यूक्रेन युद्ध में धूर्तता पर उतरे यूरोपीय देश, भारत को रूस के खिलाफ खड़ा करने की जिद पर क्यों अड़े?
जब डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के राष्ट्रपति हुआ करते थे, उस वक्त उन्होंने कहा था, कि जर्मनी रूसी ऊर्जा सप्लाई पर पूरी तरह से निर्भर होता जा रहा है और उस वक्त ट्रंप के बयान का मजाक उड़ाया गया था।
नई दिल्ली, अप्रैल 13: भारत पर राज करने के लिए अंग्रेजों ने 'फूट डालो राज करो' नीति खूब अच्छे से खेला, लेकिन अभी भी पश्चिमी देश बड़ी चालाकी से यही खेल खेलते हैं। यूरोप की प्लानिंग समझिए... ये यूरोप के अंदर किसी भी तरह का बखेड़ा नहीं चाहते हैं, लेकिन किसी ना किसी तरह से एशियाई देशों के बीच 'झगड़े' को हवा देते रहना चाहते हैं, ताकि खुद की चौधराहट बनी रहे। ये यूरोपीय देश इस वक्त भारत के साथ डबल गेम खेल रहे हैं। आईये जानते हैं, कि कैसे यूरोप ने रूस के खिलाफ फूंक-फूंककर प्रतिबंध लगाएं हैं और भारत को रूस के खिलाफ खड़ा होने के लिए क्यों दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं?

जी7 में भारत को नहीं बुलाने की बात
ताजा रिपोर्ट ये है, कि इस साल जून में होने वाली जी7 की बैठक में जर्मनी बतौर मेहमान राष्ट्र भारत को आमंत्रित नहीं कर सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक, यूक्रेन पर हमला करने वाले रूस की निंदा नहीं करने को लेकर जर्मनी पीएम मोदी से गुस्सा है और इसी नाराजगी के चलते इस बार जर्मनी भारत को बतौर गेस्ट नहीं बुला सकता है। मामले के जानकर अधिकारियों के मुताबिक, जर्मनी इस बात पर बहस कर रहा है, कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जून में आयोजित होने वाले सात देशों के शिखर सम्मेलन में आमंत्रित किया जाए या नहीं? यानि, जो जर्मनी... रूस के साथ लगातार अपने संबंधों को विस्तार देता रहा और लगातार अरबों रुपये के रूसी ऊर्जा और तेल खरीदता रहा, वो चाहता है, कि भारत रूस के खिलाफ खड़ा हो जाए।
ट्रंप ने जर्मनी पर क्या कहा था?
जब डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के राष्ट्रपति हुआ करते थे, उस वक्त उन्होंने कहा था, कि जर्मनी रूसी ऊर्जा सप्लाई पर पूरी तरह से निर्भर होता जा रहा है। डोनाल्ड ट्रंप ने साल 2018 में यूनाइटेड नेशंस में कहा था, 'जर्मनी पूरी तरह से रूसी ऊर्जा पर निर्भर हो जाएगा यदि वह तुरंत अपने सब्जेक्ट को नहीं बदलता है।" डोनाल्ड ट्रंप जब जर्मनी के रूसी ऊर्जा पर निर्भर होने का जिक्र कर रहे थे, उस वक्त वहां मौजूद जर्मनी के प्रतिनिधि हंस रहे थे। इतना ही नहीं, दुनिया के कई प्रतिष्ठि अखबारों ने ट्रंप का मजाक उड़ाया था। जर्मनी ने रूस के साथ कई भारी भरकम ऊर्जा समझौते किए और नॉर्ड स्ट्रीम पाइपलाइन-2 समझौता भी जर्मनी ने रूस से किया था और इस वक्त... जब यूक्रेन युद्ध चल रहा है, उस वक्त भी जर्मनी रूस से भारी मात्रा में तेल और गैस खरीद रहा है, लेकिन ये जर्मनी भारत को जी7 कार्यक्रम में इसलिए आमंत्रित नहीं करना चाहता है, क्योंकि भारत ने अपनी रक्षा जरूरतों को ध्यान में रखते हुए रूस की निंदा करने से इनकार कर दिया।

पश्चिमी देशों का प्रॉक्सी वॉर
यूनाइटेड किंगडम के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन G7 देशों के पहले नेता हैं, जो युद्ध के बीच यूक्रेन दौरे पर गये और राजधानी कीव की सड़कों पर राष्ट्रपति जेलेंस्की के साथ मुस्कुरा रहे थे। यूक्रेन युद्ध ने न केवल "पार्टीगेट" घोटाले से ध्यान हटाकर जॉनसन के राजनीतिक भाग्य को फिर से जीवंत कर दिया है, बल्कि रूस को कोस-कोसकर और कट्टर खलनायक बनाकर बोरिस जॉनसन ने अपनी राजनीतिक भविष्य का इंश्योरेंस भी बनवा लिया है। ब्रिटेन और पश्चिमी देश... जो इराक, सीरिया, लीबिया और अफगानिस्तान की बर्बादी के सबसे प्रमुख आरोपी हैं, वो रूस की निंदा नहीं करने वालों को मानवता का दुश्मन बना रहे हैं।

