सऊदी अरब के घुटनों पर आया अमेरिका! प्रिंस सलमान से मिलने रियाद जाएंगे बाइडेन, लगाएंगे गुहार!
एसोसिएट प्रेस के मुताबिक, राष्ट्रपति के रूप में जो बाइडेन की सऊदी साम्राज्य की पहली यात्रा इस महीने के अंत में होने की संभावना है, लेकिन अभी तक इस यात्रा को अंतिम रूप नहीं दिया गया है।
वॉशिंगटन, जून 03: अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन, जिन्होंने पिछले साल सऊदी अरब क्राउन प्रिंस से फोन पर बात करने से इनकार कर दिया था, वो इस साल प्रिंस सलमान से मनुहार करने खुद सऊदी अरब का दौरा करेंगे। जो बाइडेन उस वक्त सऊदी अरब का दौरा करेंगे, जब खुद अमेरिकी विदेश विभाग ने कहा, कि सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन का फोन नहीं उठाया।

सऊदी अरब जाएंगे जो बाइडेन
अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने आने वाले हफ्तों में सऊदी अरब की यात्रा करने का फैसला किया है और उम्मीद की जा रही है कि वह सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस से मिलेंगे, जिसे उन्होंने पिछले साल मशहूर पत्रकार जमाल खशोगी की हत्या करने का आरोपी बताया था। राष्ट्रपति जो बाइडेन की यात्रा के पीछे का मकसद सऊदी अरब क्राउन प्रिंस को दुनियाभर में आसमान छूती पेट्रोल की डीजल की कीमत को नियंत्रित करने के लिए कच्चे तेल का प्रोडक्शन बढ़ाने के लिए मनाना है। हालांकि, तेल उत्पादक संगठन ने गुरुवार को घोषणा की है, कि उसने तेल का प्रोडक्शन बढ़ाने का फैसला किया है, लेकिन ये वृद्धि मामूली ही होगी।

महीने के अंत में होगी यात्रा
राष्ट्रपति के रूप में जो बाइडेन की सऊदी साम्राज्य की पहली यात्रा इस महीने के अंत में होने की संभावना है, लेकिन अभी तक इस यात्रा को अंतिम रूप नहीं दिया गया है, योजना से परिचित एक व्यक्ति ने एसोसिएटेड प्रेस को इसकी जानकारी दी। व्हाइट हाउस ने गुरुवार को तेल प्रोडक्शन बढ़ाने के फैसले को लेकर सऊदी अरब की भूमिका की प्रशंसा की और राष्ट्रपति बाइडेन ने खुद यमन के साथ अपने आठ साल पुराने युद्ध में संघर्ष विराम विस्तार के लिए सहमत होने के लिए सउदी की सराहना की, जिसकी घोषणा भी गुरुवार को ही की गई थी।

अमेरिका और सऊदी में बढ़ती दूरियां
एक वक्त सऊदी अरब, अमेरिका के प्रमुख सहयोगियों में एक हुआ करता था, लेकिन पिछले महीने द वॉल स्ट्रीट जर्नल के पूर्व प्रकाशक, करेन इलियट हाउस के अनुसार, अप्रैल महीने में सीआईए के डायरेक्टर लिलियन बर्न्स प्रिंस मोहम्मद के साथ "संभोग नृत्य" के लिए सऊदी अरब गए थे, अर्थात्, प्रिंस सलमान से ये अनुरोध करने सऊदी अरब गये थे, कि तेल 'उत्पादन बढ़ाने के लिए एक नई तेल-सुरक्षा-सुरक्षा रणनीति पर सहयोग करना चाहिए और यूरोपीय देशों को ऊर्जा की कमी से बचाएं।" लेकिन, प्रिंस सलमान ने सीआईए डायरेक्टर की बातों को मानने से इनकार कर दिया था। यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद सऊदी अरब से कई बार तेल प्रोडक्शन बढ़ाने की अपील अमेरिका कर चुका है, लेकिन अब जाकर सऊदी अरब ने तेल प्रोडक्शन में मामूली इजाफा करने का फैसला किया है।

मध्य-पूर्वी देशों से यूएस की दूरी
खाड़ी देशों से अमेरिका के ठंडे पड़ रहे संबंध की वजह ईरान के साथ न्यूक्लियर समझौते की तरफ अमेरिका का फिर से लौटना और यमन में चल रहे गृहयुद्ध में सऊदी अरब को मिल रहे अमेरिकी सहयोग में कमी मुख्य वजहे हैं। वहीं, हूती विद्रोहियों ने पिछले दिनों यूएई में मिसाइल हमले भी किए हैं। जबकि, जमाल खशोही मर्डर को लेकर अमेरिका ने सीधे तौर पर सऊदी क्राउन प्रिंस को जिम्मेदार ठहराया है और उस सीक्रेट रिपोर्ट को पब्लिश कर दिया है, जिसे सार्वजनिक करने से पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इनकार कर दिया था। वहीं, जो बाइडेन ने चुनाव प्रचार के दौरान यहां तक कहा था, कि ''सऊदी अरब में वर्तमान सरकार में बहुत कम सामाजिक मुक्ति मूल्य है।"

