मुगाबे को सत्ता से 'उखाड़ने वाले' मनंगाग्वा कौन हैं?
ज़िम्बाब्वे में यह बात किसी से छिपी नहीं थी कि उपराष्ट्रपति एमर्सन मनंगाग्वा राष्ट्रपति मुगाबे की जगह लेना चाहते हैं.
ज़ानू-पीएफ़ पार्टी और सरकार में बड़ा ओहदा देकर राष्ट्रपति मुगाबे ने भी मनंगाग्वा की हसरतों को हवा दी, लेकिन जैसे ही मामला अपनी पत्नी और मनंगाग्वा के बीच चुनाव का आया तो मुगाबे ने मनंगाग्वा को कथित तौर पर दरवाज़ा दिखा दिया.
यह मनंगाग्वा से बर्दाश्त नहीं हुआ. वे वापस लौटने का दावा करके देश से बाहर चले गए.
सेना में उनकी अच्छी साख थी. इसलिए देशद्रोह के आरोप में उनकी बर्ख़ास्तगी के तुरंत बाद सेना हरकत में आ गई.
मनंगाग्वा को ज़िम्बाब्वे में एक शातिर नेता के तौर पर देखा जाता है. सियासी हलकों में उन्हें क्रोकोडाइल (मगरमच्छ) के नाम से बुलाया जाता है.
हालांकि ऐसा नहीं है कि मनंगाग्वा को ज़िम्बाब्वे के लोगों का भारी समर्थन हासिल हो.
कोई नहीं मानता कि 71 साल के मनंगाग्वा के आने से मानवाधिकार हनन के मामलों में कोई कमी आएगी.
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कौन हैं एमर्सन मनंगाग्वा
- चतुर राजनीतिज्ञ माने जाने वाले मनंगाग्वा को क्रोकोडाइल यानी मगरमच्छ के नाम से बुलाया जाता है
- उन्होंने चीन और मिस्त्र में सैन्य ट्रेनिंग ली
- मनंगाग्वा ने 1970 में ज़िम्बाब्वे की आज़ादी की लड़ाई को दिशा दिखाई
- 1980 में देश के अंदर चल रहे संघर्ष के दौरान मनंगाग्वा की बड़ी भूमिका रही हालांकि उन्होंने हज़ारों नागरिकों की मौत की ज़िम्मेदारी सेना पर डाल दी
- मनंगाग्वा को सेना, खुफ़िया एजेंसियों और ज़ानू-पीएफ़ के बीच की कड़ी माना जाता है
- 2008 के चुनाव के बाद विपक्षी समर्थकों पर हुए हमलों के पीछे मनंगाग्वा का हाथ माना जाता है.
ज़िम्बाब्वे में आज़ादी की जंग में शामिल रहे लोगों की हमेशा से सत्ता पर पकड़ रही है.
इसलिए सेना को डर था कि अगर मुगाबे की पत्नी ग्रेस सत्ता में आईं तो सरकार में सेना की स्थिति कमज़ोर हो जाएगी.
जब जनरल कोंस्टेनटिनो चिवेंगा ने मुगाबे को आज़ादी की लड़ाई में शामिल रहे लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई न करने की चेतावनी दी तो उसे मनंगाग्वा की बर्ख़ास्तगी से जोड़कर देखा गया.
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'पार्टी के लिए पैसा मनंगाग्वा जुटाते हैं'
मनंगाग्वा का जन्म विशावाने में हुआ और वे ज़िम्बाब्वे के सबसे बड़े समुदाय शोना के कारंगा समूह से आते हैं.
कारंगा शोना समुदाय का सबसे बड़ा समूह हैं और कुछ लोग मानते हैं कि 37 साल के इंतज़ार के बाद अब किसी कारंगा को सत्ता मिलनी चाहिए.
मुगाबे ज़ेज़ेरू समूह के हैं.
2001 में आई संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ ज़ानू-पीएफ़ की सभी व्यापारिक गतिविधियां मनंगाग्वा ही संभालते हैं.
इसमें वे फ़ैसले भी शामिल हैं जो ज़िम्बाब्वे की सेना और व्यापारियों ने कॉन्गो में उठाए.
कांगो में क्या हुआ
डीआर कांगो विवाद के दौरान ज़िम्बाब्वे की सेना वहां की सरकार की मदद करने गई.
लेकिन और बहुत से देशों की तरह उन पर भी आरोप लगा कि उन्होंने इस मौक़े का इस्तेमाल कांगो के क़ुदरती संसाधनों जैसे हीरे, सोना और बाक़ी खनिजों को लूटने में किया.
मनंगाग्वा ज़ानू-पीएफ़ के लिए पैसे जुटाने में अहम भूमिका निभाते रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद ज़ाम्बिया में पले-बढ़े और वक़ालत पढ़े मनंगाग्वा अपनी पार्टी में ही सबके चहेते नहीं हैं.
मनंगाग्वा के साथ आज़ादी की लड़ाई में शामिल रहे एक पू्र्व सैनिक ने बताया कि "वह बेहद क्रूर आदमी हैं. बेहद क्रूर."
'माचिस नहीं जली तो बची जान'
ज़ानू-पीएफ़ के एक नेता ने मनंगाग्वा का भविष्य पूछने पर कहा, "आपको लगता है कि मुगाबे बुरे हैं. लेकिन क्या आपने कभी यह सोचा है कि उनके बाद आने वाला शख़्स उनसे भी बुरा हो सकता है?"
