मरने के बाद हजारों जिंदगियां बचा चुकी है वनी

नई दिल्‍ली। वनी कौशिक इस दुनिया में सिर्फ 116 हफ्ते जीवित रहीं. अपने दूसरे जन्मदिन के कुछ ही दिन बाद वानी को ब्लड कैंसर ने छीन लिया. उसकी मां निधि, पिता विशाल और बड़ी बहन विधि के लिए उसका बीमार होना और फिर चले जाना एक ऐसा सदमा था, जिससे वे आज तक नहीं उबर पाए हैं.

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छह साल पुरानी बात याद करते हुए निधि कौशिक कहती हैं, "9 जुलाई से पहले, जिस दिन वानी चली गई, उससे पहले वाली रात को भी हमें अंदाजा नहीं था कि ऐसा कुछ हमारे साथ हो सकता है. वह बीमार थी. हम भाग दौड़ कर रहे थे. अस्पताल जाना और उसे संभालना हमारी जिंदगी का हिस्सा बन चुका था लेकिन ऐसा हो जाएगा, यह हमने सोचा भी नहीं था."

निधि और विशाल कौशिक ऑस्ट्रेलिया के सिडनी में रहते हैं. और अपनी नहीं रही बेटी की याद को एक मुहिम के रूप में जिंदा रखे हुए हैं. वह उनकी बड़ी बेटी विधि मिलकर रक्तदान के लिए लोगों को जागरूक करने का काम कर रहे हैं. वनी के नाम से रेड25 नाम से एक रक्तदान अभियान चलाते हैं और हर साल वनी की पुण्यतिथि 9 जुलाई पर लोगों को रक्तदान के लिए जागरूक करते हैं.

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विशाल बताते हैं, "हमारा यह अभियान हर साल 9 जुलाई को शुरू होता है. वनी 116 हफ्ते जीवित रही, इसलिए हम कोशिश करते हैं कि हर साल 116 लोगों को रक्तदान के लिए प्रेरित करें. हर साल हमें अपने लक्ष्य से ज्यादा लोगों का सहयोग मिलता है. पिछले साल 152 लोगों ने वनी की याद में रक्तदान किया."

क्या हुआ था वनी को?

16 अप्रैल 2013 को वनी का जन्म हुआ था. वह सिर्फ तीन महीने की थी जब डॉक्टरों ने बताया कि उसे ब्लड कैंसर है. निधि कौशिक बताती हैं, "हमें तो बुरी तरह टूट गए थे. हमें लगता था कि ऐसा सब तो सिर्फ फिल्मों में होता है." वहां से विशाल, निधि और विधि का एक कठिन सफर शुरू हुआ, जो बच्चों के अस्पताल, घर और कीमोथेरेपी के बीच गुजरा.

उस सफर से गुजरना ही इतना दुखदायी था कि तीनों के लिए जिंदगी के मायने ही बदल गए थे. निधि याद करती हैं, "उस दौरान हमने एक अलग ही दुनिया देखी. एक महीने के बच्चे से लेकर 10-12 साल तक के बच्चे इस बीमारी से जूझ रहे थे. वहां रहते हुए हमें अहसास हुआ कि यह बीमारी कितनी खतरनाक है. हर हफ्ते छह नए बच्चे कैंसर वॉर्ड में भर्ती हो रहे थे."

2015 की एक तस्वीर में विशाल और निधि कौशिक अपनी बेटियों वनी और विधि के साथथ

वनी के लिए यह सफर खत्म हो जाने से पहले भी पहाड़ सा रहा. हर रोज उसका रक्त बदलना पड़ता था. निधि बताती हैं कि सबसे मुश्किल दिन वो होता था जब सही समय पर और सही ग्रूप का ब्लड नहीं मिल पाता था. वह कहती हैं, "जिस दिन उसका खून नहीं बदला जाता था, उस दिन वो एकदम बेजान रहती थी. उस वक्त लगता था कि दुनिया के किसी कोने से भी, कहीं से भी अपने बच्चे के लिए खून ले आएं ताकि आपका बच्चा एक दिन और जी सके."

