पश्तून या पठान कौन हैं, जिनकी पूरी कौम को शोएब अख्तर ने चरमपंथी कहा है? पाकिस्तानी क्यों करते हैं नफरत, जानिए
अफगानिस्तान को कंट्रोल करने की चाहत में पाकिस्तान ने अफगानों के मन में जिहाद भरा और सोवियत संघ से लड़ने की बात कहकर अमेरिका से अरबों डॉलर ठगे। अब पाकिस्तानी, पश्तूनों को 'नमक हराम' कहते हैं।

Who are Pashtuns: पाकिस्तान के पूर्व तेज गेंदबाज शोएब अख्तर ने 'बंगालियों और पठानों को चरमपंथी' कौम कहा है। लेकिन, शोएब अख्तर अकेले नहीं हैं, जिनकी ये मानसिकता है, बल्कि एक आम पाकिस्तानी, पश्तूनों, जिन्हें हम पठान के तौर पर जानते हैं, उनको लेकर यही सोच रखते हैं। इमरान खान भी पठानों को तालिबान से जोड़ चुके हैं और कह चुके हैं, कि पठानों में तालिबानों को लेकर काफी सहानुभूति रहती है। पाकिस्तानियों ने पठानों को हमेशा से अपने लिए सिरदर्द के तौर पर देखा है और इसकी वजह पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिमी जनजातीय क्षेत्रों में रहने वाले लाखों पश्तूनों के घर हैं, जो पाकिस्तान के सबसे बड़े जातीय अल्पसंख्यक हैं और जिनमें से ज्यादातर अफगानिस्तान से शरणार्थी बनकर आए हैं। पाकिस्तान में पश्तूनों को देश के ऊपर बोझ माना जाता है और उनसे नफरत की जाती है। वहीं, पश्तूनों को लेकर पाकिस्तान में जमकर राजनीति भी होती है और शोएब अख्तर का बयान कोई चौंकाने वाला नहीं है, बल्कि उसी मानसिकता को दर्शाता है।
पश्तूनों के बारे में जानिए
पश्तून अपने आप को हजारों साल पुरानी कौम मानते हैं और पश्तूनों के सबसे बड़े नेता माने जाने वाले खान अब्दुल वली खान ने कहा था, कि "मैं 6 हजार साल से पश्तून हूं।" अगर आज के अफगानिस्तान को समझना है, तो सबसे पहले पश्तूनों को समझना होगा, क्योंकि अफगानिस्तान की सबसे बड़ी आबादी पश्तूनों की रही है, जो अपने आप को एक खुद्दार कौम कहती है। पश्तूनों में एक कहानी प्रचलित है, कि उन्होंने सैकड़ों साल पहले यहूदियों को फिलिस्तीनियों से बचाया था और पश्तूनों के एक बड़े सरदार अफगाना के नाम पर अफगानिस्तान का नाम रखा गया। आज के दौर को देखा जाए, तो पाकिस्तानियों के मन में पश्तूनों को लेकर हमेशा से नफरत भरा रहा है और आपको याद होगा, जब 2022 में हुए एशिया कप में अफगानिस्तान और पाकिस्तानियों खिलाड़ियों के बीच तनाव बढ़ गया था, तो पाकिस्तान में अफगानों को 'नरकहराम' कहा जाने था। जिसके जवाब में कई अफगानों ने पाकिस्तानियों को 'आतंकवादी' कहना शुरू कर दिया। लेकिन, हकीकत ये है, कि पाकिस्तान ने ही अफगान जिहाद को हवा दी थी।

अफगानिस्तान में पश्तून
अफगानिस्तान की स्थापना पश्तूनों ने 18वीं सदी के मध्य में एक देश के तौर पर की थी और उन्होंने पाकिस्तान से लगती अपनी सीमा, जिसे अंग्रेजों ने डूरंड लाइन नाम दिया था, उसे कभी नहीं माना। डूरंड लाइन समझौते में कहा गया है, कि असल में पहले भारत और अफगानिस्तान के बीच कोई सीमा थी ही नहीं। 1947 में जब भारत का विभाजन हुआ और पाकिस्तान का निर्माण हुआ, तो अफगानिस्तान ने तत्काल पाकिस्तान को मान्यता नहीं दी और अफगानिस्तान ने डूरंड लाइन को हटाने के लिए कहा। धीरे धीरे अफगानिस्तान में पश्तूनों में राष्ट्रवाद की भावना का उदय हुआ और पश्तून इलाकों की मांग बढ़ने लगी। जबकि, पाकिस्तान डूरंड लाइन समझौते को लेकर अड़ा हुआ है। अफगानिस्तान में चाहे नागरिक सरकार ही है, या फिर तालिबान की सरकार, किसी ने भी डूरंड लाइन को नहीं माना है और यही वजह है, कि पाकिस्तान में पश्तून अलगाववाद ने सिर उठाना शुरू कर दिया है। चूंकी पाकिस्तान में पश्तून 30 लाख से ज्यादा की संख्या में हैं और इनका सीधा संपर्क अफगानिस्तान से है, लिहाजा पाकिस्तान के लिए पश्तून मूवमेंट को रोकना मुश्किल साबित हो रहा है।
पाकिस्तान में शरणार्थी बने अफगान
अफगानिस्तान पर रूस के आक्रमण और उसके बाद अफगानों की धरती पर अमेरिका और पाकिस्तानी सेना के घुसने के बाद कम से कम 30 लाख से ज्यादा अफगान अपनी धरती से उखड़ गये और शरणार्थी बनकर पाकिस्तान पहुंच गये। अफगानिस्तान से निकले पश्तून, ज्यादातर कराची और पेशावर जैसे शहरी क्षेत्र में पहुंचे और उन्हीं क्षेत्रों में रहकर मजदूरी के जरिए अपना पेट भरन लगे। अफगानों ने पाकिस्तान के विकास में काफी योगदान दिया है और पाकिस्तान के ग्रामीण और शहरी क्षेत्र में अपना खूब पसीना बहाया। पाकिस्तान के इन्फ्रांस्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए भी पश्तून ही मजदूर बने। इसके साथ ही पाकिस्तान में बेकरी, फूलों की दुकान, किराना दुकान और मांस की दुकान चलाने लगे। पाकिस्तान के बदलते परिवेश में पश्तूनों ने काफी योगदान दिया। लिहाजा, पाकिस्तानियों का मानना है, कि पश्तून उनके देश का एहसान माने। लेकिन, अफगानों का मानना है, कि उनके देश की बर्बादी के पीछे पाकिस्तानी हैं, लिहाजा आम पश्तून खुद को भारत के काफी करीब मानते हैं।