कई देशों को किया बर्बाद
अमेरिका ने अफगानिस्तान, इराक, सोमालिया और सीरिया में प्रत्यक्ष लड़ाई में शामिल हुआ और इन देशों को हथियारों को परीक्षण केन्द्र बना दिया गया। लड़ाई में ये देश इस तरह बर्बाद हुए, कि सैकड़ों सालों के बाद भी इनका मुकद्दर बदल जाए, तो गनीमत होगी। सिर्फ इतना ही नहीं, इस वक्त जब यूक्रेन युद्ध के मैदान में खड़ा है और अपने आधा से ज्यादा देश को बर्बाद कर चुका है, तो यही यूरोपीय देश साइड में खड़े होकर युद्ध की धधकती ज्वाला में पेट्रोल उड़ेल रहे हैं। अभी तक यूरोपीय देश के किसी भी नेता ने युद्ध में शांति की अपील नहीं की है, बल्कि ये देश लगातार जेलेंस्की को युद्ध के लिए उकसा रहे हैं, हथियार दे रहे हैं, लेकिन, जिन कदमों से युद्ध रूक सकता है, वो काम नहीं कर रहे हैं।

जोखिम से बचकर प्रतिबंध
यूरोपीय देश 'सांप भी मर जाए और लाठी भी नहीं टूटे' वाली नीतियों के सहारे चल रहे हैं और यूक्रेन युद्ध की आग में अपने सबसे पुराने दुश्मन रूस को भी जला देना चाहते हैं, इसीलिए उन्होने रूसी अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने वाले प्रतिबंध लगाए। लेकिन, एक बार फिर से इनकी चालाकी देखिए, यूरोपीय देशों ने रूस के खिलाफ वो प्रतिबंध नहीं लगाए, जिनसे इनका खुद का नुकसान होता। जैसे, यूरोप ने अंतर्राष्ट्रीय पेमेंट सिस्टम से रूस को बाहर कर दिया है, लेकिन स्विफ्ट के एक सिस्टम में अभी भी रूस को रखा हुआ है, क्योंकि इसी सिस्टम के जरिए यूरोपीय देश रूस को तेल और गैस के बदले पैसा भेज रहे हैं। अगर यूरोप के मन में इतना ही गुस्सा है, तो जिस दिन हमला हुआ था, उसी दिन रूसी ऊर्जा आपूर्ति पर प्रतिबंध लगा देते, लेकिन चालाकी लोमड़ी की तरह यूरोप ने अपना हित देखा।

भारत पर प्रेशर बनाने की कोशिश
अमेरिका और पश्चिमी देश चीन के खिलाफ भारत को प्रमुख 'अस्त्र' की तरह देख रहे हैं, लिहाजा भारत को हमेशा से इन देशों ने चीन और पाकिस्तान का डर दिखाने की कोशिश की है। जबकि, इतिहास गवाह रहा है, कि चीन के विकास का रास्ता अमेरिका ने ही खोला था। वो राष्ट्रपति निक्सन थे, जो सबसे पहली बार चीन गये थे, जहां ताइवान को यूनाइटेड नेशंस से बाहर निकालने का समझौता हुआ था और अब ये अमेरिका... ताइवान को बचाने के लिए डींगे हांक रहा है, जबकि ताइवान को एक बार फिर से यूनाइटेड नेशंस का सदस्य बनाने के नाम पर चुप रहता है। वहीं, पाकिस्तान को अरबों रुपये के हथियार देकर भारत के खिलाफ अमेरिका ने ही खड़ा किया और जब अमेरिका का काम निकल गया, तो बारूद के ढेर पर बैठा पाकिस्तान अपनी अर्थव्यवस्था की बदहाली पर आंसू बहा रहा है।

भारत को ऑफर देने का मतलब समझिए
पिछले एक महीने में अमेरिका के तीन उच्च अधिकारियों ने और ब्रिटेन की विदेश मंत्री लिज ट्रस ने कहा है, कि भारत को रूसी हथियारों को बदलने में मदद करनी चाहिए। लेकिन, सवाल ये है, कि क्या मुफ्त में ये देश भारत को हथियार देंगे? यानि, इनका गेम समझिए... भारत जो नया हथियार खरीदेगा, ताकि रूसी हथियारों को बदला जा सके, उन हथियारों की सप्लाई कहां से होगा? अमेरिकी हथियार की तुलना में रूस ने भारत को काफी कम कीमत पर हमेशा से हथियार दिए हैं, इसीलिए भारत ने लगातार रूस से हथियार खरीदे, लेकिन क्या ऐसा पश्चिमी देश करेंगे? और अगर भारत रूस के खिलाफ खुलकर खड़ा हो जाएगा, तो सामरिक तौर पर शक्तिशाली दो दुश्मनों से भारत कैसे मुकालबा करेगा? और यूक्रेन युद्ध ने यह तो दिखा ही दिया है, कि कोई किसी का सगा नहीं है और युद्ध की स्थिति में देश सिर्फ अपनी ताकत के दम पर ही मुकालबा कर सकता है।












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