नेपाल में पीएम चुनने की मियाद ख़त्म होने की ओर, कौन बनेगा प्रधानमंत्री?

नेपाल की राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी द्वारा प्रधानमंत्री पद के लिए दावा पेश करने की दी गई मियाद आज ख़त्म हो रही है.

ऐसी ख़बरें हैं कि शेर बहादुर देउबा के नेतृत्व वाली नेपाली कांग्रेस और प्रचंड के नेतृत्व वाली सीपीएन- माओवादी केंद्र के बीच सत्ता साझेदारी पर गंभीर चर्चा चल रही है.

हालांकि सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर सत्ता के बंटवारे को लेकर आम सहमति बनाने की कोशिशें जारी हैं.

ख़बरें ये भी हैं कि सत्तारूढ़ गठबंधन में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी, सीपीएन-माओवादी केंद्र ने पीएम के पहले कार्यकाल को लेकर कांग्रेस के सामने शर्त रखी है.

माओवादी केंद्र का कहना है कि सत्ता साझेदारी के दौरान पहले चरण में उसे सरकार का नेतृत्व मिलना चाहिए.

लेकिन समझा जा रहा है कि नेपाली कांग्रेस के नेता और वर्तमान पीएम शेर बहादुर देउबा पद नहीं छोड़ने और अपने नेतृत्व में सरकार बनाने पर ज़ोर दे रहे हैं.

माओवादी केंद्र के सुप्रीमो पुष्प कमल दहल 'प्रचंड' और नेपाली कांग्रेस अध्यक्ष शेर बहादुर देउबा के अपने-अपने दावों पर डटे रहने के कारण गठबंधन टूटने के कयास भी लगाए जा रहे हैं.

इस बीच खबरें हैं कि प्रचंड ने देउबा को जल्द निर्णय लेने को कहा है और इसके साथ ही सीपीएन-यूएमएल के नेता और पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली से भी बातचीत शुरू कर दी है.

उधर यूएमएल का कहना कि उनकी बातचीत सिर्फ माओवादियों से ही नहीं, कांग्रेस समेत अन्य पार्टियों से भी चल रही है.

चर्चा 'सकारात्मक' लेकिन 'सहमत नहीं'

सत्ताधारी कांग्रेस और माओवादी केंद्र के शीर्ष नेताओं के बीच शुक्रवार शाम प्रधानमंत्री आवास में सत्ता साझेदारी पर चर्चा हुई थी.

दोनों पार्टियों के नेताओं ने बीबीसी को बताया कि बातचीत 'सकारात्मक' रही. लेकिन उन्होंने माना कि सत्ता के बंटवारे पर कोई सहमति नहीं बन पाई.

प्रधानमंत्री देउबा के करीबी और संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री ज्ञानेंद्र बहादुर कार्की ने कहा, "बातचीत सकारात्मक रूप से आगे बढ़ रही है."

उन्होंने कहा, "जनमत के अनुसार गठबंधन सरकार बनेगी."

उन्होंने संकेत दिया कि प्रधानमंत्री को लेकर चर्चा हुई है लेकिन दावा किया कि इससे गठबंधन पर कोई असर नहीं पड़ेगा.

उन्होंने कहा, "जो भी पहले प्रधानमंत्री बने उससे गठबंधन पर असर नहीं पड़ेगा और सरकार नियत समय पर बनेगी."

कार्की के मुताबिक, चूंकि पार्टियों के लिए प्रधानमंत्री पद के लिए दावा करने का समय रविवार की शाम तक का है, इसलिए उस दिन तक यह तय हो जाएगा कि कौन प्रधानमंत्री होगा.

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माओवादी नेता प्रचंड का रुख़

प्रचंड के निजी सचिव और माओवादी नेता रमेश मल्ला ने इस बात से इनकार नहीं किया कि प्रचंड ने पहले प्रधानमंत्री बनने का प्रस्ताव दिया है.

उनके अनुसार, "चूंकि देउबा ने चुनाव तक नेतृत्व किया, इसलिए पार्टी की राय है कि चुनाव के बाद माओवादी नेतृत्व में सरकार का गठन किया जाना चाहिए."

