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राजनीतिक स्वार्थ या बुरे फ़ैसले: पाकिस्तान की आर्थिक बदहाली की वजह क्या है?

इमरान ख़ान सरकार के गिरने और शहबाज़ शरीफ़ के सत्ता में आने के एक साल के दौरान राजनीतिक अस्थिरता और बिगड़ती आर्थिक स्थिति ने देश में महंगाई के एक नए तूफ़ान को जन्म दिया है.

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आज से लगभग एक साल पहले इमरान ख़ान के नेतृत्व वाली पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ (पीटीआई) की सरकार अविश्वास प्रस्ताव पारित होने के बाद गिर गई थी.

पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज़ (पीएमएल-एन) और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के नेतृत्व वाले पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट (पीडीएम) गठबंधन ने इस प्रस्ताव को लाने के पीछे के बड़े कारणों में महंगाई और आम लोगों पर इसके प्रभाव को बताया था.

पीटीआई की सरकार ने अपनी सत्ता जाने होने से कुछ महीने पहले देश में पेट्रोल के दाम में कमी करते हुए उसे कई महीनों तक बरक़रार रखने का एलान किया था.

पीडीएम नेताओं के अनुसार, यह और इस तरह के दूसरे कई आर्थिक फ़ैसले पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की बदहाली के कारण बने.

पिछले साल 10 अप्रैल को जब शहबाज़ शरीफ़ ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली तो उन्होंने अपने पहले भाषण में इस बात का वादा किया था कि वो "पाकिस्तान को वर्तमान आर्थिक स्थिति से बाहर निकालेंगे और ग़रीब जनता को राहत देने की हर संभव कोशिश करेंगे."

जबकि इसके विपरीत पिछले एक साल के दौरान राजनीतिक अस्थिरता और बिगड़ती आर्थिक स्थिति ने देश में महंगाई के एक नए तूफ़ान को जन्म दिया है.

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कैसे चरमराती गई अर्थव्यवस्था

गठबंधन सरकार के पिछले एक साल के कार्यकाल में विभिन्न आर्थिक सूचकांकों में गिरावट देखी गई है.

रुपए के मूल्य में ज़बर्दस्त कमी आई, डीज़ल और पेट्रोल की क़ीमतों के साथ ब्याज दर देश के इतिहास में सर्वोच्च स्तर पर पहुंच गया है.

आयात पर प्रतिबंध और एलसी (लेटर ऑफ़ क्रेडिट) न खुलने के कारण आर्थिक क्षेत्र को बड़ा नुक़सान हुआ है.

इन परिस्थितियों में अब ये सवाल पूछे जा रहे हैं कि क्या तहरीक-ए-इंसाफ़ सरकार के गिरने के समय, देश की अर्थव्यवस्था उस मोड़ तक पहुंच चुकी थी कि उस पर क़ाबू पाना क़रीब एक साल में संभव नहीं था या वर्तमान सरकार ने 'राजनीतिक स्वार्थ' पर आधारित ऐसे फ़ैसले किए जो और अधिक बदहाली का कारण बने?

पिछले एक साल के दौरान डॉलर के मुक़ाबले पाकिस्तानी रुपए के मूल्य में सौ रुपये से अधिक की गिरावट हुई है.

पाकिस्तान में ब्याज की दर में 9.5 प्रतिशत की वृद्धि रिकॉर्ड की गई, पेट्रोल और डीज़ल की क़ीमत में लगभग 150 रुपए का इज़ाफ़ा हुआ और देश का मुद्रा भंडार 10.5 अरब डॉलर से कम होकर 4.2 अरब डॉलर रह गया.

सबसे अहम बात ये है कि देश में महंगाई की दर 12.7 प्रतिशत से बढ़कर 35 प्रतिशत से आगे निकल गई है.

गठबंधन सरकार में शामिल राजनीतिक दल इन परिस्थितियों के लिए पिछली सरकार को ज़िम्मेदार बताते हैं.

दूसरी ओर, आर्थिक मामलों पर गहरी नज़र रखने वाले लोग मिफ़्ताह इस्माइल की जगह इसहाक़ डार को वित्त मंत्री बनाने के फ़ैसले की भी आलोचना कर रहे हैं.

हमने इस बात का जायज़ा लेने की कोशिश की कि क्या देश की वर्तमान आर्थिक स्थिति की वजह गठबंधन सरकार के ऐसे फ़ैसले हैं, जिसे लेते वक़्त आर्थिक पहलुओं के बजाय कथित 'राजनीतिक स्वार्थ' को ध्यान में रखा गया?

