Explainer: म्यांमार बॉर्डर भी बांग्लादेश की तरह होगा ब्लॉक.. जानिए क्या है फ्री मूवमेंट रिजीम, क्या होगा अंजाम

India-Myanmar border Free Movement: केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने शनिवार (20 जनवरी) को घोषणा की कि है, केंद्र ने लोगों की मुक्त आवाजाही को रोकने के लिए भारत-म्यांमार सीमा की पूरी लंबाई में बाड़ लगाने का फैसला किया है।

भारत और म्यांमार, दोनों देशों के बीच 1,643 किलोमीटर लंबी बिना बाड़ वाली सीमा है, जो मणिपुर, मिजोरम, असम, नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश राज्यों से होकर गुजरती है। और सैन्य शासन लागू होने के बाद से भारी संख्या में म्यांमार के शरणार्थी भागकर भारत पहुंचे हैं।

India-Myanmar border Free Movement Regime

अमित शाह ने गुवाहाटी में कहा, कि "म्यांमार के साथ हमारी सीमा एक खुली सीमा है। नरेंद्र मोदी सरकार ने फैसला लिया है, कि भारत-म्यांमार सीमा सुरक्षित रहेगी और पूरी सीमा पर बांग्लादेश सीमा की तरह बाड़ लगाई जाएगी। सरकार म्यांमार के साथ हमारे फ्री मूवमेंट रिजीम (एफएमआर) समझौते पर पुनर्विचार कर रही है और आने-जाने की इस आसानी को ख़त्म करने जा रही है।"

भारत-म्यांमार बॉर्डर फ्री मूवमेंट रिजीम क्या है

भारत-म्यांमार बॉर्डर फ्री मूवमेंट रिजीम, यानि एफएमआर समझौता 2018 में लागू किया गया था। इसके पीछे क्या तर्क था और मणिपुर में मेइतेई और कुकी के बीच चल रहे जातीय संघर्ष के बीच पिछले साल इसे वापस लेने पर कुछ चर्चा क्यों हुई? आइये समझते हैं

एफएमआर भारत और म्यांमार के बीच एक पारस्परिक रूप से सहमत व्यवस्था है, जो दोनों तरफ सीमा पर रहने वाली जनजातियों को बिना वीजा के दूसरे देश के अंदर 16 किमी तक यात्रा करने की अनुमति देती है।

इसे 2018 में नरेंद्र मोदी की सरकार की एक्ट ईस्ट नीति के हिस्से के रूप में लागू किया गया था, उस समय जब भारत और म्यांमार के बीच राजनयिक संबंध काफी मजबूत हो गये थे। दरअसल, एफएमआर को 2017 में ही लागू किया जाना था, लेकिन उस साल अगस्त में उभरे रोहिंग्या शरणार्थी संकट की वजह से इसे टाल दिया गया था।

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बॉर्डर फ्री मूवमेंट रिजीम क्यों लागू किया गया?

भारत और म्यांमार के बीच की सीमा का सीमांकन 1826 में अंग्रेजों द्वारा क्षेत्र में रहने वाले लोगों की राय लिए बिना किया गया था। जिससे इस सीमा रेखा ने प्रभावी ढंग से एक ही जातीयता और संस्कृति के लोगों को उनकी सहमति के बिना दो देशों में विभाजित कर दिया। वर्तमान भारत-म्यांमार सीमा अंग्रेजों द्वारा खींची गई रेखा को दर्शाती है।

इस क्षेत्र के लोगों के बीच सीमा पार मजबूत जातीय और पारिवारिक संबंध हैं। मणिपुर के मोरेह क्षेत्र में ऐसे गांव हैं, जहां कुछ घर म्यांमार में हैं। नागालैंड के मोन जिले में, सीमा रेखा वास्तव में लोंगवा गांव के मुखिया के घर से होकर गुजरती है, जिससे उनका घर दो हिस्सों में बंट जाता है। एक हिस्सा भारत में और दूसरा हिस्सा म्यांमार में।

लिहाजा, लोगों से लोगों के बीच संपर्क को और सुविधाजनक बनाने के अलावा, एफएमआर को स्थानीय व्यापार और व्यवसाय को प्रोत्साहन प्रदान करने के लिए डिजाइन किया गया था। इस क्षेत्र में सीमा शुल्क और सीमा हाटों के माध्यम से सीमा पार व्यापार का एक लंबा इतिहास रहा है। कम आय वाली अर्थव्यवस्था को देखते हुए, स्थानीय आजीविका को बनाए रखने के लिए ऐसे व्यापारिक आदान-प्रदान काफी महत्वपूर्ण हैं। म्यांमार में सीमावर्ती लोगों के लिए भी, भारतीय शहर अपने देश की तुलना में व्यवसाय, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा के लिए ज्यादा नजदीक हैं।

तो फिर FMR को क्यों खत्म किया जा रहा?