उन्होंने कहा, "यह माओवादी केंद्र का फैसला है कि हम भविष्य में सत्ता के बंटवारे में अपने अध्यक्ष के नेतृत्व में आगे बढ़ेंगे."

मल्ला के मुताबिक, "हालांकि सरकार गठन को लेकर अन्य मामलों पर कोई खास मतभेद नहीं है, लेकिन मामला इसलिए लंबा खिंच गया क्योंकि वे इस बात पर सहमत नहीं हो सके कि पहले कौन प्रधानमंत्री बनेगा."

यूएमएल के साथ बातचीत के बारे में उन्होंने कहा, "हम अभी गठबंधन के विकल्प की तलाश नहीं कर रहे हैं."

गठबंधन के दूसरे दलों का रुख़

गठबंधन के अन्य दलों ने सत्ता के बंटवारे की चर्चा में भाग नहीं लिया है.

शुक्रवार को समाजवादी पार्टी के नेता माधव कुमार नेपाल के बिना देउबा और दहल के बीच चर्चा हुई.

गठबंधन पार्टी राष्ट्रीय जनमोर्चा के अध्यक्ष चित्रा बहादुर केसी ने कहा कि अन्य दलों के साथ चर्चा आगे नहीं बढ़ रही है क्योंकि "माओवादी और कांग्रेस एक समझौते पर नहीं पहुंचे हैं."

उनका मानना है कि "जल्द या बाद में दोनों पार्टियां मिलेंगी और एक गठबंधन सरकार बनेगी."

लेफ्ट गठबंधन या एकता की बात करें तो केसी का दावा है कि अभी ऐसी कोई स्थिति नहीं है.

इसी तरह गठबंधन की दूसरी पार्टी डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट पार्टी के अध्यक्ष महंत ठाकुर का भी कहना है कि वे अभी चर्चा में इसलिए हिस्सा नहीं ले रहे हैं क्योंकि तीनों प्रमुख पार्टियों में सहमति नहीं बन पाई है.

हालांकि, उनका कहना है कि प्रधानमंत्री देउबा ने शनिवार को सत्ता बंटवारे पर चर्चा के लिए फोन किया था.

ठाकुर का कहना है कि उक्त बैठक में वे भी अपनी दावेदारी पेश करेंगे.

राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी की पार्टियों से प्रधानमंत्री के लिए दावा प्रस्तुत करने का आह्वान रविवार शाम 5 बजे समाप्त हो रहा है.

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प्रधानमंत्री चुनने का क्या है नियम?

नेपाल के संविधान के अनुच्छेद 76, खंड 1 में कहा गया है कि प्रतिनिधि सभा में स्पष्ट बहुमत वाले संसदीय दल के नेता को राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री के रूप में नियुक्त किया जाएगा और उनकी अध्यक्षता में मंत्रिमंडल का गठन किया जाएगा.

लेकिन अब, चूंकि किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं हुआ है, उक्त अनुच्छेद के खंड 2 के अनुसार, राष्ट्रपति ने "प्रतिनिधि सभा के सदस्यों के लिए दावा प्रस्तुत करने के लिए कहा है जो दो या दो से अधिक के समर्थन से बहुमत प्राप्त कर सकते हैं."

उक्त खंड के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति बहुमत प्राप्त करता है, तो उसे एक महीने के अंदर अपना बहुमत साबित करना होगा.

अगर ऐसा नहीं होता है तो राष्ट्रपति सबसे बड़े संसदीय दल के नेता को नियुक्त कर सकता है.

लेकिन उसे भी एक महीने के अंदर बहुतम साबित करना होगा.

अगर ऐसा नहीं होता है तो राष्ट्रपति को अधिकार है कि वो प्रतिनिधि सभा के किसी भी सदस्य को प्रधानमंत्री पद के लिए मनोनीत कर दें. और अगर वो भी अपना बहुमत साबित नहीं कर पाता है तो प्रधानमंत्री की सिफ़ारिश पर राष्ट्रपति को अधिकार है कि वो प्रतिनिधि सभा को भंग कर दें और छह महीने में चुनाव की घोषणा कर दें.

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