देश की अर्थव्यवस्था और जनता को पिछले एक साल के दौरान बेहद ख़राब आर्थिक स्थिति ने कैसे प्रभावित किया? आइए जानते हैं इस पर विशेषज्ञों की क्या राय है.

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डॉलर की क़ीमत में इज़ाफ़ा

पिछले साल अप्रैल में पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) के नेतृत्व में बनने वाली गठबंधन सरकार ने पाकिस्तानी रुपये के मुकाबले में डॉलर के मूल्य को कम करने के दावे किए थे और नई सरकार बनने के कुछ दिनों बाद तक डॉलर की क़ीमत में मामूली कमी भी देखी गई थी.

लेकिन इसके बाद डॉलर के मूल्य में होने वाली वृद्धि ने सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए और आज डॉलर की क़ीमत 285 रुपये के स्तर तक पहुंच चुकी है.

वर्तमान सरकार के बनने के एक साल में डॉलर के मूल्य में एक सौ रुपये तक की वृद्धि दर्ज की गई है.

डॉलर मूल्य के उतार-चढ़ाव पर वित्तीय मामलों के विशेषज्ञ डॉक्टर हफ़ीज़ पाशा ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि पिछली सरकार ने जाते हुए जो क़दम उठाए थे, उनका सबसे अधिक नुक़सान आईएमएफ़ के प्रोग्राम का ख़त्म होना था.

वह कहते हैं, "गठबंधन सरकार की ओर से इसहाक़ डार को वित्त मंत्री बनाना एक बड़ी भूल थी. इसके बाद से बहुत से ग़लत फ़ैसले लिए गए."

वित्तीय मामलों के विशेषज्ञ और पिछली सरकार के आर्थिक मामलों के प्रवक्ता मुज़म्मिल असलम ने बीबीसी से बात करते हुए आरोप लगाया कि गठबंधन सरकार ने दुनिया को पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की ग़लत तस्वीर पेश की.

वह कहते हैं कि उस समय देश 6 प्रतिशत की दर से विकास कर रहा था जबकि "गठबंधन सरकार ने दुनिया को 4 प्रतिशत बताया. देश का वित्तीय घाटा साढ़े 12 अरब डॉलर था, उन्होंने उसे अगले तीन महीने में साढ़े 22 अरब डॉलर बताया."

https://twitter.com/AtifRMian/status/1643640018022416384?s=20

अमेरिका स्थित पाकिस्तानी वित्त विशेषज्ञ आतिफ़ मियां ने भी कुछ दिन पहले सोशल मीडिया पर सिलसिलेवार ट्वीट्स के ज़रिए पिछले एक साल के आर्थिक फ़ैसलों को इस तरह लिखा है:-

"हाल के आंकड़ों पर नज़र डालने से पता चलता है कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पटरी से उतर रही है. अगर निर्यात की बात की जाए तो कोविड-19 के बाद निर्यात में वैश्विक स्तर पर वृद्धि हुई, लेकिन 2022 की दूसरी तिमाही के आसपास भारत और बांग्लादेश के मुक़ाबले पाकिस्तान के निर्यात में कमी आई और अब यह अंतर 20 प्रतिशत से अधिक है."

उन्होंने इसकी वजह बताते हुए लिखा, "यह रुपये के मूल्य में कमी और भुगतान के अत्यधिक असंतुलन के कारण हुआ."

उन्होंने गठबंधन सरकार के फ़ैसलों की आलोचना करते हुए लिखा, "लेकिन पीडीएम सरकार ने जो किया है वह इससे भी बढ़कर है. उन्होंने बिना किसी योजना के स्टेट बैंक के गवर्नर को हटा दिया, अपने ही वित्त मंत्री के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया और आख़िर में योग्यता को तवज्जो ना देते हुए उनकी जगह प्रधानमंत्री के क़रीबी रिश्तेदार को वित्त मंत्री बना दिया गया."

पत्रकार नदीम मलिक के अनुसार, जिस समय 'पीडीएम' इमरान ख़ान के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव लाने में सफल हुई थी, आईएमएफ़ का प्रोग्राम बंद था, मित्र देश से भी मदद नहीं आ रही थी और देश को 17.3 अरब का वित्तीय घाटा हुआ था.

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आयात पर पाबंदी और एलसी की बंदिश

अप्रैल 2022 में वर्तमान सरकार की स्थापना के बाद विदेशी वित्त के क्षेत्र में ज़रूरी फ़ंड्स न होने के कारण पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार में तेज़ी से कमी आई थी.

