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ईरान में किसकी चलती है? सर्वोच्च नेता की या राष्ट्रपति की

तेहरान में 9 जनवरी 2020 को एक सभा में ईरान के वरिष्ठ नेता
Anadolu Agency
तेहरान में 9 जनवरी 2020 को एक सभा में ईरान के वरिष्ठ नेता

ईरान एक ऐसा देश है जहाँ के राजनीतिक ढांचे को समझना काफ़ी जटिल है. एक ओर सर्वोच्च नेता से नियंत्रित अनिर्वाचित संस्थाओं का जाल है तो दूसरी ओर ईरानी मतदाताओं की ओर से चुनी हुई संसद और राष्ट्रपति हैं. ये दोनों ही तंत्र एक साथ मिलकर काम करते हैं.

लेकिन ये जटिल राजनीतिक व्यवस्था चलती कैसे है और इसमें सत्ता की चाबी किसके पास रहती है?

सर्वोच्च नेता

अयातोल्लाह अली ख़मेनेई 1989 से ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता हैं
Reuters
अयातोल्लाह अली ख़मेनेई 1989 से ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता हैं

ईरानी राज व्यवस्था में सर्वोच्च नेता का पद सबसे ताक़तवर माना जाता है. साल 1979 में हुई इस्लामिक क्रांति के बाद से अब तक सिर्फ़ दो लोग सर्वोच्च नेता के पद तक पहुँचे हैं. इनमें से पहले ईरानी गणतंत्र के संस्थापक अयातुल्लाह रुहोल्ला ख़ुमैनी थे और दूसरे उनके उत्तराधिकारी वर्तमान अयातोल्लाह अली ख़ामेनेई हैं. ख़ुमैनी ने शाह मोहम्मद रज़ा पहेलवी के शासन का तख़्तापलट होने के बाद इस पद को ईरान के राजनीतिक ढांचे में सबसे ऊंचे पायदान पर जगह दी थी.

सर्वोच्च नेता ईरान की सशस्त्र सेनाओं का प्रधान सेनापति होता है. उनके पास सुरक्षा बलों का नियंत्रण होता है. वह न्यायपालिका के प्रमुखों, प्रभावशाली गार्डियन काउंसिल के आधे सदस्यों, शुक्रवार की नमाज़ के नेताओं, सरकारी टेलीविज़न और रेडियो नेटवर्क के प्रमुखों की नियुक्ति करते हैं. सर्वोच्च नेता की अरबों डॉलर वाली दानार्थ संस्थाएं ईरानी अर्थव्यवस्था के एक बड़े हिस्से को नियंत्रित करती हैं.

अयातोल्लाह अली ख़ामेनेई साल 1989 में पूर्व सर्वोच्च नेता ख़ुमैनी की मौत के बाद सर्वोच्च नेता बने थे. सर्वोच्च नेता बनने के बाद से ख़ामेनेई ने सत्ता पर अपनी मज़बूत पकड़ बनाई हुई है. उन्होंने सत्ता-विरोध आवाज़ों को उठने नहीं दिया है.

राष्ट्रपति

ईरान के राष्ट्रपति हसन रुहानी
EPA
ईरान के राष्ट्रपति हसन रुहानी

ईरान में राष्ट्रपति पद के लिए हर चार सालों में चुनाव होता है. चुनाव जीतने वाला व्यक्ति एक बार में अधिकतम दो कार्यकाल तक राष्ट्रपति बन सकता है. ईरान के संविधान के मुताबिक़, राष्ट्रपति ईरान में दूसरा सबसे ज़्यादा ताक़तवर व्यक्ति होता है. वह कार्यकारिणी का प्रमुख होता है जिसका दायित्व संविधान का पालन करवाना है.

आंतरिक नीतियों से लेकर विदेश नीति में राष्ट्रपति का अच्छा-ख़ासा दखल होता है. लेकिन राष्ट्रीय मसलों पर अंतिम फ़ैसला सर्वोच्च नेता का ही होता है.

18 जून को ईरानी मतदाताओं ने उदारवादी धार्मिक नेता और राष्ट्रपति हसन रुहानी का उत्तराधिकारी चुनने के लिए मतदान किया है. रुहानी को पिछले दो चुनावों में कट्टरपंथी विरोधियों के ख़िलाफ़ एकतरफ़ा जीत हासिल हुई है. दोनों ही मौक़ों पर रुहानी ने पहले राउंड में ही पचास फ़ीसदी से ज़्यादा वोट हासिल किए.