नौ महीने बाद

नौ महीने के इलाज के बाद डॉक्टरों ने एक दिन कौशिक परिवार को बताया कि उनकी बच्ची ठीक हो चुकी है, कैंसर चला गया है. वह दिन और उसके बाद 2014 का साल इस परिवार के लिए सबसे अच्छा साल था. विशाल बताते हैं कि हमें लगा एक बुरा सपना था जो बीत गया. पर ऐसा बहुत दिन तक नहीं रहा.

वनी के दूसरे जन्मदिन के सिर्फ दो हफ्ते बाद पता चला कि कैंसर लौट आया था. और उसके सिर्फ तीन महीने के भीतर वनी ने इस दुनिया को विदा कह दिया क्योंकि 9 जुलाई 2015 को उसके दिल ने काम करना बंद कर दिया था. निधि कहती हैं कि आज भी लगता है, वह सच नहीं था. रूंधे हुए गले से वह बताती हैं, "मुझे लगता है जब मैं सोकर उठूंगी तो वनी अपने बिस्तर में होगी. मुझे लगता ही नहीं कि जो हुआ, वह सच था. सपना सा लगता है बस."

और फिर एक मुहिम

विशाल कौशिक कहते हैं कि वनी के इलाज के दौरान उन्होंने बच्चों को खून की कमी से जूझते देखा. वह कहते हैं कि जैसे वनी गई, वैसे दुनिया का कोई बच्चा ना जाए. वह बताते हैं, "कोई बच्चा खून की कमी से जी ना पाए, यह सोचना भी मुश्किल है. हमने उस दौरान देखा कि कैसे एक-एक यूनिट खून कीमती होता है. आप कितने भी अमीर हों, आपके पास कितने भी संसाधन हों, खून की एक यूनिट के लिए तरसते हैं, क्योंकि आप उसे खरीद नहीं सकते, पैदा नहीं कर सकते. उसके लिए आप बस किसी रक्तदाता पर निर्भर हैं."

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और तब इन दोनों ने फैसला किया कि वे लोगों को रक्तदान के लिए प्रेरित करेंगे. इसके साथ रेड25 मुहिम की शुरुआत हुई, जिसके तहत सैकड़ों लोग रक्तदान कर चुके हैं. निधि बताती हैं कि उनकी बेटी विधि अपने बर्थडे तक पर गिफ्ट के रूप में लोगों से ब्लड डोनेट करने का आग्रह करती है.

वह कहती हैं, "कई बार लोग कहते हैं भूलने की कोशिश करो, मूव ऑन करो, ऐसा नहीं होता. कोई माता-पिता अपने बच्चे को नहीं भूल सकता. हम वनी को नहीं भूल सकते. कोई तसल्ली उसे वापस नहीं ला सकती. हां, वनी हजारों जानें बचा चुकी है, इससे कुछ सुकून जरूर मिलता है."

रक्तदान की जरूरत

ल्युकेमिया के मरीजों को लगातार रक्त की जरूरत पड़ती है. ऑस्ट्रेलिया की ल्युकेमिया फाउंडेशन के मुताबिक औसतन एक मरीज की जरूरत होती है कि एक महीने में 36 यूनिट खून की जरूरत होती है, यानी जरूरी है कि हर महीने कम से कम 18 लोग रक्तदान करें.

रेडक्रॉस के मुताबिक एक आदमी का दान किया हुआ खून तीन जानें बचा सकता है क्योंकि इसका इस्तेमाल प्लैटलेट्स, रेड ब्लड सेल्स और पूर्ण खून के रूप में हो सकता है. सिर्फ ऑस्ट्रेलिया को हर हफ्त 31 हजार रक्तदाताओं की जरूरत होती है.

अमेरिका में रोजाना 36 हजार यूनिट रक्त की जरूरत होती है जबकि फ्रेंड्सटुसपोर्ट नामक संस्था के मुताबिक भारत में हर साल पांच करोड़ यूनिट रक्त की जरूरत होती है. और भारत में सालाना दस लाख से ज्यादा लोगों को कैंसर होता है, जिनमें से बहुतों कों रक्त की जरूरत होती है.

Source: DW

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