एक ओर पाकिस्तान के लिए आईएमएफ़ प्रोग्राम के स्थगित होने से विश्व बैंक और एशियाई डेवलपमेंट बैंक से फ़ंड्स प्राप्त करना भी संभव नहीं हो सका तो दूसरी ओर मित्र देशों की ओर से भी कोई ख़ास मदद नहीं मिल सकी.

व्यापारिक और चालू खातों के घाटों में कमी लाने के लिए सरकार ने 19 मई 2022 को लग्ज़री सामान के आयात पर पाबंदी लगा दी.

इस प्रतिबंध के बावजूद देश के विदेशी मुद्रा भंडार, कमी का शिकार नज़र आए जिसका कारण पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स, खाने के तेल, गेहूं और मशीनरी के आयात पर ख़र्च होने वाले डॉलर थे.

डॉलर की कमी की वजह से बैंकों की ओर से आयात की एलसी न खोलने के कारण पिछले साल की अंतिम तिमाही में देश के बंदरगाहों पर आयात का सामान लाने वाले कार्गो के कंटेनर फंसना शुरू हो गए और इस साल की फ़रवरी तक हज़ारों की संख्या में ऐसे कंटेनर फंस गए जिनकी एलसीज़ डॉलर की कमी की वजह से ना खुल सकीं.

सरकार की ओर से ज़रूरी सामान जैसे पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स, खाने के तेल और गेहूं की एलसी खोलने को प्राथमिकता दी गई, लेकिन इसके बावजूद आयात की एलसी खोलना अभी तक एक समस्या बनी हुई है.

पाकिस्तान के केंद्रीय बैंक के अनुसार, अप्रैल 2022 में देश के पास कुल 16.4 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार था जिनमें स्टेट बैंक के पास लगभग साढ़े दस अरब डॉलर और कमर्शियल बैंकों के पास छह अरब डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार थे.

देश के व्यापारिक और चालू खातों के घाटों की वजह से उनमें लगातार कमी दर्ज की गई और मार्च के महीने के अंत तक यह भंडार 9.7 अरब डॉलर का रह गया जिनमें केंद्रीय बैंक के पास 4.2 अरब डॉलर और कमर्शियल बैंकों के पास 5.5 अरब डॉलर के भंडार हैं.

https://twitter.com/AtifRMian/status/1643640023168761857?s=20

ब्याज दर में वृद्धि

पाकिस्तान में इस समय ब्याज की दर देश के इतिहास के सर्वोच्च स्तर 21 प्रतिशत पर है. पिछले साल सरकार बदलने से पहले देश में ब्याज की दर 12.5 प्रतिशत थी, जिसमें एक साल में 9.5 प्रतिशत का इज़ाफ़ा दर्ज किया गया, जो किसी भी सरकार के पूरे पांच साल या उससे कम काल में सबसे बड़ी वृद्धि है.

पीटीआई की सरकार गिरने से केवल दो-तीन दिन पहले स्टेट बैंक ऑफ़ पाकिस्तान ने ब्याज की दर में 2.5 प्रतिशत वृद्धि करके उसे 12.5 प्रतिशत कर दिया था.

वर्तमान सरकार की स्थापना के बाद मई 2022 में स्टेट बैंक ने सूद की दर में और डेढ़ प्रतिशत की वृद्धि कर दी और उसकी कुल दर 14 प्रतिशत हो गई. इस साल मार्च के महीने की शुरुआत में सूद की दर में एक और बड़ा इज़ाफ़ा किया गया और उसे 20 प्रतिशत कर दिया गया.

सूद की दर में इस बड़ी वृद्धि की वजह आईएमएफ़ की शर्त को बताया गया जिसके तहत पाकिस्तान को देश में सूद की दर में वृद्धि करनी पड़ेगी.

इसी शर्त के तहत अप्रैल के महीने की शुरुआत में छूट की दर में एक बार फिर एक प्रतिशत वृद्धि की गई ताकि आईएमएफ़ प्रोग्राम की बहाली के लिए इस शर्त को पूरा किया जा सके.

डॉक्टर हफ़ीज़ पाशा के अनुसार, राजनीतिक बयानों और लाभ के लिए आईएमएफ़ के प्रोग्राम से संबंधित उपायों को देर से करना भी एक ग़लती थी. आईएमएफ़ प्रोग्राम पर सरकार ने जानते-बूझते राजनीतिक बयान दिए और इस पर सही ढंग से अमल नहीं किया.

"इसके नतीजे में हमारा निर्यात गिर गया, रुपये के मूल्य में गिरावट की वजह से विदेशी मुद्रा भंडार में कमी हुई और देश में महंगाई और सूद की दर में इज़ाफ़ा हुआ."