राष्ट्रपति पद की दौड़ में शामिल हो रहे सभी लोगों को 12 धर्म शास्त्रियों और क़ानून विशेषज्ञों की सभा गार्डियन काउंसिल से मंज़ूरी लेनी होती है. इस चुनाव के लिए गार्डियन काउंसिल ने 590 उम्मीदवारों में से सिर्फ़ सात लोगों को अपनी मंज़ूरी दी थी. इन सात लोगों ने ही चुनावों में पंजीकरण कराया है. किसी भी महिला को चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं दी गई. इन सात में तीन ने मतदान के दो दिन पहले अपने नाम वापस ले लिए. मतदान के दिन तक कुल चार उम्मीदवार बचे थे.

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संसद

तेहरान में ईरानी संसद मजलिस को संबोधित करते राष्ट्रपति हसन रूहानी
EPA
तेहरान में ईरानी संसद मजलिस को संबोधित करते राष्ट्रपति हसन रूहानी

ईरान में 290 सदस्यों वाली संसद मजलिस को हर चार सालों में आम चुनाव के माध्यम से चुना जाता है. संसद के पास क़ानून बनाने की शक्ति होती है. इसके साथ ही वार्षिक बजट को ख़ारिज करने की ताक़त होती है.

संसद सरकार के राष्ट्रपति और मंत्रियों को समन कर सकती है और उनके ख़िलाफ़ महाभियोग का केस चला सकती है. हालांकि, संसद से पास सभी क़ानूनों को गार्डियन काउंसिल की मंज़ूरी मिलना ज़रूरी है.

गार्डियन काउंसिल से 700 से ज़्यादा संभावित उम्मीदवारों (ज़्यादातर सुधारवादी और उदारवादी) को अयोग्य ठहराए जाने के बाद कट्टरपंथियों ने साल 2021 के संसदीय चुनावों में अच्छी बढ़त हासिल की है.

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गार्डियन काउंसिल

अहमद जन्नती
AFP
अहमद जन्नती

ईरान में गार्डियन काउंसिल सबसे ज़्यादा प्रभावशाली संस्था है, जिसका काम संसद द्वारा पारित सभी क़ानूनों को मंजूरी देना या रोकना है. यह संस्था उम्मीदवारों को संसदीय चुनावों या विशेषज्ञों की समिति के लिए होने वाले चुनावों में अपनी किस्मत आजमाने से प्रतिबंधित कर सकती है.

इस काउंसिल में छह धर्मशास्त्री होते हैं, जिनकी नियुक्ति सुप्रीम नेता करते हैं. इसके साथ ही छह न्यायाधीश होते हैं जिन्हें न्यायपालिका मनोनीत करती है और इनके नामों को संसद मंज़ूरी देती है. सदस्यों का चुनाव छह साल के अंतराल में चरणबद्ध ढंग से होता है, जिससे सदस्य हर तीन साल में बदलते रहें.

इस काउंसिल में कट्टरपंथियों का बहुमत है, जिनमें चेयरमैन अयातोल्लाह अहमद जन्नती भी शामिल हैं.

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विशेषज्ञों की समिति

तेहरान में विशेषज्ञों की समिति की बैठक ( 2014 की तस्वीर)
Anadolu Agency
तेहरान में विशेषज्ञों की समिति की बैठक ( 2014 की तस्वीर)

ये एक 88 सदस्यों की मज़बूत संस्था है, जिसमें इस्लामिक शोधार्थी और उलेमा शामिल होते हैं. इस संस्था का काम सर्वोच्च नेता की नियुक्ति से लेकर उनके प्रदर्शन पर नज़र रखना होता है. अगर संस्था को लगता है कि सुप्रीम नेता अपना काम करने में सक्षम नहीं है तो इस संस्था के पास सुप्रीम नेता को हटाने की शक्ति भी है.

हालांकि, ऐसा कभी नहीं हुआ है कि सुप्रीम नेता के फ़ैसलों को चुनौती दिया गया हो. लेकिन 82 वर्षीय अयातोल्लाह अली ख़ामेनेई की सेहत को लेकर लगातार जताई जा रही चिंताओं के चलते ये संस्था काफ़ी अहम हो गई है.

अगर सर्वोच्च नेता की मृत्यु हो जाती है तो ये संस्था एक गुप्त चुनाव आयोजित करती है, जिसमें स्पष्ट बहुमत पाने वाले व्यक्ति को उत्तराधिकारी घोषित किया जाता है. संस्था सदस्यों के लिए हर आठ सालों में चुनाव होता है.

इससे पहले साल 2016 में चुनाव हुआ था, जब उदारवादियों और सुधारवादियों ने 60 फ़ीसदी से ज़्यादा सीटें जीत ली थीं. जबकि इससे पहले चुनाव में इस तबके ने सिर्फ 25% फ़ीसदी सीटें जीती थीं. संस्था के वर्तमान अध्यक्ष अयातोल्लाह अहमद जन्नती हैं जो कि एक कट्टरपंथी हैं और गार्डियन काउंसिल के भी मुखिया हैं.

