जल रहा है पाकिस्तान का बैकयार्ड, चीन के अरबों डॉलर का प्रोजेक्ट होगा स्वाहा, बलूचिस्तान कैसे बन गया बुरा सपना?
Balochistan News: जो बलूचिस्तान राज्य आज नक्शे पर दिख रहा है, वो 1970 में अस्तित्व में आया था, लेकिन ब्रिटिश राज से पहले, बलूचिस्तान चार रियासतों में विभाजित था, कलात, लसबेला, मकरान और खारन.. और ये सभी रियासत कलात खान के अधीन थे।
नेपाल और भूटान की रियासतों के विपरीत, बलूचिस्तान से उसकी संप्रभुता को छीन लिया गया और पाकिस्तान ने उस भूभाग पर साल 1948 में कब्जा जमा लिया। पाकिस्तान के अधीन होने के बाद से, बलूच राष्ट्रवादियों और "स्वतंत्रता-समर्थक" लगातार आजादी के लिए आंदोलन चला रहे हैं और बलूचों ने स्वतंत्रता के लिए कई आंदोलन किए हैं।
जिसके जवाब में, पाकिस्तान की सेना ने आंदोलनकारियों पर बर्बर कार्रवाइयं की। पाकिस्तान की सेना ने हजारों-हजार बलूचों को घर से उठवा लिया और उन्हें मारकर फेंक दिया। बलूचिस्तान, जो प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर क्षेत्र है, उसे चीनियों के हवाले कर दिया।

बलूचिस्तान में क्यों फूट रहे विद्रोह के अंगारे?
बलूचिस्तान में चीनियों की उपस्थिति ने अशांति की आग लगा दी है। चीन और पाकिस्तान की साझेदारी के तहत 62 अरब डॉलर का चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) एक दशक से चल रहा है। सीपीईसी, जिसमें कई विकास और बुनियादी ढांचा परियोजनाएं शामिल हैं, उसने कई चीनी इंजीनियरों को पाकिस्तान की तरफ आकर्षित किया।
बलूचिस्तान में चीनी आबादी बढ़ने के साथ, बलूचों के हाशिए पर चले जाने के डर से बलूच विद्रोहियों ने चीनी नागरिकों और पाकिस्तानी सैन्य कर्मियों पर हिंसक हमले करने शुरू कर दिए हैं।
सीपीईसी के महत्व को देखते हुए, बलूच स्वतंत्रता समूहों को डर है, कि उनके स्वतंत्रता संग्राम को कुचल दिया जाएगा, लिहाजा अब ये भावनाएं, बलूचिस्तान के उग्रवाद और विद्रोह की जड़ बन गई हैं। बलूचिस्तान के फ्रीडम फाइटर्स ने अब हथियारों के दम पर चीन और पाकिस्तान को अपनी जमीन से खदेड़ने का विकल्प चुना है।
बलूचिस्तान का इतिहास क्या है?
1948 से पहले तक बलूचिस्तान एक संप्रभू राज्य हुआ करता था, जिसपर कलात के छठवें खान (नजीर खान) का शासन था। उन्हें बलूच सेना और प्रशासनिक संरचना बनाने और अफगानों से लड़ने का श्रेय दिया जाता है।
बलूचिस्तान पर अंग्रेजों की तरफ से दो चरणों में प्रेशर बनाा गया। पहले 1837 से 76 के बीत, जब कलात के खान को संधियों पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर किया गया और उन्हें ब्रिटिशों को अधीन वाणिज्यिक और सैन्य पहुंच की अनुमति दी।
दूसरी बार ने भारत के वायसराय लॉर्ड लिटन ने बलूचिस्तान में एक सैन्य छावनी का निर्माण किया और उसके बाद बलूचिस्तान की संप्रभुता सिर्फ औपचारिक तौर पर ही रही। यानि, अंग्रेजों का बलूचिस्तान पर शासन था, लेकिन अंग्रेज बलूचिस्तान को एक संप्रभू राज्य कहते थे।
1930 के दशक में, अंजुमन-ए-इत्तियाद-ए-बलूचिस्तान (बलूचिस्तान की एकता के लिए संघ) के तहत बलूच बुर्जुआ वर्ग के विद्रोह ने उपनिवेशवाद और सरदारी प्रणाली को समाप्त कर दिया।
1947 में, कलात के खान 12 अगस्त 1947 को बलूचिस्तान की स्वतंत्रता की घोषणा जारी करने में सफल रहे।