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पेट्रोल-डीज़ल के बढ़े दाम

पाकिस्तान में पेट्रोल और डीज़ल की क़ीमतें आर्थिक पहलू के साथ-साथ राजनीतिक समस्या भी रही हैं. विपक्षी दल हमेशा पेट्रोल-डीज़ल का मूल्य बढ़ाने पर सरकार की आलोचना करते रहे हैं, चाहे वैश्विक स्तर पर भी उनके दाम में बढ़ोतरी क्यों ना हो रही हो.

वर्तमान सरकार के अप्रैल 2022 में सत्ता में आने से पहले मार्च के महीने की शुरुआत में तहरीक-ए-इंसाफ़ की सरकार ने डीज़ल और पेट्रोल के दाम को स्थिर कर दिया था हालांकि उस समय वैश्विक स्तर पर दाम बढ़ रहे थे.

तहरीक-ए-इंसाफ़ के इस क़दम को आर्थिक तौर पर ग़लत बताया गया क्योंकि इसके लिए हर महीने कई अरब रुपए की सब्सिडी की ज़रूरत थी. इस क़दम की वजह से पाकिस्तान के लिए आईएमएफ़ ने अपना क़र्ज़ प्रोग्राम स्थगित कर दिया.

वर्तमान सरकार बनने के समय पेट्रोल की क़ीमत 149.86 रुपये प्रति लीटर थी जबकि डीज़ल की क़ीमत 144.15 रुपये प्रति लीटर थी.

सरकार की ओर से इन दामों को डेढ़ महीने तक स्थिर रखा गया, लेकिन आईएमएफ़ की ओर से शर्तों के तहत इस सब्सिडी की समाप्ति के बाद 26 मई 2022 को पेट्रोल और डीज़ल की एक लीटर की क़ीमत में 30-30 रुपये की बढ़ोतरी की गई.

इसके बाद मूल्यों में मामूली उतार-चढ़ाव जारी रहा.

मार्च के मध्य में एक बार फिर इज़ाफ़ा देखा गया जिसकी वजह डॉलर की क़ीमत में वृद्धि बताया गया. हालांकि वैश्विक बाजार में तेल के मूल्यों में मार्च के महीने में बहुत अधिक कमी देखी गई.

वर्तमान सरकार के एक साल में पेट्रोल के दाम में 122.14 रुपये की वृद्धि हुई जो 149.86 से बढ़कर 272 रुपये प्रति लीटर हो गई.

डीज़ल के मूल्य में 148.85 रुपये प्रति लीटर का इज़ाफ़ा हुआ जो अप्रैल 2022 में 144.15 रुपये से अप्रैल 2023 में 293 रुपये प्रति लीटर हो गई.

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उच्च महंगाई दर

पाकिस्तान में वर्तमान सरकार के एक साल में रुपए के मूल्य में होने वाली कमी, तेल व पेट्रोल की क़ीमतों और सूद की दर में होने वाले इज़ाफ़े और आयात पर पाबंदी का कुल मिलाकर प्रभाव पाकिस्तान में महंगाई के इज़ाफ़े की शक्ल में सामने आया जो एक साल की अवधि में 35 प्रतिशत से अधिक होकर पिछले पांच दशकों के सर्वोच्च स्तर पर पहुंच चुकी है.

अप्रैल 2022 में सरकार के बदलाव से पहले मार्च के महीने के अंत में केंद्रीय सांख्यिकी संस्था के अनुसार महंगाई की दर 12.7 प्रतिशत थी जो अप्रैल व मई 2022 में थोड़े से इज़ाफ़े के बाद 13 फ़ीसद से अधिक हो गई. लेकिन उसी साल जून के अंत में महंगाई की दर 21 प्रतिशत से ऊपर चली गई. महंगाई की दर में वृद्धि जारी रही और जुलाई में यह लगभग 25 प्रतिशत तक जा पहुंची.

जनवरी 2023 में महंगाई की दर में मामूली उतार-चढ़ाव जारी रहा, लेकिन फ़रवरी के महीने में यह दर 31 प्रतिशत से आगे निकल गई. मार्च के महीने में महंगाई की दर में और वृद्धि हुई जो 35.4 प्रतिशत तक जा पहुंची.

इस बारे में टिप्पणी करते हुए डॉक्टर हफ़ीज़ पाशा कहते हैं कि 'अगर पिछले साल सितंबर में आईएमएफ़ प्रोग्राम की शुरुआत से ही सरकार राजनीतिक बयानों और स्वार्थों को नज़रअंदाज़ करते हुए उपाय करती और मार्केट में ग़लत संदेश ना भेजती तो स्थिति कुछ बेहतर होती.'

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