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एक्सपीडिएंसी काउंसिल

ये काउंसिल सुप्रीम नेता को सलाह देती है. क़ानूनी मामलों में गार्डियन काउंसिल और संसद के बीच विवाद होने पर इस संस्था को फ़ैसला करने का अधिकार है. सर्वोच्च नेता इस काउंसिल के सभी 45 सदस्यों की नियुक्ति करते हैं जो कि जानी-मानी धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक हस्तियां होती हैं.

संस्था के वर्तमान अध्यक्ष अयातोल्लाह सादेक़ अमोली लारिजनी हैं जो कि एक कट्टरपंथी व्यक्ति हैं और पूर्व न्यायपालिका प्रमुख रहे हैं.

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न्यायपालिका प्रमुख

इब्राहीम रईसी 2019 से ईरान की सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख हैं
EPA
इब्राहीम रईसी 2019 से ईरान की सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख हैं

ईरान के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति सर्वोच्च नेता करते हैं. मुख्य न्यायाधीश सर्वोच्च नेता के प्रति ही उत्तरदायी होते हैं.

वह देश की न्यायपालिका के प्रमुख होते हैं. इस पद के अंतर्गत आने वाली अदालतें इस्लामी क़ानून के पालन और विधिक नीतियों को परिभाषित करती हैं. मुख्य न्यायाधीश इब्राहिम रैसि, जो कि एक कट्टरपंथी उलेमा हैं, गार्डियन काउंसिल के भी छह मूल सदस्यों को मनोनीत करते हैं.

न्यायपालिका ने सुरक्षा और ख़ुफ़िया विभाग के साथ मिलकर विरोधी आवाज़ों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की है. मानवाधिकार कार्यकर्ता अक्सर न्यायपालिका पर अजीबोग़रीब ढंग से परिभाषित किए गए राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में गिरफ़्तार लोगों के ख़िलाफ़ अनुचित ढंग से क़ानूनी मामले चलाने का आरोप लगाते हैं.

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मतदाता

2020 में ईरान में हुए संसदीय चुनाव में ईरानी क्रांति के बाद से सबसे कम मतदान हुआ था
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2020 में ईरान में हुए संसदीय चुनाव में ईरानी क्रांति के बाद से सबसे कम मतदान हुआ था

ईरान की 8.3 करोड़ जनसंख्या में से लगभग 5.8 करोड़ मतदाता यानी 18 साल की उम्र पूरी कर चुके लोग मतदान कर सकते हैं.

मतदाताओं में युवाओं का बहुमत है. आधी से ज़्यादा जनसंख्या 30 साल से कम उम्र की है. साल 1979 में इस्लामिक क्रांति होने के बाद से मतदान प्रतिशत 50 फ़ीसदी से ज़्यादा ही रहा है.

हालांकि, 2021 के संसदीय चुनावों में अर्थव्यवस्था के बुरे हाल और उलेमाओं से असंतोष की वजह से ज़्यादातर लोग मतदान से दूरी बनाते हुए दिखे.

सशस्त्र सेनाएं

ईरान की सशस्त्र सेनाओं में इस्लामिक रिवॉल्युशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) और सामान्य सेना है.

आईआरजीसी का गठन क्रांति के बाद इस्लामिक सिस्टम की रक्षा और आम सेना के समानांतर शक्ति स्थापित करने के मक़सद से किया गया था. हालांकि, अब ये एक व्यापक सशस्त्र, राजनीतिक और आर्थिक शक्ति बन गई है, जिसके सर्वोच्च नेता से क़रीबी संबंध हैं.

रिवॉल्युशनरी गार्ड्स के पास अपनी ज़मीनी सेना, नेवी और एयरफ़ोर्स है. ईरान के रणनीतिक हथियारों की देखरेख का काम भी इसी संस्था के पास है.

यह संस्था पैरामिलिट्री बसिज रेसिस्टेंस फ़ोर्स को भी नियंत्रित करती है जिसने आंतरिक विरोध को कुचलने में भूमिका निभाई है.

सभी वरिष्ठ आईआरजीसी अधिकारियों और सैन्य कमांडरों की नियुक्ति सुप्रीम नेता करते हैं जो कि प्रधान सेनापति भी हैं. ये कमांडर और अधिकारी सिर्फ़ सुप्रीम नेता के प्रति उत्तरदायी हैं.

मंत्रिमंडल

मंत्रिमंडल के सदस्य या मंत्री परिषद का चुनाव राष्ट्रपति करते हैं. इनके नामों को संसद से मंज़ूरी मिलनी चाहिए जो कि मंत्रियों पर भी अभियोग का केस चला सकती है. इस मंत्रिमंडल के अध्यक्ष राष्ट्रपति या प्रथम उप-राष्ट्रपति होता है जो कि मंत्रिमंडल से जुड़े मामलों के लिए ज़िम्मेदार होता है.

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