साल 2000 में क्वेक्वे के चुनाव में मनंगाग्वा को हराने वाले ब्लेसिंग चेबुंडो भी मानते हैं कि मनंगाग्वा शांति पसंद आदमी नहीं हैं.
चेबुंडो ने बताया कि प्रचार के दौरान एक बार ज़ानू-पीएफ़ के समर्थकों ने उन्हें अगवा कर लिया और जलाकर मारने की कोशिश की. चेबुंडो की जान तब बची जब उन्हें पेट्रोल से नहलाने वाले लड़के माचिस नहीं जला पाए.
लोगों को रिश्तेदारों की कब्र पर नचाया?
मनंगाग्वा की ऐसी छवि 1980 में हुए गृहयुद्ध में बनी जब मुगाबे की ज़ानू पार्टी और जोशुआ एनकोमो की ज़पु पार्टी के बीच संघर्ष शुरू हुआ.
तब के रक्षा मंत्री मनंगाग्वा केंद्रीय खुफ़िया एजेंसी (सीआईओ) के भी अध्यक्ष थे. सीआईओ ने सेना के साथ मिलकर ज़पु को ख़त्म करने में अहम भूमिका निभाई.
हालांकि बाद में दोनों दलों ने मिलकर ज़ानू-पीएफ़ बना ली, लेकिन तब तक ज़पु के समर्थक हज़ारों निर्दोष लोगों की जान जा चुकी थी.
बताया जाता है कि उस दौरान गांव वालों से उनके रिश्तेदारों की कब्र पर नाचने और मुगाबे के समर्थन के नारे लगाने के लिए कहा जाता था.
1987 में हुए समझौते के बाद भी ये ज़ख्म भरे नहीं हैं और माना जा रहा है कि मनंगाग्वा के लिए उन इलाक़ों के लोगों और पार्टी अधिकारियों का समर्थन हासिल करना मुश्किल होगा.
क्या मनंगाग्वा को फ़र्क नहीं पड़ता?
सेना मनंगाग्वा को उस शख़्स के तौर पर याद करती है जिसने चीन और मिस्त्र में मिले सैन्य प्रशिक्षण के बाद 1970 की आज़ादी की लड़ाई का नेतृत्व किया.
मनंगाग्वा चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के बीजिंग स्कूल ऑफ़ आइडियोलॉजी में भी रह चुके हैं.
उनके आधिकारिक प्रोफ़ाइल के मुताबिक़ 1965 में रोडेशिया सरकार ने एक ट्रेन उड़ाने के आरोप में उन्हें गिरफ़्तार किया और इतना मारा कि उनके एक कान से सुनाई पड़ना बंद हो गया. उन्हें सर के बल लटका कर रखा जाता था और वे कई दिन तक बेहोश रहते थे.
उस वक़्त उनकी उम्र 21 साल से कम थी इसलिए उन्हें मारा नहीं गया, लेकिन दस साल के लिए जेल में डाल दिया गया.
मनंगाग्वा के उस वक़्त के एक दोस्त ने नाम न छापने की शर्त पर कहा "इतनी कम उम्र में ही उन्होंने ऐसी चीज़ें देख लीं शायद इसलिए उन्हें फ़र्क नहीं पड़ता."
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विरोधियों पर कहर बरपाया?
मनंगाग्वा बाद में ज़ानू-पीएफ़ का प्रशासन संभालने लगे, लेकिन उन्हें उस पद से 2005 में हटा दिया गया क्योंकि उन पर अपने चहेतों को पार्टी में बड़ी जगहों पर रखने का आरोप था.
इसी के बाद यह ख़बरें आने लगीं कि मनंगाग्वा उपराष्ट्रपति बनने के लिए जी तोड़ कोशिश कर रहे हैं.
2008 में जब मुगाबे राष्ट्रपति चुनाव का पहला दौर हार गए तो ख़बर आई कि मनंगाग्वा ने सेना और खुफ़िया एजेंसियों के साथ मिलकर विरोधी समर्थकों पर ऐसा कहर बरपाया कि सैकड़ों लोगों की मौत हो गई और हज़ारों घर छोड़कर भाग गए.
नतीजा - मुगाबे के ख़िलाफ़ खड़े मॉर्गन स्वींगिराई ने दूसरे दौर में अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली और मुगाबे फिर से राष्ट्रपति बन गए.
मनंगाग्वा ने इन आरोपों पर कभी कुछ नहीं कहा.
ज़हरीली आइसक्रीम?
ग्रेस मुगाबे के साथ मनंगाग्वा के मुक़ाबले में तब अजीब मोड़ आ गया जब इस साल अगस्त में राष्ट्रपति मुगाबे की एक सियासी रैली में मनंगाग्वा बीमार पड़ गए और उन्हें हवा के रास्ते दक्षिण अफ़्रीका ले जाना पड़ा.
उनके समर्थकों ने आरोप लगाया कि ज़ानू-पीएफ़ ने उन्हें आइसक्रीम में ज़हर देकर मारने की कोशिश की. आइसक्रीम ग्रेस मुगाबे की डेरी से आई थी.
लेकिन फ़िलहाल के घटनाक्रम को देखकर लगता है कि अगर ग्रेस पर लगाए जा रहे आरोपों में कोई सच्चाई है तो शायद ग्रेस ने ग़लत आदमी से अदावत मोल ले ली.












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