हालांकि, कलात की स्वतंत्रता क्षणभंगुर थी। 1948 में मोहम्मद अली जिन्ना ने कलात के खान को विलय पत्र पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर करने के लिए क्रूर बल का प्रयोग किया। पाकिस्तान ने अपनी सेना भेजकर बलूचिस्तान पर कब्जा कर लिया और उसी वक्त पाकिस्तान के खिलाफ पहला बलूच विद्रोह हुआ था।

प्रिंस अब्दुल करीम के नेतृत्व में बलूच राष्ट्रवादी, पाकिस्तान के खिलाफ उठ खड़े हुए। दुर्भाग्य से, आंदोलन को पाकिस्तान की सेना ने कुचल दिया।
बाद में 1954 में, पाकिस्तान ने धर्म और भूगोल के आधार पर पश्चिमी पाकिस्तान को समग्र रूप से मिलाने के लिए एक "एक-इकाई योजना" योजना तैयार की। इससे बलूच जनजातियां उग्र हो गईं। पाकिस्तान की कोशिश, बलूचों पर ऊर्दू थोपने और बलूचों की आबादी का विभाजन करना था, जिसके बाद बलूचों ने दूसरा विद्रोह कर दिया।
1960 के दशक में तीसरा बलूच विद्रोह हुआ, जब पाकिस्तानी सरकार ने सरदारी प्रथा को रद्द कर दिया। बलूच विद्रोह में वृद्धि सुई गैस क्षेत्रों से राजस्व में समान हिस्सेदारी की मांग के साथ शुरू हुई, जो अब बलूचिस्तान में पाकिस्तान द्वारा नियंत्रित है।
आंदोलन पर अंकुश लगाने के लिए पाकिस्तान ने अंधाधुंध हवाई हमले, बमबारी और सैन्य बल प्रयोग किया।
चौथा विद्रोह इसलिए हुआ, क्योंकि राष्ट्रपति भुट्टो ने बलूच राष्ट्रवादियों पर देशद्रोह का आरोप लगाया। बलूचिस्तान और एनडब्ल्यूएफपी की प्रांतीय सरकार भंग कर दी गई और उन क्षेत्रों में मार्शल लॉ लागू कर दिया गया।
2004 से चल रहा पांचवां विद्रोह जनरल परवेज़ मुशर्रफ के सैन्य शासन के तहत शुरू हुआ। पिछले विद्रोहों के विपरीत, बुगती जनजाति के नेतृत्व वाला विद्रोह 2006 में पाकिस्तानी सरकार द्वारा नवाब अकबर बुगती की हत्या के कारण शुरू हुआ।
बलूचों ने पाकिस्तानी सरकार पर निशाना बनाकर बड़े पैमाने पर बलूचों की हत्या का आरोप लगाया। हजारों-हजार बलूच युवाओं को उनके घर से उठा लिया गया और पिछले 15 से 20 सालों से वो अपने घर नहीं लौटे हैं। कहा जाता है, कि हजारों युवाओं की पाकिस्तानी सेना ने हत्या कर दी।

तपते-तपते जलने लगा बलूचिस्तान
पाकिस्तानी सेना की जुल्म ने बलूचिस्तान को बारूद की भट्टी बना दिया।
2016 में, रिपोर्टें सामने आईं कि बलूच लड़ाकों ने अपने हथियार सौंपने के बदले में पाकिस्तान के सुलह प्रस्तावों पर विचार किया था। उसी साल पाकिस्तानी समाचार मीडिया ने, 600 विद्रोहियों को ख़त्म करने और 1,025 लड़ाकों के आत्मसमर्पण की बात कही थी।
अप्रैल 2017 में, पाकिस्तान ने दावा किया कि 500 बलूच विद्रोहियों ने सरकार के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है। उन्होंने बताया, कि आत्मसमर्पण करने वालों में बलूच रिपब्लिकन आर्मी (बीआरए), यूनाइटेड बलूच आर्मी (यूबीए) और लश्कर-ए-बलूचिस्तान (एलईबी) के सदस्य हैं।
2021 में, मेजर जनरल अयमान भिलाल को, चीन के आदेश पर, बलूच विद्रोह पर मुहर लगाने के लिए "ऑपरेशन ग्राउंड जीरो क्लीयरेंस" की निगरानी के लिए तैनात किया गया था। तब से बलूच अलगाववादी समूहों ने अपनी गतिविधियां तेज कर दी हैं। बलूच हमलों में वृद्धि का श्रेय बलूच अलगाववादी समूहों के बीच बढ़ती एकता को दिया जा सकता है। बलूच अलगाववादी समूहों और समान उद्देश्यों वाले अन्य उग्रवादी समूहों के बीच अंतर-प्रांतीय गठबंधन बनाए गए हैं।
