पहले नकबे में 7 लाख लोगों ने छोड़ा फिलिस्तीन, अब गाजा छोड़ गए 10 लाख लोग, क्या ये दूसरा नकबा है?
साल 2023 में 15 मई को "नकबा" के 75 वर्ष पूरे हो गए। नकबा अरबी भाषा का शब्द है, जिसका मतलब तबाही या विनाश है। इजराइल से जंग हारने के बाद 1948 में फिलिस्तीनियों का बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ था।
अब इजराइल द्वारा फिलिस्तीनी लोगों को गाजा छोड़ने का अल्टीमेटम दिया गया है। इजरायल की इस चेतावनी के बाद गाजा के लोग मजबूरन अपना घर-बार छोड़कर दूसरी जगह जा रहे हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक बीते 7 दिन में अब तक 10 लाख से अधिक लोग गाजा छोड़ चुके हैं।

इससे पहले इजराइली सेना ने गाजा पट्टी पर पर्चे भी गिराए थे। पर्चे में गाजा छोड़ने की चेतावनी देते हुए लिखा गया, '24 घंटे में गाजा में रहने वाले फिलिस्तीनी वहां से दूसरी जगहों पर शिफ्ट हो जाएं। वहां रहने वाले लोग उनके दुश्मन नहीं हैं, वो केवल हमास को खात्म करना चाहते हैं।'
इससे गाजा में भीषण पलायन की स्थिति हो गई है। हर कोई अपने निजी वाहन व अन्य माध्यमों से दक्षिणी इलाके की ओर भागता नजर आ रहा है। गाजा से निकलकर आ रही तस्वीरों में देखा जा सकता है कि कैसे लोग अपनी कारों की छत पर गद्दे लादकर परिवार सहित शहर छोड़ रहे हैं।
कुछ ऐसे वीडियो भी हैं जिनमें लोग बड़े ट्रक व केंटर पर चढ़कर भाग रहे हैं। अब गाजा पर इजराइली सेना की कार्रवाई को फिलिस्तीन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने दूसरा नकबा बताया है।
1948 की शुरुआत में अरब और इजराइल युद्ध के बाद यहूदियों ने फिलिस्तीन के दर्जनों गांवों और शहरों पर कब्जा कर लिया, जिसके बाद हजारों फिलिस्तीनियों को अपना घर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा।
1949 तक 7 लाख से अधिक फिलिस्तीनियों ने अपना घर छोड़ दिया और संयुक्त राष्ट्र के शरणार्थी बन गए। इनमें से कई लोग घरों पर ताला लगाकर गए थे कि दोबारा सब कुछ ठीक हो जाएगा तो फिर से वे अपने घर लौट आएंगे। हालांकि ऐसा नहीं हो पाया।
अब उनकी चाबियां इस दिन की प्रतीक बन गई हैं। 14 मई को इजरायल के लोग अपने देश की स्थापना का जश्न मनाते हैं। वहीं, 15 मई को फिलिस्तीन के लोग नकबा यानी कि तबाही का दिन मानते हैं।1998 में फिलिस्तीन के राष्ट्रपति यासिर अराफात ने अल-नकबा मनाने की शुरुआत की थी।
फिलिस्तीन शरणार्थियों के लिए काम कर रहे संयुक्त राष्ट्र राहत और कार्य एजेंसी (UNRWA) का अनुमान है कि 6 मिलियन फिलिस्तीनी शरणार्थी आज भी इन क्षेत्रों के शिविरों रह रहे हैं।












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