तालिबान के काबुल में घुसने पर क्या सोच रहे हैं लोग ? खौफ की कहानी स्थानीय पत्रकार की जुबानी
काबुल, 15 अगस्त: तालिबान काबुल में दस्तक दे चुका है। अशरफ गनी सरकार की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है। तालिबान की क्रूरता के बारे सोचकर लोग कांपने लगे हैं। दो दशकों में तालिबान बदल चुका है, इस थ्योरी पर भरोसा करने के लिए कोई तैयार नहीं है। काबुल स्थित एक पत्रकार ने वहां की ताजा हालात के बारे में जो आंखों देखा हाल बयां किया है, उससे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। बड़े घरों से लेकर झुग्गियों तक में रहने वाले लोगों में एक ही चर्चा है कि तालिबान किसके साथ क्या करने वाला है?

'सबकुछ बहुत ही क्रूर और भयावह है'
लोगों के चेहरे ही दहशत की कहानी बयां कर रहे हैं। खौफ चारों तरफ है। लोगों के दिलों में, पड़ोस की सड़कों पर और नुक्कड़ों से लेकर बड़े बाजारों तक में लोग सहमे हुए हैं। आलीशान घरों में समाचार देख रहे लोगों से लेकर झोपड़-पट्टियों में मोबाइल से ताजा अपडेट ले रहे, हर शख्स का एक ही सवाल है कि आगे क्या ? आउटलुक इंडिया के मुताबिक काबुल नाउ के चीफ एडिटर असद कोशा ने जो आंखो देखा हाल बयां किया है, वह सुनकर वहां की ताजा हालात की असल तस्वीर बयां हो रही है। काबुल में लोगों के मन में आतंक कायम है। तालिबान के कहर ढाने वाले वीडियो वायरल हो रहे हैं। लोगों के मन में एक ही डर है, 'जब वे काबुल में आएंगे तो हमारा भी हाल ऐसा ही हो सकता है।' अफगान जवानों के सिर कलम करने की अफवाहों का बाजार भी गर्म है। सबकुछ बहुत ही क्रूर और भयावह है।
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'विश्वास नहीं होता है कि तालिबान बदल चुका है'
20 साल बाद इतिहास दोहराने की कगार पर है। अमन पसंद लोगों के लिए यह बुरे सपने की तरह है, जिसकी उन्होंने कभी कल्पना नहीं की थी। कोशा कहते हैं कि मैं दूसरों से ज्यादा भाग्यशाली हूं। मैं काबुल में अकेला हूं। मेरा परिवार और करीबी रिश्तेदार विदेश में हैं। लेकिन, मैं अपने दोस्तों और सहकर्मियों की हालत देख रहा हूं, जिनकी पत्नियां, बच्चे, माता-पिता और परिवार के लोग देश में रहते हैं। मेरी महिला मित्र विशेष रूप से आहत हैं। हम में से किसी को विश्वास नहीं होता है कि तालिबान बदल चुका है। कुछ लोग सोचते हैं कि यह मुल्ला उमर का तालिबान नहीं है। दोहा में भले ही तालिबान अपना दूसरा रूप दिखाता है, लेकिन अफगानिस्तान में वह अपने अतीत का कार्बन कॉपी है।

'किसी ने ऐसा नहीं सोचा था'
शांति चाहने वाले इसीलिए ठगा महसूस कर रहे हैं क्योंकि उन्होंने ऐसा नहीं सोचा था कि सरकार की कोई तैयारी नहीं है। सरकारी प्रवक्ता ये दावा करते रहे कि वह शहर को बचाने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। नागरिकों ने इसीलिए सरकार का समर्थन किया। हेरात में जब तालिबान शुरुआती तौर पर पिछड़ गया तो लोगों ने छतों पर आ के अल्लाहू अकबर के नारे लगाए। काबुल में भी रक्षा मंत्री के आवास पर हमले के बाद सुरक्षा बलों और पुलिस ने जिस तरह से तालिबान को खदेड़ा, लोगों ने सड़कों पर निकलकर उनका हौसला बुलंद किया था। लेकिन, किसी ने नहीं सोचा था कि अफगानियों का यह हाल हो जाएगा।

'मैं यह सोचकर कांप उठता हूं.....'
हाल ही में कुछ लोग पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई से भी मिले थे। बड़े सुरक्षाधिकारियों से भी मुलाकात कर थी। सबने भरोसा दिया था कि काबुल को कुछ नहीं होने देंगे। वह तो गजनी को भी वापस लेने का भरोसा दिला रहे थे। लेकिन, देखिए हुआ क्या ? अब हम उनपर कैसे यकीन करेंगे? शहरों में ज्यादातर लोग तालिबान विरोधी हैं। वे नहीं चाहते कि 20 साल में उन्हें जो आजादी मिली है, वह झटके से छीन ली जाए। लेकिन, पश्तूनों का एक वर्ग है, जो तालिबान के स्वागत के लिए तैयार है, जश्न मनाने को तैयार है। जब तालिबान काबुल में घुस जाएगा, ये लोग न सिर्फ उनके लिए लड़ेंगे, बल्कि उन लोगों के बारे में जानकारी देंगे, जिन्होंने सरकार का साथ दिया है। मैं यह सोचकर कांप उठता हूं कि ऐसे लोगों का क्या होगा....... ?












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