ACLED रिकॉर्ड के अनुसार, 2010 से 2015 तक, विद्रोह से जुड़े संगठित राजनीतिक हिंसा के मामलों में वृद्धि हुई थी। 2015 में, लगभग 96 घटनाएं हुईं जिनमें कुल 383 मौतें हुईं।
2015 के बाद बलूच-संबंधित हिंसा में गिरावट देखने को मिली, जिसके पीछे कई फैक्टर्स हैं। पहली बात तो ये, कि पाकिस्तान ने चीन के साथ मिलकर खतरनाक आतंकनिरोधी अभियान चलाया और दूसरी बात ये, कि इस दौरान बलूच समूहों के बीच मतभेद शुरू हो गया था और प्रमुख बलूच समूहों के कुछ प्रमुख कमांडरों की मृत्यु के कारण अस्थिरता पैदा हो गई। इसका कारण उग्रवाद में कथित गिरावट को माना जा सकता है।
2014 में, एक प्रमुख बलूच राष्ट्रवादी, नवाब खैर बख्श मैरी की मृत्यु के बाद, उनके उत्तराधिकार को लेकर उनके बेटों के बीच मतभेद शुरू हो गया। आख़िरकार, दोनों बीएलए और यूनाइटेड बलूच सेना में शामिल हो गए।
डॉ. अल्लाह नज़र वर्तमान में बलूच लिबरेशन फ्रंट (बीएलएफ) का नेतृत्व करते हैं। इसकी स्थापना 1964 में सीरिया में जुमा खान मारी ने की थी। ऐसा माना जाता है कि समूह पहली बार 1970 के दशक में पाकिस्तान में सक्रिय हुआ, और इसका वर्चस्व मुख्य रूप से बलूचिस्तान के मकरान क्षेत्र में है।
समूहों के समान लक्ष्य और उद्देश्य होने के बावजूद, बीएलए और बीएलएफ के बीच आपसी मतभेद चलता रहा, जिससे बलूचों के समान उद्येश्य को काफी झटका लगा।
लेकिन, 2020 के बाद फिर से बलूचों में एकता बनने लगी और बलूचों का विद्रोह एक बार फिर से परवान चढ़ने लगा।
नवंबर 2018 तक, बलूचिस्तान रिपब्लिकन आर्मी (बीआरए), बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) और बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट (बीएलएफ) के बीच एक आधिकारिक गठबंधन बन गया। इसे बलूच पीपुल्स लिबरेशन गठबंधन (जिसे बलूच राजी अजोई संगर या बीआरएएस के नाम से भी जाना जाता है) नाम दिया गया।
बीआरएएस को बीएलएफ के नेता डॉ. अल्लाह नज़र बलूच के दिमाग की उपज माना जाता है। जून 2019 में, बीआरए भी गठबंधन में शामिल हो गया।
अब ये गठबंधन साथ मिलकर, पाकिस्तान सुरक्षा बलों और चीनी नागरिकों के खिलाफ अभियानों को अंजाम देने के लिए काम करते हैं।
ताजा रिपोर्ट्स के मुताबिक, अब नजर बलूच, बीएलए के बशीर जेब, बीआरए के गुलजार इमाम और बीएलएफ के अख्तर नदीम को गठबंधन की कमान सौंपी जा रही है। नज़र बलूच संरक्षक के रूप में कार्य करते हैं, जबकि बलूच खान को गठबंधन के आधिकारिक प्रवक्ता के रूप में जाना जाता है।
माना जाता है, कि बीआरएएस बलूचिस्तान के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में - ईरानी सीमा के आसपास सक्रिय है, जिसके कुछ सदस्य विशेष रूप से मकरान में ईरान से काम कर रहे हैं। रिपोर्टों के अनुसार, समूह को काचा, डीजी खान और कोह सुलेमान में सुरक्षित ठिकाने के रूप में जाना जाता है।
बीआरएएस ने विभिन्न हमलों का दावा किया है, जैसे कि केच में अर्धसैनिक फ्रंटियर कोर (एफसी) के काफिले पर हमला, जिसके परिणामस्वरूप 14 दिसंबर 2018 को 10 पुलिस कर्मियों की मौत हो गई थी। पंजगुर जिले में एफसी के काफिले पर हमला, जिसमें छह एफसी कर्मियों की मौत हो गई।
18 अप्रैल 2019 को ओरमारा में एक बस पर हमले में सेना और नौसेना के 14 सदस्यों की मौत हो गई। जुलाई 2020 में समूह ने फिरौती वसूलने के लिए तुरबत जिले में आठ लोगों का अपहरण कर लिया।
