अफगानिस्तान के दुर्लभ खजाने को छूने से भी डर रहा ड्रैगन, जानें जिनपिंग का सपना क्यों हो रहा चकनाचूर?
अफगानिस्तान में अमेरिकी रिसर्च में कहा गया है, कि वहां अरबों-खरबों डॉलर का दुर्लभ खनिज भंडार छिपा हुआ है और जो उस भंडार पर कब्जा करेगा, आने वाले भविष्य में उसका वर्चस्व काफी बढ़ेगा।

China-Afghanistan News: अफगानिस्तान से अमेरिका के निकलने के बाद से ही चीन लगातार युद्धग्रस्त देश को लालची निगाहों से देखता आया है, लेकिन अभी तक चीन की ये हिम्मत नहीं हो पा रही है, कि वो अफगानिस्तान के दुर्लभ खजाने को छूने की भी हिम्मत कर सके। चीन के नए विदेश मंत्री किन गैंग ने 21 जनवरी को अपने अफगान समकक्ष और तालिबान के नेता आमिर खान मुत्तकी से अचानक वीडियो कॉन्फ्रेंस पर बात की और इस दौरान चीन का डर सामने आ गया।

अफगानिस्तान में डर गया ड्रैगन
अफगानिस्तान के तालिबान शासक बार बार चीन को अफगानिस्तान में आकर दुर्लभ खनिज भंडार को निकालने का ऑफर दे रहे हैं, लेकिन डरपोग ड्रैगन अफगानिस्तान में घुसने की हिम्मत तक नहीं कर पा रहा है। चीन के नये विदेश मंत्री किन गैंग ने अफगानिस्तान के विदेश मंत्री मुत्तकी से पिछले साल नवंबर-दिसंबर में काबुल के एक होटल पर विनाशकारी हमले के बाद अफगानिस्तान में चीनी नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का आग्रह किया है। इस दौरान चीनी विदेश मंत्री ने अफगान विदेश मंत्री से कहा, कि "चीन अफगानिस्तान में चीनी कर्मियों, संस्थानों और परियोजनाओं की सुरक्षा को बहुत महत्व देता है। उम्मीद है कि अफगान पक्ष अफगानिस्तान में चीनी कर्मियों और संस्थानों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कड़े कदम उठाएगा।

चीन को निशाना बना रहा ISIS
दरअसल, अफगानिस्तान में चीन के फंसने की वजह तालिबान के खिलाफ एक्टिव आतंकी संगठन आईएसआईएस-खुरासान है। इस्लामिक स्टेट-खुरासान ने 12 दिसंबर 2022 को काबूल होटल हमले की जिम्मेदारी ली थी, जिसमें पांच चीनी नागरिक घायल हो गए थे। आईएसआईएस-खुरासान खास तौर पर अफगानिस्तान में चीनी नागरिकों को और प्रोजेक्ट्स को निशाना बना रहा है। लिहाजा, चीन को अफगानिस्तान में नये निवेश को लेकर काफी डर है। पिछले दिनों ये भी रिपोर्ट आई थी, कि तालिबान प्रशासन, चीन के रवैये से काफी नाराज है।

अफगानिस्तान में चीन की नजर
जब साल 2020 में अमेरिका, अफगानिस्तान से बाहर निकल आया, तो बीजिंग ने खनिज भंडार से समृद्ध अफगान क्षेत्रों में काम करने की कवायद काफी तेज कर दी। चीन के दिमाग में शीर्ष पर एक दुर्लभ खनिज भंडार लिथियम है, जो कुछ अनुमानों के मुताबिक, अफगानिस्तान में भारी मात्रा में है और बोलीविया में दुनिया के सबसे बड़े लिथियम भंडार को टक्कर देता है। इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवीएस) और अन्य इलेक्ट्रिक उपकरण उद्योगों का अगला वैश्विक केंद्र बनने की चीन की महत्वाकांक्षा लिथियम बूम पर दांव लगा रही है। इसने चीनी राज्य और निजी उद्यमों को अधिकांश पश्चिमी खिलाड़ियों की तरह अफगानिस्तान के लिथियम भंडार पर जोर देने के लिए प्रेरित किया है। लिहाजा, चीन ने अवैध तरीके से लिथियम को सुरक्षित करने की खोज शुरू करने की कोशिश की।

अमेरिका ने खोजा था खनिज भंडार
2001 में अमेरिका ने तालिबान की सत्ता को अफगानिस्तान में बर्खास्त कर दिया गया। जिसके बाद अमेरिकन जियोलॉजिकल सोसायटी के सर्वेक्षण ने अफगानिस्तान के अंदर एक सर्वेक्षण शुरू किया था। 2006 में अमेरिकी शोधकर्ताओं ने चुंबकीय गुरुत्वाकर्षण और हाइपरस्पेक्ट्रल सर्वेक्षणों के लिए हवाई मिशन भी किए थे। जिसमें पता चला था कि अफगानिस्तान में अकूत मात्रा में लोहा, तांबा, कोबाल्ट, सोना के अलावा औद्योगिक रूप से महत्वपूर्ण लिथियम और नाइओबियम के विशालकाय खनिज मौजूद है। ये ऐसे खनिज हैं, जो रातों रात किसी भी देश की तकदीर को हमेशा के लिए बदल सकते हैं। वहीं, नाटो के 16वें सुप्रीम एलाइड कमांडर जेम्स स्टावरिडिस ने पिछले साल कहा था, कि ''चीन माइक्रोचिप्स से लेकर इलेक्ट्रिक कार बैटरी तक हर चीज के लिए रणनीतिक आपूर्ति श्रृंखला पर जितना हो सके उतना नियंत्रण मजबूत करना चाहता है, इसीलिए वो काबुल में प्रधानता चाहते हैं।'

बेहद दुर्लभ धातु है लिथियम
इन सब खनिजों में से लिथियम की मांग के कारण अफगानिस्तान को 'सऊदी अरब' भी कहा जाता है। दरअसल, कार से लेकर लैपटॉप और मोबाइल की बैटरी में लिथियम का इस्तेमाल होता है। अमेरिकी रक्षा विभाग पेंटागन ने ही कहा था कि अफगानिस्तान का लिथियम सऊदी अरब बन जाएगा। जलवायु परिवर्तन को देखते हुए यह तय है कि आने वाले वक्त में जीवाश्म ईंधन की जगह इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की मांग काफी ज्यादा बढ़ने वाली है। ऐसे में लिथियम जैसे खनिजों की भारी मौजूदगी अफगानिस्तान की किस्मत हमेशा हमेशा के लिए बदल सकती है, बशर्ते उसका सही तरीके से इस्तेमाल है और वो इस्तेमाल अफगानिस्तान के अंदर बनने वाली सरकार करे। उसपर किसी बाहरी शक्ति का नियंत्रण ना हो।












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