म्यांमार से भारत में आदिवासी कुकी-चिन लोगों का अवैध प्रवास मणिपुर में चल रहे संघर्ष के प्रमुख मुद्दों में से एक है। जबकि, मैतेई लोगों ने म्यांमार के इन अवैध प्रवासियों और भारत-म्यांमार सीमा (आईएमबी) पर, कथित "नार्को-आतंकवादी नेटवर्क" पर राज्य में परेशानी पैदा करने का आरोप लगाया है, वहीं कुकियों ने मैतेई लोगों और मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह, जो स्वयं एक मैतेई हैं, उन्हें इसके लिए दोषी ठहराया है।

लिहाजा, म्यांमार में संवेदनशील हालातों के बीच एफएमआर को लेकर गंभीर सवाल उठने शुरू हो गये हैं।

हालांकि, यह स्थानीय लोगों के लिए फायदेमंद है और भारत-म्यांमार संबंधों को बेहतर बनाने में सहायक है, लेकिन अतीत में अवैध आप्रवासन, मादक पदार्थों की तस्करी और हथियारों की तस्करीके लिए इसकी काफी आलोचना भी की गई है।

सीमा रेखा जंगली और ऊबड़-खाबड़ इलाके से होकर गुजरती है, लगभग पूरी तरह से बाड़ रहित है और निगरानी करना मुश्किल है। मणिपुर में सीमा के 6 किमी से भी कम हिस्से में बाड़ लगाई गई है।

1 फरवरी 2021 को, म्यांमार में सैन्य तख्तापलट के बाद से, सत्तारूढ़ ,सेना ने कुकी-चिन लोगों के खिलाफ उत्पीड़न का अभियान शुरू कर दिया है। इसने बड़ी संख्या में म्यांमार के आदिवासियों को देश की पश्चिमी सीमा पार कर भारत, विशेषकर मणिपुर और मिजोरम में भागना पड़ा है, जहां उन्होंने आश्रय मांगा है। मिजोरम, जहां आबादी के एक बड़े वर्ग के सीमा पार के लोगों के साथ घनिष्ठ जातीय और सांस्कृतिक संबंध हैं, उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्रालय के विरोध के बावजूद, 40,000 से ज्यादा शरणार्थियों के लिए शिविर स्थापित किए हैं।

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म्यांमार से मणिपुर में पलायन

पिछले कुछ महीनों में मणिपुर में भी बड़ी संख्या में अवैध प्रवासी आए हैं। 2023 में ऐसे प्रवासियों की पहचान के लिए राज्य सरकार द्वारा गठित एक समिति ने उनकी संख्या 2,187 बताई है। सूत्रों ने कहा है, कि सितंबर 2022 में मोरेह में 5,500 अवैध अप्रवासी पकड़े गए और 4,300 को वापस म्यांमार भेज दिया गया। इन व्यक्तियों के बायोमेट्रिक्स रिकॉर्ड किए गए हैं।

2023 में, मणिपुर के मुख्य सचिव विनीत जोशी ने असम राइफल्स को पत्र लिखकर म्यांमार से 718 नई घुसपैठ की रिपोर्ट पर चिंता व्यक्त की और अर्धसैनिक बल से उनकी पहचान करने और उन्हें निर्वासित करने के लिए कहा।

मणिपुर सरकार ने आरोप लगाया है, कि ग्राम प्रधान अवैध रूप से म्यांमार के प्रवासियों को पहाड़ियों के नए गांवों में बसा रहे हैं, जिससे वनों की कटाई हो रही है। पिछले मार्च में इन नए गांवों के खिलाफ बेदखली अभियान पहाड़ियों में कुकियों और सरकार के बीच टकराव का कारण बन गया था, जिससे राज्य में हिंसा हुई। कुकी और नागा लोग इम्फाल घाटी को घेरने वाली पहाड़ियों में रहते हैं, जबकि म्यांमार की घाटी बहुसंख्यक मैतेई लोगों का घर है।

