60 हजार लोगों को मरवाने वाली लेफ्ट पार्टी के नेता, श्रीलंका चुनाव में जीत रहे अडानी विरोधी दिसानायके कौन हैं?

Who is Anura Kumara Dissanayake: श्रीलंका राष्ट्रपति चुनाव में शनिवार को हुए मतदान के बाद आज वोटों की गिनती चल रही है और शुरूआती रूझानों में अनुरा कुमारा दिसानायके को प्रचंड बहुमत मिलने की संभावना लग रही है और वो करीब 50 प्रतिशत वोटों के साथ आगे चल रहे हैं।

खबर लिखे जाने तक अनुरा कुमारा दिसानायके 796,941 वोटों के साथ पहले नंबर पर चल रहे हैं, जबकि सजिथ प्रेमदासा 412,845 वोटों के साथ दूसरे नंबर पर और रानिल विक्रमसिंघे 262,057 वोटों के साथ तीसरे नंबर पर चल रहे हैं।

Who is Anura Kumara Dissanayake

श्रीलंका चुनाव के शुरूआती नतीजे उसी ट्रेंड के मुताबिक आगे बढ़ रहे हैं, जैसा ओपिनियन पोल्स में दिखा था। अलग अलग सर्वेक्षणों से पता चला था, कि अनुरा कुमारा दिसानायके को 50 प्रतिशत से ज्यादा वोट हासिल होंगे और कुछ कुछ ऐसा ही दिख रहा है।

नमल राजपक्षे, सजीथ प्रेमदासा और वर्तमान राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे के विपरीत, दिसानायके अपने मार्क्सवादी विचारधारा और व्यापक सुधारों के वादे के साथ एक नया नजरिया लेकर आए हैं। वहीं, सबसे ज्यादा दिलचस्प जो बात जो श्रीलंका राष्ट्रपति चुनाव में इस बार देखी गई है, वो ये है, कि लोगों के माथे से धर्म के आधार पर वोट करने का भूत उतर गया है और उन्होंने इस बार नीतियों के आधार पर वोट डाला है। 2019 का राष्ट्रपति चुनाव पूरी तरह से धर्म के आधार पर डाला गया था, जिसमें गोटाबाया राजपक्षे ने प्रचंड जीत हासिल की थी, लेकिन उनकी आर्थिक नीतियों ने देश का बंटाधार कर दिया और 2022 में भीषण विरोध प्रदर्शन के बाद उन्हें देश से भागना तक पड़ा।

Who is Anura Kumara Dissanayake

अनुरा कुमारा दिसानायके की सोच क्या है?

श्रीलंका के राजनीतिक परिदृश्य को बदलने के लिए दिसानायके की प्रतिबद्धता उनके महत्वाकांक्षी भाषणों से स्पष्ट है। वह जनता पर आर्थिक दबाव कम करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के साथ शर्तों पर फिर से बातचीत करने की वकालत करते हैं, चुनिंदा विदेशी निवेश को प्रोत्साहित करते हैं, और 1978 से पहले की संरचना के समान संसदीय लोकतंत्र की वापसी के पक्ष में राष्ट्रपति प्रणाली को खत्म करने की बात करते हैं।

ये नीतियां शासन को ज्यादा समावेशी और पारदर्शी नेतृत्व की तरफ ले जाने वाली नीतियां मानी जाती हैं।

हालांकि, दिसानायके की यात्रा बिना किसी बाधा के नहीं रही है। यूनाइटेड नेशनल पार्टी (यूएनपी) और श्रीलंका फ्रीडम पार्टी (एसएलएफपी) के लंबे समय से चले आ रहे प्रभुत्व को खत्म करने, विक्रमसिंघे का समर्थन करने वाले अभिजात वर्ग का समर्थन हासिल करने, जेवीपी के अशांत अतीत पर काबू पाने और भारत के साथ-साथ युद्ध से प्रभावित तमिल समुदाय के साथ संबंधों को सुधारने की चुनौती भी उनके सामने रही है। फिर भी, दिसानायके ने लोगों की उम्मीदों को जीत लिया है।

