US Election 2020: जानिए कितने अलग हैं अमेरिका और भारत के चुनाव, कहां जनता कैसे चुनती है अपना शासक

वॉशिंगटन। तीन नवंबर को अमेरिका में एक नए राष्‍ट्रपति के लिए वोट डाले जाएंगे। चुना हुआ प्रतिनिधि अगले 4 सालों तक व्‍हाइट हाउस पर शासन करेगा। हर चार साल के बाद नवंबर के पहले मंगलवार को अमेरिका में नए शासक को चुना जाता है। नवंबर के पहले सोमवार के बाद आने वाले पहले मंगलवार को अमेरिका में वोट डाले जाते हैं। इस बार टक्‍कर रिपब्लिकन पार्टी के उम्‍मीदवार राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप और डेमोक्रेट जो बाइडेन के बीच मुकाबला है। राष्‍ट्रपति की रेस कौन जीतेगा, फिलहाल कोई नहीं जानता है, लेकिन इस बात की संभावनाएं बहुत प्रबल हैं कि भारत को आने वाले 4 सालों में भी फायदा मिलता रहेगा।

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अमेरिका में राष्‍ट्रपति शासन प्रणाली

अमेरिका और भारत का लोकतंत्र भले एक जैसा लगता हो लेकिन दोनों ही देशों के चुनावों में जमीन आसमान का अंतर है। इन चुनावों से पहले आज जानिए कि दुनिया के दो बड़े लोकतंत्रों में होने वाले चुनाव अलग कैसे हैं। अमेरिका में जहां राष्‍ट्रपति शासन है तो भारत में संसदीय स्वरूप के तहत सत्‍ता चलती है। राष्‍ट्रपति शासन प्रणाली के तहत केंद्रीय सिद्धांत के तहत विधायिका, एग्जिक्‍यूटिव यानी कार्यकारी और न्याय व्‍यवस्‍था आती है। इसके बाद राष्‍ट्रपति का चुनाव अलग से होता है। अमेरिकी राष्‍ट्रपति एक तय कार्यकाल के लिए चुना जाता है। अमेरिकी राष्‍ट्रपति को सिर्फ महाभियोग के जरिए ही हटाया जा सकता है। राष्‍ट्रपति, सरकार और देश दोनों का ही मुखिया होता है।

भारत में संसदीय प्रणाली

अगर भारत की बात करें तो भारत में संसदीय प्रणाली के तहत सरकार का चयन होता है। भारत की संसदीय व्‍यवस्‍था दो सदनों से मिलकर बनी है जिसका मुखिया राष्‍ट्रपति होता है। संसद के दो सदन लोकसभा जिसे जनता का सदन कहते हैं और राज्‍यसभा जहां पर विधान परिषद से चुने हुए प्रतिनिधि भेजे जाते हैं। राष्‍ट्रपति के पास पूरा अधिकार होता है कि वह संसद के किसी भी सदन को समन कर सकते हैं या लोकसभा को भंग कर सकते हैं। भारत की संसदीय प्रणाली सीधे तौर पर नागरिकों को मंजूरी नहीं देता कि वह राष्‍ट्रपति या सरकार के मुखिया का चयन कर सके। जबकि राज्‍यों का मुखिया भारत सरकार के मुखिया से अलग होता है।

अमेरिका में दो पार्टियों का सिस्‍टम

अमेरिका में दो पार्टियों का सिस्‍टम है जिसमें रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक पार्टियों के पास सत्‍ता की चाभी होती है। दोनों पार्टियों का गठन एक खास विचारधारा के तहत हुआ। अमेरिका में हालांकि लिबर्टीयन पार्टी, ग्रीन पार्टी और कुछ और छोटी पार्टियां भी हैं लेकिन ये दो पार्टियां ही सबसे अहम है। वहीं भारत में कई पार्टियां और क्षेत्रीय दल हैं। देश में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और कांग्रेस दो अहम पार्टियां हें। लेकिन कई और क्षेत्रीय दल भी हैं और इनकी विचारधाराएं भी अलग हैं।

इलेक्‍टोरल पर तय होती है जीत

अमेरिकी सरकार की वेबसाइट के मुताबिक इलेक्‍टोरल कॉलेज वोट्स यानी निर्वाचक मंडल के तहत पर चुनाव होते हैं। इसमें अमेरिकी कांग्रेस के कुछ निश्चित सदस्‍य होते हैं। दोनों उम्‍मीदवारों के लिए इलेक्‍टोरल कॉलेज वोट्स को जीतना बहुत जरूरी है। हर राज्‍य में कुछ निश्चित इलेक्‍टोरल कॉलेज वोट्स यानी निर्वाचक मंडल होते हैं। ये वोट्स हर राज्‍य की आबादी पर निर्भर करते हैं। कुल 538 इलेक्‍टोरल वोट्स हैं यानी हर उम्‍मीदवार को जीतने के लिए 270 या इससे ज्‍यादा इलेक्‍टोरल वोट्स की जरूरत होती है। इसका मतलब यह हुआ कि राज्‍स स्‍तर के वोटर्स ही कौन जीतेगा इस बात का फैसला कर देते हैं।

जनता चुनती है सांसद

जबकि भारत में लोकसभा चुनाव में सांसदों का चयन जनता की तरफ से होता है। तय उम्‍मीदवार अपने तय संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ते हैं। जो पार्टी बहुमत में आती है उसके चुने हुए सांसद या फिर गठबंधन अपनी सरकार का मुखिया चुनता है और वह देश का प्रधानमंत्री बनता है। अमेरिका में जहां आज भी बैलेट पेपर का प्रयोग होता है तो भारत में अब संसदीय चुनावों के लिए इलेक्‍ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी ईवीएम का प्रयोग होने लगा है।

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