2 मई 2023 को, मणिपुर में हिंसा भड़कने से एक दिन पहले, मुख्यमंत्री बीरेन सिंह ने इम्फाल में एक संवाददाता सम्मेलन में कहा था, कि "म्यांमार से मणिपुर में अवैध आप्रवासन ऐसा है, कि हमने अब तक उस देश के 410 लोगों को हिरासत में लिया है। उनमें से अतिरिक्त 2,400 लोग सीमावर्ती क्षेत्रों के घरों में शरण मांग रहे हैं...जो म्यांमार से भाग गए हैं...।"

उन्होंने आगे कहा, कि "हमारे पास यह मानने के कारण हैं, कि मणिपुर में कई और म्यांमारवासी अवैध रूप से रह रहे होंगे... राष्ट्र और राज्य के व्यापक हित में और सुरक्षा उद्देश्यों के लिए, मैं उन सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले लोगों से अपील करता हूं, जहां घुसपैठ हो सकती है, वो लोग सहयोग करें, ताकि ऐसे अप्रवासियों का विवरण दर्ज किया जा सके।"

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FMR से आतंकवाद और मादक पदार्थों की तस्करी?

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में सेंटर फॉर लैंड वारफेयर स्टडीज (CLAWS) की अनुराधा ओइनम द्वारा प्रकाशित एक पेपर के मुताबिक, यूनाइटेड नेशनल लिबरेशन फ्रंट (UNLF), पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA), यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (ULFA), नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड (एनएससीएन), जैसे समूहों ने सागांग डिवीजन, काचिन राज्य और चिन राज्य (म्यांमार में) में शिविर बनाए हैं।

पेपर में कहा गया है, कि "उन्होंने वहां शरण ली है और हथियार प्राप्त किए, कैडरों को प्रशिक्षित किया, और, सबसे महत्वपूर्ण बात, धन जुटाने के लिए दवाओं की तस्करी और हथियार बेचने जैसी अवैध गतिविधियों में लगे रहे। यह एफएमआर के लगातार दुरुपयोग के कारण संभव हुआ है। इसलिए, नशीली दवाओं की तस्करी और बिना बाड़ वाली सीमाओं पर अवैध सीमा पार आवाजाही को कम करने के लिए सीमावर्ती क्षेत्रों का प्रभावी ढंग से प्रबंधन और प्रशासन करना जरूरी है।''

FMR हटने का क्या हो सकता है परिणाम?

समय-समय पर व्यवस्था की समीक्षा की गई है, और ज्यादातर विशेषज्ञ इस बात से सहमत हैं, कि एफएमआर को बेहतर मैनज करने की जरूरत है। जैसे ही म्यांमार में संकट बढ़ा और शरणार्थियों की आमद बढ़ी, भारत ने सितंबर 2022 में FMR को सस्पेंड कर दिया।

हालांकि, स्थानीय आबादी के फायदों को देखते हुए, न तो एफएमआर को पूरी तरह हटाना और न ही सीमा पर पूरी बाड़ लगाना सही फैसला हो सकता है। इससे लोगों की आजीविका तो प्रभावित होगी ही, इसके साथ ही उनके स्वास्थ्य देखभाल और शिक्षा के लिए आवश्यक यात्रा प्रभावित हो सकती है।

ओइनम के अखबार ने तर्क दिया है, कि "नई दिल्ली के लिए यह जरूरी है, कि वह 'बिना लाठी तोड़े सांप को मार डाले' दृष्टिकोण अपनाकर इस मुद्दे से निपटे।"

सुरक्षा प्रतिष्ठान के एक वरिष्ठ अधिकारिक सूत्र ने कहा, कि खतरनाक इलाके में बिना बाड़ वाली सीमा के पार अवैध आव्रजन या मादक पदार्थों की तस्करी को रोकना आसान नहीं है। उन्होंने कहा, कि "मजबूत गश्त और खुफिया जानकारी के बावजूद भी, लोग घुसपैठ कर लेते हैं, खासकर तब जब हमारी तरफ से आप्रवासियों के प्रति कोई शत्रुता नहीं है। एफएमआर हो या न हो, इसे रोकना कोई आसान काम नहीं है। और सभी सीमाएं, यहां तक कि बाड़ लगी सीमाएं भी, मादक पदार्थों की तस्करी से निपटने के लिए पूरी तरह से कारगर साबित नहीं हो सकती है।

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