बांग्लादेश पर अमेरिकी पाबंदी कहीं चीन को डराने की कोशिश तो नहीं?
बात वर्ष 2010 की है जब बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के क़द्दावर नेता चौधरी असलम अचानक ग़ायब हो गए थे.
अचानक ग़ायब होने का आरोप बांग्लादेश के सबसे चर्चित अर्ध सैनिक बल 'रैपिड एक्शन बटालियन' यानी 'राब' पर लगा. चौधरी बहुत मुखर नेता रहे थे लेकिन आज तक उनका कोई सुराग नहीं मिल पाया. दूसरा बड़ा मामला अवामी लीग के बड़े आलोचक कहलाने वाले इलियास अली का है जो अपनी कार के ड्राइवर सहित वर्ष 2012 में लापता हो गए थे. इस घटना का आरोप भी 'राब' पर ही लगा.
अमेरिका ने 'राब' पर फ़र्ज़ी मुठभेड़ों में राजनीतिक नेताओं की हत्या का आरोप लगाया और कहा कि वर्ष 2009 से ही सैकड़ों महत्वपूर्ण व्यक्तियों की रहस्यमय गुमशुदगी के पीछे इसी अर्धसैनिक बल का हाथ है.
लेकिन बीते शुक्रवार को अमेरिका ने इस अर्ध सैनिक बल पर तो प्रतिबन्ध लगाया ही, साथ ही बांग्लादेश पुलिस के सात वरिष्ठ अधिकारियों पर भी अमेरिका प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया. ये सबकुछ अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस के दिन हुआ.
सामरिक मामलों के जानकार जिस बात से हैरान हैं वो है कि बांग्लादेश की सेना के प्रमुख ने कुछ ही महीनों पहले अमेरिका का दौरा किया था और दोनों देशों की सेनाओं ने आपसी सहयोग बढ़ाने पर क़रार भी किया था. वहीं, फ़रवरी में अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट के प्रतिनिधि ने बांग्लादेश का दौरा भी किया था.
पिछले हफ़्ते ही अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने एक 'वर्चुअल डेमोक्रेसी समिट' आयोजित किया था जिसमें भारत सहित कुल 110 देशों के राष्ट्राध्यक्ष शामिल हुए थे. लेकिन इस आयोजन से बांग्लादेश को दूर रखने ने भी दक्षिण एशिया पर नज़र रखने वाले विशेषज्ञों को अचम्भे में डाल दिया था. वो भी इसलिए क्योंकि अमेरिका ने इस आयोजन में शामिल होने के लिए पाकिस्तान को न्योता दिया था, लेकिन पाकिस्तान ने ख़ुद को इससे अलग रखा. अमेरिका ने चीन और बांग्लादेश को पहले ही न्योता नहीं दिया था.
बांग्लादेश ने अमेरिकी राजदूत को तलब किया और इन घटनाओं पर अपनी नाराज़गी भी जताई. बांग्लादेश के विदेश मंत्री अबुल कलाम मोमेन ने एक बयान जारी कर तंज़ करते हुए कहा कि 'अमेरिका ने इस आयोजन में सिर्फ़ कमज़ोर लोकतांत्रिक देशों को ही बुलाया है.' जबकि वहां के गृह मंत्रालय का आरोप है कि 'अमेरिका ने सनसनीख़ेज़ और बढ़ा-चढ़ा कर लिखी गई मीडिया रिपोर्टों के आधार पर ही 'राब' पर पाबंदी लगा दी.'
दोनों देशों के बीच क्या हुआ
जानकार कहते हैं कि अमेरिका हमेशा से ही बांग्लादेश के साथ बेहतर रिश्ते रखना चाहता रहा है ताकि वो दक्षिण एशिया में चीन के मंसूबों को रोक सके. तो किन कारणों से दोनों देशों के रिश्तों में अचानक ऐसा मोड़ आ गया? इसकी व्याख्या अलग-अलग तरीक़े से हो रही है. कुछ विशेषज्ञ कहते हैं कि इसका कारण है बांग्लादेश की चीन से बढ़ती नज़दीकियां लेकिन कुछ का ये मानना है कि अगर अमेरिका ऐसा कर रहा है तो बांग्लादेश को वो चीन के और नज़दीक कर देगा.
विशषज्ञों को हैरानी इस बात पर भी है कि बांग्लादेश अमेरिका को बड़े पैमाने पर 'रेडीमेड गारमेंट' निर्यात करता है और ये भी कि बांग्लादेश की पुलिस और सेना अधिकारियों को वो प्रशिक्षण भी देता रहा है. अमेरिकी विदेश मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के बाद सबसे ज़्यादा अमेरिकी सहायता बांग्लादेश को ही दी जाती रही है.