बीएलए और बीएलएफ, जैश अल-अदल को अपना दुश्मन मानते हैं, क्योंकि यह ईरानी सुरक्षा बलों के खिलाफ आतंकवादी हमले करता है और पाकिस्तान का पक्ष लेता है। बीआरएएस वामपंथी झुकाव वाला है, जबकि जैश अल-अदल एक ईरान विरोधी सुन्नी-इस्लामवादी आतंकवादी समूह है। बीआरएएस जैश अल-अदल को समस्याग्रस्त मानता है, क्योंकि उसका मानना है कि जैश, बलूच युवाओं को धार्मिक आधार पर विभाजित कर रहा है।
बीआरएएस ने आईएस-के और लश्कर-ए-जाहंगवी (एलईजे) के साथ भी संबंध बनाए रखा है। उन्होंने सिंधी अलगाववादी समूहों के साथ भी अपना गठबंधन बढ़ाया है।
29 जून 2020 को बीएलए ने कराची में पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज पर हमला किया था, जिसमें चार सुरक्षाकर्मी मारे गए थे। पाकिस्तानी सुरक्षा कर्मियों की रिपोर्टों के आधार पर, यह स्पष्ट था कि बलूच लड़ाकों ने सिंधुदेश रिवोल्यूशनरी आर्मी (एसआरए) जैसे सिंधी समूहों के साथ गठबंधन मजबूत कर लिया था।
बाद में 2020 में, बीआरएएस की घोषणा ने रिपोर्टों की पुष्टि की। बलूचों की तरह, सिंधियों ने भी प्रांत में चीनी उपस्थिति का विरोध किया है और पाकिस्तानी सरकार के प्रति भी ऐसी ही शिकायतें हैं।
लिहाजा, बलूचिस्तान के साथ साथ पाकिस्तान का सिंध प्रांत भी बहुत जल्द हिंसा की आग में जलने वाला है।

पाकिस्तान और चीन के खिलाफ 'ऑल ऑउट वार'
बलूच और सिंधी उग्रवादी समूह पहले भी पाकिस्तान में चीनी संपत्तियों को निशाना बना चुके हैं। लेकिन अब जब ये सभी समूह एक गठबंधन बन गये हैं, तो आशंका है, कि अब बलूचिस्तान में चीनियों के खिलाफ भीषण हमलों का सिलसिला शुरू होगा।
हाल ही में, बीएलए ने पाकिस्तान का समर्थन करने वाले समूहों के खिलाफ हमलों की एक सीरिज की शुरूआत की है। चूंकि, बीएलए पाकिस्तान के भीतर बलूचिस्तान को शामिल करने से इनकार करता है, इसलिए हमले पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर एक विद्रोह आंदोलन के रूप में शुरू हुए हैं।
विभिन्न पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठानों और सरकारी संस्थानों को लक्षित हत्याओं के साथ-साथ निशाना बनाया गया, जिन्हें बीएलए ने पाकिस्तान सरकार का समर्थक माना।
13 अगस्त को बीएलए ने ग्वादर बंदरगाह पर चीनी इंजीनियरों के एक काफिले पर हमला किया था। यह हमला 11 अगस्त 2021 को हुए हमले के समान था। यह भी चीनी इंजीनियरों के काफिले पर "फ़ेदायिन" शैली में किया गया था।
एक दिन बाद, मजीद ब्रिगेड के प्रवक्ता जीयांद बलूच ने हमले की जिम्मेदारी ली और चीन को बलूचिस्तान खाली करने के लिए 90 दिनों का अल्टीमेटम जारी किया।
अप्रैल 2022 में कराची यूनिवर्सिटी में एक महिला फिदायीन ने तीन चीनी शिक्षकों की हत्या कर दी थी। यह हमला कन्फ्यूशियस इंस्टीट्यूट के चीनी सहयोगियों को निशाना बनाकर किया गया था।
कई रिपोर्ट्स में दावा किया गया है, कि अब बलूच विद्रोहियों ने, पाकिस्तान तहरीक-ए-तालिबान के साथ हाथ मिला लिया है या हाथ मिलाने वाले हैं और इसमें आईएसआईएस-के भी शामिल होगा, लिहाजा अब ये संगठन काफी ज्यादा खतरनाक हो जाएगा और पाकिस्तान के लिए इन्हें संभालना इसलिए अत्यंत मुश्किल होगा, क्योंकि इन्हें जमीन पर काफी ज्यादा आम लोगों का समर्थन हासिल है। लिहाजा, अब देखना दिलचस्प होगा, कि पाकिस्तान जलते बलूचिस्तान की आग को कैसे बुझा पाता है?
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