क्या है प्रिंस सलमान का एजेंडा?
वहीं, जानकारों के मुताबिक, प्रिंस सलमान का एक अलग एजेंडा है, क्योंकि संभावना यही है, कि प्रिंस सलमान अभी कई दशकों तक सऊदी अरब पर शासन करेंगे। लिहाजा, सऊदी अरब क्राउन प्रिंस अपने लिए एक "पावर बेस" बनाने की कोशिश कर रहे हैं और इसीलिए उन्होंने सऊदी अरब 2030 प्रोग्राम भी लांच किया था, जिसमें सऊदी अरब के छात्रों को अलग अलग देशों की संस्कृति सिखाने के साथ साथ उन्हें मजहबी कट्टरता से दूर रखने की कोशिश की जा रही है और सऊदी अरब बहुत जल्द स्पेस प्रोग्राम भी लांच करने वाला है, ताकि आने वाले वक्त में वो स्पेस टेक्नोलॉजी में पीछे ना रहे। और प्रिंस सलमान की वजह से ही सऊदी अरब के 70 साल के उम्र के लोग और 35 साल की उम्र के लोगों की जीवनशैली में बहुत बड़ा बदलाव आ गया है और प्रिंस सलमान बहुत हद तक देश के युवाओं को यह समझाने में कामयाब रहे हैं, कि देश का भविष्य टेक्नोलॉजी के विकास में है।

चीन के साथ सऊदी की बढ़ती दोस्ती
इसके साथ ही, बाइडेन प्रशासन के लिए सबसे बड़ा झटका चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का सऊदी अरब का दौरा होने वाला है, और बाइडेन प्रशासन के लिए शी जिनपिंग का सऊदी दौरा सबसे ज्यादा परेशान करने वाला है। चीन की मीडिया भी इसकी पुष्टि कर चुका है, कि चीन में कोविड काबू में आने के बाद चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग सऊदी अरब की यात्रा करने की योजना बना रहे हैं, वहीं, अंदरखाने रियाद और बीजिंग के बीच कुछ खास बात भी चल रही है, जिसका ऐलान शी जिनपिंग के रियाद पहुंचने के बाद किया जाएगा। इसके साथ ही, चीन और रियाद के बीच लोकल करेंसी में तेल व्यापार पर सहमति बनाई जा रही है, यानि चीन अब सऊदी अरब से तेल खरीदने के बाद उसे अपनी मुद्रा युआन में भुगताव करेगा और सऊदी अरब जो सामान चीन से खरीदेगा, उसका भुगतान वो अपनी करेंसी में करेगी। ये व्यवस्था लागू होते ही तेल बाजार एक बड़े बदलाव की तरफ मुड़ जाएगा और मिडिल ईस्ट समेत खाड़ी देशों में चीन के प्रभाव को खाफी ज्यादा मजबूत कर देगा, क्योंकि कई और देश और अंतरराष्ट्रीय निवेशक, अपनी अपनी अपनी मुद्रा में लेनदेन करने के लिए राजी हो सकते हैं, जिसका सीधा असर अमेरिकी डॉलर पर पड़ेगा।

क्या सऊदी के मन में कुछ और है?
चीन की मुद्रा युआन में तेल बेचने को लेकर सऊदी अरब की दलील है कि, चूंकी सऊदी अरब में कई विशालकाय चीनी प्रोजेक्ट्स चल रहे हैं, तो उसके लिए चीनी ठेकेदारों को चीन की ही मुद्रा में भुगतान करने में आसानी होगी, लेकिन वाशिंगटन के लिए इसका मतलब यह है, कि युआन से कारोबार होने पर संवेदनशील या संदिग्ध ट्रांजेक्शन की जानकारी उसे हासिल नहीं हो पाएगी और उसके लिए सऊदी अरब में चीनी प्रोजेक्ट्स पर निकरानी रखना काफी मुश्किल हो जाएगा।

सऊदी को चाहिए परमाणु टेक्नोलॉजी?
दरअसल, लगातार अमेरिकी रिपोर्टें हैं, कि चीन के समर्थन से सऊदी अरब परमाणु टेक्नोलॉजी की खोज को बढ़ाने के लिए अल-उला के पास एक नई यूरेनियम प्रसंस्करण सुविधा का निर्माण कर सकता है। वहीं, कुछ रिपोर्ट्स में ये भी आशंका जताई गई है, कि आखिर सऊदी अरब ने पिछले महीने पाकिस्तान को एक झटके में आठ अरब डॉलर का कर्ज कैसे दे दिया और अचानक पाकिस्तान के प्रति सऊदी अरब उदार कैसे हो गया? वॉशिंगटन भी इसपर निगाह बनाए हुआ है। अमेरिकन एंटरप्राइज इंस्टीट्यूट द्वारा संचालित चाइना ग्लोबल इन्वेस्टमेंट ट्रैकर के अनुसार, सऊदी अरब चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव का एक केंद्रीय स्तंभ है और चीनी निर्माण परियोजनाओं के लिए शीर्ष तीन देशों में शुमार है। यानि, आने वाले वक्त में सऊदी अरब विश्व पॉलिटिक्स के साथ साथ एशिया की राजनीति को भी गंभीर तौर पर प्रभावित करने वाला है और भारत की चिंताएं बढ़ सकती हैं।
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