हालांकि, अब उनकी चुनौती संसद में अपनी पार्टी जेवीपी को जीत दिलाने की होगी, जिसके पास सिर्फ 3 सीटें हैं। उन्होंने 45 दिनों के अंदर संसद को भंग करके फिर से संसदीय चुनाव करवाने की बात कही है।\

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अनुरा कुमारा दिसानायके कौन हैं? (Who is Anura Kumara Dissanayake)

55 साल के दिसानायके के आकर्षण का एक बड़ा हिस्सा उनकी जड़ें हैं। उनका जन्म अनुराधापुरा जिले के थंबुट्टेगामा गांव में एक मध्यम वर्ग में हुआ था, जो राजधानी कोलंबो से लगभग 170 किमी दूर स्थित है। दिहाड़ी मजदूर और गृहिणी के रूप में काम करने वाले उनके माता-पिता ने दिसानायके की शिक्षा-दीक्षा में कोई कसर नहीं छोड़ी और उन्होंने केलानिया विश्वविद्यालय से विज्ञान की डिग्री हासिल की। ​​अपने कॉलेज के दिनों में दिसानायके छात्र राजनीति में शामिल हो गये थे।

कॉलेज की राजनीति ने उन्हें 1987 और 1989 के बीच सरकार विरोधी आंदोलन के दौरान जेवीपी में शामिल होने के लिए प्रेरित किया। इस दौरान पार्टी ने राष्ट्रपति जेआर जयवर्धने और आर प्रेमदासा के साम्राज्यवादी और पूंजीवादी शासन के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह का नेतृत्व किया था।

कुछ लोग इसे श्रीलंका का सबसे खूनी दौर कहते हैं। उस समय बड़े पैमाने पर हत्याएं और राजनीतिक हत्याएं आम बात थीं। प्रतिशोध में, सरकार ने विद्रोह को बेरहमी से कुचल दिया, जिसमें कम से कम 60,000 लोग मारे गए थे, जिनमें जेवीपी के संस्थापक रोहाना विजेवीरा भी शामिल थे।

1995 में, दिसानायके सोशलिस्ट स्टूडेंट्स एसोसिएशन के राष्ट्रीय आयोजक बने और उन्हें जेवीपी की केंद्रीय कार्यसमिति में नियुक्त किया गया। तीन साल बाद, वे पार्टी के राजनीतिक ब्यूरो के सदस्य बन गए। 2000 में दिसानायके संसद के सदस्य बने और उसके 14 साल बाद उन्हें पार्टी प्रमुख नियुक्त किया गया। अपनी नियुक्ति के तुरंत बाद, उन्होंने बीबीसी को दिए एक साक्षात्कार में पार्टी की तरफ से किए गये पिछले अपराधों के लिए माफी मांगी। और यह पहली और आखिरी बार था जब जेवीपी ने अपने पिछले अवतार में श्रीलंका पर की गई हिंसा के लिए माफी मांगी।

दिसानायके के लिए निर्णायक और श्रीलंका की भविष्य की दिशा तय करने का मौका आ गया है। पर्याप्त बदलाव के अपने नजरिए के साथ, दिसानायके 39 उम्मीदवारों के भीड़ से विजयी बनकर निकल रहे हैं और उन्होंने श्रीलंका की राजनीति में नया अध्याय खोलने का वादा किया है और उन्हें जो समर्थन मिलता दिख रहा है, वो लोगों की बेहिसाब उम्मीदें हैं, जिसपर खड़ा उतरना उनके लिए कतई आसान नहीं होगा, क्योंकि ऐसी जज्बाती उम्मीदें बहुत जल्द धाराशाई भी हो जाती हैं।

भारत के लिए क्या हैं दिक्कतें?

हालांकि, दिसानायके ने अपनी विदेश नीति में भारत और चीन के बीच संतुलन बनाकर चलने की बात कही है, लेकिन उन्होंने अडानी की कंपनियों का भारी विरोध किया है। उन्होंने पिछले हफ्ते भी सत्ता में आने के बाद अडानी ग्रुप की पवन ऊर्जा प्रोजेक्ट को रद्द करने की कसम खाई थी और इसे श्रीलंका संप्रभुता के खिलाफ बताया था, लिहाजा ये भारत के लिए नया सिरदर्द हो सकता है।

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