5 दिनों के बाद भी कनाडा नहीं जुटा पाया अंतर्राष्ट्रीय समर्थन, जस्टिन ट्रूडो सबूत दिखाएंगे या माफी मांगेंगे?
Canada-India Conflict: 19 सितंबर को कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने कनाडाई संसद में दावा किया था, कि कनाडा के पास अलगाववादी सिख नेता हरदीप सिंह निज्जर की हत्या में भारतीय सरकारी एजेंटों के शामिल होने की खुफिया जानकारी है, और उनकी इस घोषणा ने पूरी दुनिया में हड़कंप मचा दिया, लेकिन ऐलान के पाच दिन बीतने के बाद भी जस्टिन ट्रूडो ने सबूत पेश नहीं किया है।
जस्टिन ट्रूडो उम्मीद कर रहे थे, कि उन्हें अपने सहयोगियों से समर्थन मिलेगा, लेकिन यहां पर उन्हें जोरदार झटका लगा है। जी7 देश, जिसका खुद कनाडा सदस्य है, उसने खालिस्तानी आतंकवादी की हत्या को लेकर संयुक्त बयान जारी करने से इनकार कर दिया है, तो आई फाइफ के दो देश, जापान और न्यूजीलैंड की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी गई है।

नई दिल्ली में आयोजित जी20 शिखर सम्मेलन की मेजबानी के कुछ ही दिनों बाद कनाडाई प्रधान मंत्री जस्टिन ट्रूडो का दुर्लभ हमला पश्चिमी देशों को अजीब स्थिति में डाल रखा है।
अलजजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, कनाडा के सबसे महत्वपूर्ण सहयोगियों में से किसी ने भी, जिनमें अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, ऑस्ट्रेलिया या न्यूजीलैंड शामिल हैं और ये सभी, "फाइव आइज़" खुफिया-साझाकरण गठबंधन में एक साथ मजबूती से बंधे हुए हैं, उन्होंने जस्टिन ट्रूडो के आरोपों को खास तवज्जो नहीं दिया है।
जापान और न्यूजीलैंड को छोड़कर अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया ने चिंता जरूर जाहिर की और पूरी जांच का आग्रह किया हैस लेकिन जून में कनाडा की धरती पर सिख अलगाववादी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या में कथित संलिप्तता के लिए, भारत की निंदा करने के लिए किसी ने भी कदम नहीं उठाया है।
कनाडा को क्यों नहीं मिला साथ?
कुछ विशेषज्ञों का कहना है, कि ऐसा मुख्य रूप से चीन की वजह से है। बीजिंग की बढ़ती शक्ति और आक्रामकता की वजह से कनाडा के सहयोगी देशों को भारत के साथ संबंधों को मजबूत करना पहली प्राथमिकता है।
ओटावा के कार्लटन विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय संबंधों की प्रोफेसर स्टेफ़नी कार्विन ने कहा, कि "चीन को संतुलित करने के लिए पश्चिमी देशों के कैलकुलेशन में भारत महत्वपूर्ण है, और कनाडा नहीं है।"
उन्होंने कहा, "यह वास्तव में कनाडा को अन्य सभी पश्चिमी देशों से पीछे रखता है।"

