अमेरिका में ध्रुवीकरण के हालात दुनिया के लिए क्यों है खतरनाक संकेत?
US Presidential Election 2024: अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर ऐसे समय में हमला हुआ है, जब रिपब्लिकन पार्टी की ओर से उनका राष्ट्रपति चुनाव में उम्मीदवार बनना लगभग तय है। उनकी पार्टी अमेरिकी जनता के सामने यह भी सूरत पेश कर रही है कि ट्रंप को रोकने के लिए डेमोक्रेटिक पार्टी सारे हथकंडे अपना रही है।
अमेरिकी समाज पहले से ही रिपब्लिकन और डेमोक्रेट्स के बीच बुरी तरह से ध्रुवीकरण का शिकार है। ट्रंप पर हमले के बाद यह ध्रुवीकरण और भी ज्यादा होने की आशंका पैदा हुई है।

ट्रंप पर हमले के बाद डेमोक्रेट्स के नरम रुख से पिघलेंगे रिपब्लिकन?
जख्मी हालत में भी डोनाल्ड ट्रंप ने जिस अंदाज में खुद को संभालते हुए समर्थकों को मुट्ठी तानकर डटे रहने का संदेश दिया है, वह तस्वीर अमेरिकी राजनीति के लिए ऐतिहासिक बन चुकी है। उनपर हुए कातिलाना हमले की निंदा करने में डेमोक्रेट भी पीछे नहीं हैं। लेकिन, अमेरिकी समाज में ट्रंप के समर्थकों को उससे किस हद तक पिघलाया जा सकता है, यह कहना अभी बहुत ही मुश्किल है।
घायल ट्रंप की तस्वीर से बाइडेन की छवि को और भी ज्यादा नुकसान
इस बात में कोई दो राय नहीं की घायल ट्रंप की तस्वीरों ने मौजूदा राष्ट्रपति जो बाइडेन की छवि को और भी ज्यादा नुकसान पहुंचाई है। वह अपनी उम्र और स्वास्थ्य को लेकर पहले से ही अनिश्चितताओं की दौर से गुजर रहे हैं, ऐसे में यह हमला उनकी भविष्य की संभावनाओं को और फीका कर रहा है।
अमेरिकी समाज में तनाव बढ़ने की पैदा हुई आशंका
बाइडेन ने ट्रंप पर हुए हमले की निंदा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। लेकिन, अभी यह कहना बहुत ही मुश्किल है कि इससे दो ध्रुवों में बंटी अमेरिकी राजनीति पर कोई असर पड़ने वाला है। आशंका तो ऐसी है कि इस हमले से अमेरिकी समाज का सियासी तनाव और भी गंभीर शक्ल अख्तियार कर सकता है।
ट्रंप को सहानुभूति मिलने की संभावना
ट्रंप पर हमले की वजह अभी तक स्पष्ट नहीं है। लेकिन, यह ऐसे समय में हुआ है, जब ट्रंप खुद को जनता के सामने डेमोक्रेट्स के पीड़ित के तौर पर पेश कर रहे हैं। वह यह बताने की कोशिशों में लगे रहे हैं कि उन्हें नवंबर में होने वाले चुनाव जीतने से रोकने के लिए सभी तरह की कोशिशें चल रही हैं।
उन्होंने कई बार डेमोक्रेट्स पर खुद को फर्जी मुकदमों में फंसाने की कोशिशों के भी आरोप लगाए हैं, ताकि उन्हें अगली बार व्हाइट हाऊस में घुसने से रोका जाए। पेंसिल्वेनिया की सभा में लोगों ने उन्हें जिस हालत में देखा उसके बाद उन्हें सहानुभूति वोट मिलने की पूरी संभावना है।
रिपब्लिकन के हौसले बुलंद
उनके समर्थक तो उनके साथ खड़े होंगे ही, कुछ अनिश्चित वोटर भी उनके समर्थन में उतर सकते हैं। यही नहीं, रिपब्लिकन में जो लोग उनकी उम्मीदवारी को लेकर दुविधा में होंगे, उनका इरादा अब उनके पक्ष में पक्का हो सकता है। अमेरिकी मीडिया का फोकस तो हमले के बाद से ही बाइडेन से हटकर उनकी ओर घूम चुका है। बदले हालातों में रिपब्लिकन के हौसले बुलंद हैं।
अमेरिकी राजनीति में अस्थिरता दुनिया के लिए नहीं होगी अच्छी खबर
इसमें कोई दो राय नहीं कि अमेरिका में चल रही गतिविधियों पर भारत के नीति निर्माताओं की नजरें अटकी पड़ी होंगी। हालांकि, बीते कई वर्षों से भारत ने अमेरिका के दोनों ही तरफ के राजनेताओं के साथ अच्छे संबंध विकसित करने में कामयाबी हासिल की है। लेकिन, वहां अगर तनावपूर्ण हालात में किसी तरह की राजनीतिक अस्थिरता की स्थिति पैदा होती है तो यह पूरी दुनिया के लिए अच्छी खबर नहीं होगी।
क्योंकि, भले ही भारत कोविड के बाद भी खुद को संभालने में काफी हद तक सफल रहा है। लेकिन, अमेरिका के अंदरूनी हालात तनावपूर्ण होते हैं तो भारत उसके प्रभाव में नहीं आएगा, यह दावा करना मुश्किल है। ऊपर से रूस और यूक्रेन और मध्य पूर्व पहले से ही भीषण संघर्षों में उलझे हैं। दूसरी तरफ चीन है जो कभी अपनी पैतरेबाजी को विराम देने के लिए तैयार नहीं रहता।












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