कौन हैं बान की मून, जिन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा, भारत के लिए धड़कता है मेरा आधा दिल...

कौन हैं बान की-मून, जिन्होंने अपनी आत्मकथा में भारत की जमकर प्रशंसा की है और लिखा है, उनका आधा दिल भारत में ही बसता है।

नई दिल्ली, नवंबर 22: यूनाइटेड नेशंस के पूर्व महासचिव बान की-मून ने अपनी आत्मकथा लिखी है, जिसमें उन्होंने भारत को लेकर काफी विशेष बातों का जिक्र किया है। सबसे खास बात जो उन्होंने अपनी किताब में लिखा है, कि उनका आधा दिल भारत में ही बसता है। आईये जानते हैं, कि आखिर बान की-मून कौन हैं और भारत के साथ उनका क्या रिश्ता रहा है।

भारत में पहली पोस्टिंग

भारत में पहली पोस्टिंग

संयुक्त राष्ट्र के पूर्व महासचिव बान की-मून की पहली राजनयिक पोस्टिंग भारत में हुई थी और उन्होंने भारत में रहने के दौरान ऐसा खास संबंध विकसित किया, कि 50 साल बाद भी वो कहते हैं कि, भारत के साथ उनका जुड़ाव सबसे अलग है और उनका आधा "दिल भारत देश में है"। बान की-मून ने अपनी आत्मकथा में यह भी उल्लेख किया है, कि भारत में उनके तीन साल उनके जीवन का सबसे रोमांचक समय था। हार्पर कॉलिन्स इंडिया द्वारा प्रकाशित "रिज़ॉल्व्ड: यूनाइटिंग नेशंस इन ए डिवाइडेड वर्ल्ड" में बान ने अपनी जिंदगी के कई अनछुए पहलुओ का वर्णन किया है कि और बताया है कि, कैसे वह वार ब्वॉय से "शांति के व्यक्ति" बन गए।

1944 में हुआ था जन्म

1944 में हुआ था जन्म

यूनाइटेड नेशंस के गठन से पहले साल 1944 में बान की-मून का जन्म कोरिआ में उस वक्त हुआ था, जब पूरी दुनिया युद्ध की आग में जल रही थी। बान की-मून ने लिखा है, कि उनकी यादाश्त जहां से शुरू होती है, वो काफी ज्यादा खौफनाक समय था, क्योकि उनका परिवार उन्हें लेकर जान बचाने के लिए भाग रहा था। उनका जूता मिट्ठी से लथपथ था और वो कई मील तक अपने परिवार के साथ लगातार भाग रहे थे। हर कोई भूख से तड़प रहा था और पानी का एक बूंद भी किसी को नसीब नहीं हो पा रहा था। बान की-मून लिखते हैं, कि उनके परिवार ने जान बचने की उम्मीद छोड़ दी थी। उन्होंने लिखा है, उनके गांव पर बम गिराया गया था और सभी लोगों की उम्मीदें चकनाचूर हो गईं थीं। और उसी वक्त यूनाइटड नेशंस का गठन हुआ, जिसने उन्हें और उनके परिवार की जान बचाई।

मून के दिल का हिस्सा है भारत

मून के दिल का हिस्सा है भारत

बान की-मून लिखते हैं कि, वो हमेशा यूनाइटेड नेशंस के कर्जदार रहेंगे और हमेशा यूनाइटेड नेशंस का ऋण चुकाने के लिए संकल्पित रहेंगे। भारत में अपने दिनों के दौरान को याद करते हुए बान की मून लिखते हैं कि, "भारत में मेरी पहली राजनयिक पोस्टिंग थी और सून-ताक (पत्नी) और मैं अक्टूबर 1972 में दिल्ली पहुंचे थे। मैंने वहां लगभग तीन वर्षों तक सेवा की और पहले कोरियाई महावाणिज्य दूतावास के उप महावाणिज्यदूत के रूप में मैंने दिल्ली में काम किया। दिसंबर 1973 में कोरिया और भारत के बीच एक पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित होने के बाद मैंने कोरियाई दूतावास के दूसरे सचिव के रूप में कार्य किया।" उन्होंने लिखा है कि, उस वक्त उनकी बेटी सिर्फ आठ महीने की थी और उनके इकलौते बेटे वू-ह्यून का जन्म भी 30 अक्टूबर 1974 को भारत में हुआ था।