'राब' पर पाबंदी की घोषणा करते हुए अमेरिकी विदेश मंत्री एंथनी ब्लिंकन ने स्पष्ट किया कि मानवाधिकार उनकी विदेश नीति का अहम हिस्सा बने रहेंगे. उन्होंने ये भी कहा उनका देश समय-समय पर मानवाधिकारों के दुरुपयोग को रोकने के लिए क़दम उठाता रहेगा चाहे वो दुनिया के किसी भी कोने में हो रहा हो.
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अमेरिका के इरादे
विदेश मामलों के जानकार और वरिष्ठ पत्रकार मनोज जोशी का मानना है कि बांग्लादेश पर पाबंदी एक तरह से 'एक इशारा' है जो अमेरिका उन देशों को देना चाहता है जिन पर मानवाधिकार हनन या फिर लोकतांत्रिक मूल्यों के हनन के आरोप लगते रहे हैं.
बीबीसी से बात करते हुए जोशी कहते हैं, "चीन में एक कहावत है कि बंदर को मारकर भी शेर को डराया जा सकता है. अमेरिका कुछ ऐसा ही करने की कोशिश कर रहा है. वो संकेत किसी को देना चाहता है मगर कान किसी और के मरोड़ रहा है."
जोशी के अनुसार बांग्लादेश में अमेरिका की उतनी सामरिक दिलचस्पी नहीं रही है या फिर उसके उतने ज़्यादा सामरिक संकल्प नहीं हैं. इसलिए बांग्लादेश पर उसने आसानी से ये निशाना साधा है. उनका कहना है कि पाबंदी का मतलब ये नहीं है कि बांग्लादेश को मिल रही अमेरिकी सहायता में किसी भी तरह की कटौती की जाएगी.
"बस एक संदेश है जो अमेरिका खुलकर उन देशों को नहीं दे सकता जहाँ लोकतांत्रिक मूल्यों और मानवाधिकारों के हनन के आरोप लग रहे हैं क्योंकि वहां अमेरिका के बड़े सामरिक हित मौजूद हैं."
सामरिक मामलों के जानकार और लंदन स्थित किंग्स कॉलेज के प्रोफेसर हर्ष वी पंत इसे अमेरिका का 'डिप्लोमेटिक ब्लंडर' यानी कूटनीतिक भूल मानते हैं. उनका कहना है कि अगर अर्ध सैनिक बल 'राब' पर ही पाबंदी लगानी थी तो वो 'पीछे के दरवाज़े से' भी बातचीत के ज़रिये किया जा सकता था.
वो कहते हैं, "पाकिस्तान को डेमोक्रेसी समिट में बुलाना और बांग्लादेश को नहीं बुलाना इस बात की तरफ़ इशारा है कि अमेरिका अपनी विदेश नीति को लेकर बुनियादी असमंजस में है. अमेरिका का ये क़दम बांग्लादेश की राष्ट्रवादी शक्तियों को और मज़बूत करेगा और वो अपनी सरकार पर चीन की तरफ़ जाने का दबाव बढ़ा देंगे. चीन भी बांग्लादेश में काफ़ी पैसा ख़र्च कर रहा है और वहां पर कई परियोजनाएं भी संचालित कर रहा है. अमेरिका के इस फ़ैसले में परिपक्वता नहीं है."
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क्या है 'राब'
इस अर्ध सैनिक बल की स्थापना वर्ष 2004 में प्रधानमंत्री ख़ालिदा ज़िया के नेतृत्व वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के शासनकाल के दौरान हुई थी. दो दशक होने को आ रहे हैं और एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इस बल पर 1200 से ज़्यादा फ़र्ज़ी मुठभेड़ करने के आरोप लगाए हैं. ये भी आरोप हैं कि लगभग 500 लोगों की गुमशुदगी की कोई जानकारी नहीं है.
मानवाधिकार संगठन 'ह्यूमन राइट्स वॉच' ने 'राब' को लेकर समय-समय पर अलग-अलग रिपोर्ट्स जारी की हैं जिनमें 'राब' पर मानवाधिकारों के हनन के गंभीर आरोप लगाए गए हैं.
बांग्लादेश में मानवाधिकार के लिए काम करने वाले कार्यकर्ता नूर खान के अनुसार इन सभी मामलों से सम्बंधित दस्तावेज़ मौजूद हैं. एक बयान में उन्होंने कहा कि वो बांग्लादेश सरकार से मांग करते आ रहे हैं कि इन सभी आरोपों की जांच के लिए एक स्वतंत्र आयोग का गठन किया जाए. इसलिए वो कहते हैं कि अमेरिका ने जो किया उस पर कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए.
बांग्लादेश में मानवाधिकारों के लिए काम करने वाले संगठन 'ओधिकार' ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि वर्ष 2004 से लेकर 2020 तक 1200 के आसपास फ़र्ज़ी मुठभेड़ दर्ज की गई हैं. वर्ष 2017 में हुए ऐसे ही एक मामले में ढाका की एक अदालत ने 'राब' के तीन अधिकारियों को 'मौत की सज़ा' सुनाई थी.
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