961 में शुक्र ग्रह के पास अंतरिक्ष यान उड़ाने की कोशिश की थी लेकिन नाकाम रहा. उसे चुभा तो होगा लेकिन एक साल बाद ही अमेरिका अपना अंतरिक्ष यान, मैरीनर 2 भेजने में सफल रहा.

सोवियत संघ को अपनी पहली कामयाबी 1978 में मिली. तब तक अमेरिकियों ने बुध, मंगल और बृहस्पति की परिक्रमा कर डाली थी. लेकिन चांद पर सबसे पहले पहुंचने वाले थे- सोवियत अंतरिक्ष यात्री. यहां पर सोवियतों ने लंबा हाथ मारा.

छोर को भी छोड़ते वोयेजर

1977 में लॉन्च किए गए वोयेजर 1 और वोयेजर 2 अंतरिक्षयानों को बाहरी सौरमंडल को खंगालने के लिए भेजा गया था. दोनों धरती की समस्त ध्वनियों के गोल्डन रिकॉर्ड से लैस थेः एलियन्स को सुनाने के लिए हमारी दास्तान. दोनों यानों ने बृहस्पति, शनि, यूरेनस और नेपच्यून का चक्कर लगाया.

तस्वीरेंः हबल की नजर से

वी 1 ने तो बृहस्पति पर सैकड़ों वर्षो से जमा तूफान- ग्रेट रेड स्पॉट की फोटो भी खींची थी. वी 1 और वी 2 अब हमारे सौरमंडल से बाहर तारों के बीच किसी स्पेस में मंडरा रहे होंगे. उन्हें ही कहा जाता है "सबसे दूर स्थित मानव-निर्मित वस्तुएं."

बृहस्पति के उन्यासी चंद्रमा

लोग अक्सर इस अकेले, बोदे चंद्रमा को मोहब्बत और ताज्जुब से देखते हैं. और देखें भी क्यों ना, वो मज़ा कहां आता अगर हमारे पास बृहस्पति जैसे ढेर सारे, 79 चंद्रमा होते. वोयेजर 2 ने उनमें से एक खोज निकाला था (नेपच्युन के पांच चंद्रमा भी उसी ने खोजे थे).

और ये पता लगाने वाला वही था कि बृहस्पति के चंद्रमा यूरोपा में धरती से इतर जीवन का कोई रूप मौजूद हो सकता है. हमें इसके खारे महासागरों के बारे में जानने की इच्छा होती है. अपने अंतरिक्षयान यूरोपा क्लिपर के जरिए नासा इसके बारे में और जानना चाहता है.

टूट जाना और जल उठना...गर्व से

अगर आप सोचते हैं कि 79 चंद्रमा तो बहुत हैं तो जरा 82 का सोचिए. शनि महाराज के पास इतने ही हैं. शनि और उसके चंद्रमाओं की खोज में निकला कैसिनी अंतरिक्ष यान अमेरिका और यूरोप का साझा मिशन था. उसने शनि के चंद्रमाओं के 162 चक्कर लगाए.

इनमें टाइटन और एनसिलाडस चंद्रमा भी शामिल थे जहां उसे महासागर मिले. सौरमंडल को 13 साल तक खंगालते हुए एक रोज कैसिनी ने अपनी आखिरी डुबकी शनि पर लगाई. आखिरी समय तक वो अपनी रिपोर्ट जुटाता रहा.

प्लूटो जैसे अदना ग्रह का दौरा भी

वोयेजर 1 और 2 को हमारे सौरमंडल के छोर पर साथ मिल गया, नासा के न्यू होराइजन का. ग्रैविटी का धक्का लेने के लिए बृहस्पति के पास से गुज़रते हुए, छह महीने वो अदना से ग्रह प्लूटो के आसपास मंडराता रहा था.

उसके बाद उसने कुइपर बेल्ट का रास्ता लिया जहां उसने वोयेजर 1 को कैमरे में कैद किया. अंतरिक्ष यान पायनियर 10 और पायनियर 11 ही अब तक उतना दूर जा पाए थे. ये अभियान अंतरिक्ष के भूगर्भ और जीवन से जुड़े सवालों का जवाब देने में हमारी मदद करते हैं.

कभी नहीं खत्म होता अंतरिक्ष

और भी बहुत से नामचीन फ्लाईबाई मिशन सक्रिय हैं- अंतरिक्ष यान रोजेटा ने धरती और मंगल के चक्कर लगाए थे और फिर चुरी धूमकेतु का रुख किया था. हेली धूमकेतु को बारीकी से टटोलने वाला गियोटो भी था.

नासा का डीप स्पेस 1 मिशन, और उसी का डीप इम्पैक्ट मिशन, किसी धूमकेतु से सैंपल के साथ वापसी का पहला मिशन, स्टारडस्ट... और भविष्य में और भी बहुत कुछः धरती से पहली बार सुदूर अंतरिक्ष में दुर्लभ एस्टेरॉयड जोड़े- डिडीमोस से मिलने निकलेगा यूरोप का अंतरिक्ष यान, हेरा. क्यों? बात सारी ये जानने की है कि हम इस ब्रह्मांड में हैं कौन, और कहां पर हैं यानी हमारी हैसियत क्या है.

Source: DW

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