भारत के साथ बना खास रिश्ता

भारत के साथ बना खास रिश्ता

बान की-मून लिखते हैं कि, ''मैं भारतीय लोगों के साथ मजाक करता था कि, भारत के साथ मेरी बैलेंस शीट सही है क्योंकि मेरा बेटा भारत में पैदा हुआ था और मेरी सबसे छोटी बेटी ह्यून-ही की शादी एक भारतीय व्यक्ति से हुई है। आज भी, लगभग पचास साल बाद मैं भारतीय लोगों से कहता हूं कि मेरा आधा दिल उनके देश में है''। उन्होंने अपनी किताब में लिखा है कि, ''भारत में उनका काम एक युवा राजनयिक के लिए चुनौतीपूर्ण लेकिन आकर्षक था।''

भारत का दिल जीतना था लक्ष्य

भारत का दिल जीतना था लक्ष्य

उन्होंने अपनी किताब में लिखा है कि, "हमारा प्राथमिक लक्ष्य गुटनिरपेक्ष समूह के नेता भारत का दिल जीतना था और ये काम हमने दिसंबर 1973 में पूरा किया। कोरियाई और कई अन्य राजनयिकों ने महसूस किया कि कांसुलर संबंधों को राजदूत स्तर तक बढ़ाना राजनयिक संबंधों में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। भारत सबसे बड़े गुटनिरपेक्ष राज्यों में से एक था जिसने दोनों कोरिया को मान्यता दी"।

यूनाइटेड नेशंस में महत्वपूर्ण काम

यूनाइटेड नेशंस में महत्वपूर्ण काम

बान की-मून ने सामूहिक कार्रवाई और वैश्विक परिवर्तन में वास्तविक विश्वास को "इस धरती पर सबसे असंभव काम" कहा है। संयुक्त राष्ट्र के शांति, विकास और मानव अधिकारों के मिशन में विश्वास के साथ चुनौतियों और प्रतिरोध का सामना करते हुए, बान ने संयुक्त राष्ट्र को एक अस्थिर अवधि के माध्यम से आगे बढ़ाया, जिसमें अरब स्प्रिंग, ईरान और उत्तर कोरिया में परमाणु खोज, इबोला महामारी और क्रूर नए संघर्ष शामिल थे। महासचिव के रूप में उन्होंने अत्यधिक गरीबी से लड़ने और जलवायु संकट को दूर करने के लिए वैश्विक समझौते भी किए। इसके साथ ही बान की-मून ने 2006 में संयुक्त राष्ट्र के चुनाव का भी जिक्र किया है, जिसमें भारत की तरफ से शशि थरूर ने अपनी दावेदारी पेश की थी।

थरूर को सरकार का साथ नहीं

थरूर को सरकार का साथ नहीं

बान की-मून ने 2006 में संयुक्त राष्ट्र चुनाव का जिक्र करते हुए लिखा है कि, भारत की तरफ से शशि थरूर भी दावेदार थे। उन्होंने लिखा है कि, "थाईलैंड के उम्मीदवार सुरकीआर्ट साथीथी, एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे जो उस समय मेरे लिए एक वास्तविक प्रतिद्वंद्वी की तरह चुनौती पेश कर रहे थे। थरूर और श्रीलंकाई राजनयिक जयंत धनपाल को उनकी सरकारों का मजबूत समर्थन नहीं था। पहले दो स्ट्रॉ पोल में उम्मीदवारों द्वारा प्राप्त समर्थन का आकलन करने के लिए 15 सदस्यीय संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में एक अनौपचारिक मतदान हुआ था, जिसमें शशि थरूर दूसरे स्थान पर आए थे और बान की मून विजयी हुए थे।

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