मुश्किल स्थिति में क्यों है ब्रिटेन?
अललजीरा के मुताबिक, सिर्फ चीन फैक्टर नहीं है, बल्कि भारत का महत्व इससे कहीं ज्यादा है। भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है और कई विश्लेषकों का मानना है, कि यह 2027 तक जापान और जर्मनी को पछाड़कर दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगी।
1.4 अरब से ज्यादा लोगों और दुनिया की सबसे बड़ी सेनाओं में से एक के साथ, यह विश्व मामलों में एक अग्रणी शक्ति बन गया है।
लिहाजा, कनाडा के जितने भी सहयोगी हैं, उनके लिए भारत के खिलाफ जाना तो दूर, भारत के खिलाफ दो शब्द बोलना भी काफी मुश्किल बना देता है।
टोरंटो में मंक स्कूल ऑफ ग्लोबल अफेयर्स के राजनीतिक वैज्ञानिक, जेनिस स्टीन ने कहा, कि "मुझे लगता है कि ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और ब्रिटेन ने वही किया, जैसा उनसे उम्मीद थी।"
नई दिल्ली स्थित सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के एक वरिष्ठ फेलो सुशांत सिंह ने इस पर सहमति व्यक्त की। उन्होंने कहा, कि "जब तक पश्चिम को चीन का मुकाबला करने के लिए भारत की आवश्यकता है, तब तक भारत के खिलाफ जाने की संभावना नहीं है।"
सोमवार को, ट्रूडो ने कहा कि वैंकूवर के बाहर नकाबपोश बंदूकधारियों द्वारा 45 साल के हरदीप सिंह निज्जर की हत्या में भारतीय संलिप्तता के "विश्वसनीय आरोप" है, जो भारत के लिए मोस्ट वांटेड रहा है। ट्रूडो के आरोप के बाद कनाडाई विदेश मंत्रालय ने भारतीय डिप्लोमेट को देश से निकाला, तो भारत ने भी उसी तरह की कार्रवाई करते हुए कनाडाई वरिष्ठ डिप्लोमेट को भारत से निकाल बाहर किया।
इसके ठीक एक दिन बाद, जब भारत ने कनाडा के एक शीर्ष राजनयिक को निष्कासित करके टकराव को आगे बढ़ा दिया, तो ट्रूडो स्थिति को संभालने वाले अंदाज में दिखे और उन्होंने संवाददाताओं से कहा, कि कनाडा "उकसाने या आगे बढ़ने की कोशिश नहीं कर रहा है"।
कनाडा के द ग्लोब एंड मेल अखबार में बुधवार को पहले पन्ने की हेडलाइन में लिखा है, "प्रधानमंत्री ने आलोचना को धीमा कर दिया है, क्योंकि सहयोगियों ने मारे गए सिख नेता पर भारत की निंदा करने से इनकार कर दिया।"
कनाडाई सरकार के आरोप ब्रिटेन के लिए विशेष रूप से अजीब हैं, जो भारत के साथ मुक्त व्यापार समझौते की मांग कर रहा है।
ब्रिटिश प्रधान मंत्री ऋषि सनक के प्रवक्ता मैक्स ब्लेन ने कहा, कि "ये गंभीर आरोप हैं और कनाडाई अधिकारियों को उन पर गौर करना चाहिए।" लेकिन, उन्होंने स्पष्ट कर दिया, कि भारत के साथ बातचीत में इस तरह का कोई मुद्दा नहीं उठाया जाएगा और ब्रिटेन भारत के साथ मुक्त व्यापार समझौते पर बातचीत आगे बढ़ाएगा, ना कि ऐसे मुद्दों को फ्री ट्रेड पर होने वाली बातचीत में मिलाएगा।
लंदन में चैथम हाउस थिंक टैंक के भारत विशेषज्ञ चिटिग बाजपेयी ने कहा, ब्रिटेन, कनाडा का समर्थन करने और भारत का विरोध करने के बीच फंस गया है।
उन्होंने कहा, "भारत की संलिप्तता का कोई निश्चित सबूत नहीं होने के कारण, मुझे लगता है कि यूके की प्रतिक्रिया मौन रहने की संभावना है।" बाजपेयी ने कहा, कि मुक्त व्यापार समझौता भारत और ब्रिटेन दोनों के लिए एक "बड़ी राजनीतिक जीत" होगी।
बाइडेन प्रशासन का क्या है रूख?
अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन की तरफ से शनिवार को जो बयान आया है, उसमें उन्होंने बस इतना कहा है, कि 'ये मामला गंभीर है, जांच होनी चाहिए और किसी भी देश को विशेष छूट नहीं मिलेगी।'
जबकि, अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स में बार बार दावा किया जा रहा है, कि जब "हरदीप सिंह निज्जर का मुद्दा जस्टिन ट्रूडो ने अमेरिकी राष्ट्रपति के सामने उठाया था, तो उन्होंने भारत की आलोचना या निंदा करने से इनकार कर दिया था।"
हालांकि, अमेरिका और कनाडा, दोनों देशों के विदेश मंत्रालय ने इन रिपोर्ट्स को खारिज कर दिया है, लेकिन हकीकत ये है, कि ट्रूडो के बयान के पांच दिनों के बाद भी अमेरिका ने भारत की निंदा नहीं की है, लिहाजा अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स को ही बल मिलता है।
व्हाइट हाउस के राष्ट्रीय सुरक्षा प्रवक्ता जॉन किर्बी ने कहा कि ऐसी कोई भी रिपोर्ट, कि अमेरिका ने कनाडा को फटकार लगाई है, "पूरी तरह झूठी" है।
लेकिन इसके आगे उन्होंने कहा, कि भारत के साथ अमेरिकी संबंध "न केवल दक्षिण एशिया क्षेत्र के लिए बल्कि निश्चित रूप से इंडो-पैसिफिक के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण हैं।"
लेकिन, एक्सपर्ट्स का कहना है, कि अमेरिका भारत और कनाडा के बीच में नहीं आना चाहता है और बाइडेन प्रशासन की कोशिश है, कि ये मामला कनाडा और भारत के बीच का द्विपक्षीय मामला बन जाए।
वहीं, ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री सिर्फ 'आरोप चिंताजनक हैं और जांच होनी चाहिए', कहकर पल्ला झाड़ लिया है। जबकि, जापान और न्यूजीलैंड की तरफ से पांच दिन बीतने के बाद भी कोई बयान जारी नहीं किया गया है।
दूसरी तरफ, कनाडा ने अभी तक हत्या में भारत की संलिप्तता का कोई सबूत नहीं दिया है।
वहीं, दुनियाभर की तरफ से कनाडा सरकार से खालिस्तानी नेताओं के हिंसक बयानों के लिए जवाब मांगे जा रहे हैं। खालिस्तानी नेताओं के हिंसक बयान, जिसमें भारत और हिन्दुओं के खिलाफ हिसक बाते हैं, उन्हें लेकर जवाब मांगे जा रहे हैं, कि क्या ये भी खालिस्तानियों का फ्रीडम ऑफ स्पीच है।
कुल मिलाकर स्थिति ये है, कि जस्टिन ट्रूडो ने खालिस्तानियों के मुद्दे को इतना बढ़ा दिया है, कि खालिस्तानियों की एक एक हरकत के लिए अब उनसे जवाब मांगा जाएगा और खालिस्तानियों ने ऐसे ऐसे अपराध किए हैं, जिनका जवाब ट्रूडो कभी नहीं दे पाएंगे।












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