अफगान-पाकिस्तान में छत्तीस का आंकड़ा
एक्सपर्ट्स का कहना है, कि पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के अलग अलग जातीय समूहों के बीच जहर डाला और अशांत अफगानिस्तान के निर्माण में काफी बड़ी भूमिका निभाई है। अफगानिस्तान के अंदर जब आंतरिक विद्रोह शुरू हुआ (तालिबान आंदोलन), तो उसकी बीज भी पाकिस्तान ने ही बोई थी। कहा जाता है, कि पाकिस्तान ने अफगान तालिबान मूवमेंट को भारी मदद दी और उन्हें अफगान मुजाहिद्दीन बताकर, उन्हें सोवियत संघ के खिलाफ मोड़ा। पाकिस्तान का मानना था, कि अगर तालिबान किसी तरह से सरकार में आ जाता है, तो डूरंड लाइन संकट खत्म हो जाएगा और अफगानिस्तान उसके लिए बैकयार्ड की तरफ काम करेगा, लेकिन पाकिस्तान की ये रणनीति पूरी तरह से फेल साबित हुई। तालिबान ने भी डूरंड लाइन को नहीं माना और अब पाकिस्तान को अफगान शरणार्थियों का डर काफी ज्यादा सताता है। पाकिस्तान में करीब 30 लाख पश्तून शरणार्थी अफगानिस्तान से भागकर आए थे और अब ये शरणार्थी कैंप, मुजाहिदीनों की भर्ती के लिए काफी बड़े ठिकाने बन गये हैं। बाद में पाकिस्तान में रहने वाले इन शरणार्थियों ने तालिबान का भी समर्थन करना शुरू कर दिया और खुद पाकिस्तान के अंदर पश्तून विद्रोह भी इन्ही शरणार्थी कैंपों से भड़का है।

पाकिस्तान को किस बात से है गुस्सा?
पाकिस्तान की चाहत हमेशा से अफगानिस्ता को अपने कंट्रोल में रखने की रही है और इसीलिए तालिबान के निर्माण में उसने काफी अहम भूमिका निभाई। अफगानों के अंदर जिहाद की भावना भी पाकिस्तान ने ही भड़काई। अफगानिस्तान के लोगों को जिहाद और आतंक की ट्रेनिंग के कैंप भी पाकिस्तान में ही चलाए गये। पाकिस्तान, अफगान तालिबानों के जरिए ना सिर्फ अफगानिस्ता को कंट्रोल करना चाहता था, बल्कि वो भारत को भी तालिबान के जरिए अशांत करना चाहता था। लेकिन, पाकिस्तान के लिए इसका नतीजा काफी खतरनाक साबित हुआ। अफगानिस्तान पर कंट्रोल करने के बाद तालिबान ने भारत से दोस्ती कर ली, लेकिन पाकिस्तान के लिए नया सिरदर्द बनकर 'तहरीक-ए-तालिबान' आया।

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अफगानों को 'नमक हराम' मानते हैं पाकिस्तानी
पाकिस्तान की अफगानिस्तान में प्रॉक्सी वार का ही नतीजा है, कि तहरीक-ए-तालिबान का 2007 में गठन हुआ। टीटीपी के गठन के बाद पाकिस्तान मे गृहयुद्ध की स्थिति बन गई और पाकिस्तान में करीब 8 हजार लोग इसमें मारे गये। वहीं, पू्र्व पाकिस्तानी प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो की हत्या में भी टीटीपी का ही हाथ था। जानकारों का कहना है, कि पाकिस्तान ने तालिबान से वचन लिया था, कि वो पश्तूनों का समर्थन नहीं करेगा, लेकिन बगैर पश्तूनों को अपने साथ लिए, तालिबान अफगानिस्तान में अपना शासन चला नहीं सकता है, लिहाजा पाकिस्तान के लिए ये दांव भी काम नहीं कर पाया। दूसरी तरफ पाकिस्तान की सरकारों ने अपनी नाकामयाबी छिपाने के लिए पश्तूनों को देशद्रोही और नमकहराम के तौर पर पेश किया और पाकिस्तान में इसीलिए अफगानों को लेकर नफरत भी भरी है। शोएब अख्तर का ये बयान भी उसी नफरत से प्रेरित एक आम पाकिस्तानी मानसिकता है।
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