आर्थिक संकट में फंसे चीन को US ने दिया जोर का धक्का, भारतीय दवाई से ड्रैगन का इलाज कर रहे बाइडेन!
US-China News: अमेरिका और रूस से टेक्नोलॉजी चुरा-चुराकर चीन आज दूसरे नंबर की अर्थव्यवस्था बन चुका है और अमेरिका को अब जाकर समझ में आया है, कि उसकी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल, चीन उसी के खिलाफ कर रहा है। लिहाजा, अमेरिका ने संवेदनशील टेक्नोलॉजी क्षेत्र में अमेरिकी कंपनियों के चीन में निवेश करने पर रोक लगा दिया है।
अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने उस प्रस्ताव पर साइन कर दिए हैं, जिसमें कहा गया है, कि अमेरिका, अपनी सुरक्षा की वजहों से चीन के ऊपर ये प्रतिबंध लगा रहा है। अमेरिका का ये प्रतिबंध उन टेक्नोलॉजी को निशाना बनाकर लगाया गया है, जिससे चीन पर सीधा असर पड़ेगा। अमेरिका ने सेमीकंडक्टर, माइक्रो इलेक्ट्रॉनिक्स, क्वांटम इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी और कुछ आर्टिफिशियल सेक्टर में प्रतिबंध लगाया गया है।

अमेरिका ने चीन पर लगाए प्रतिबंध
न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, बाइडेन ने एग्जीक्यूटिव ऑर्डर्स पर साइन कर दिए हैं, जो सैन्य, खुफिया, निगरानी या साइबर-सक्षम क्षमताओं के लिए महत्वपूर्ण टेक्नोलॉजी और उत्पादों में चीन की "तेजी से प्रगति" को संबोधित करने के लिए एक राष्ट्रीय आपातकाल जैसी स्थिति की घोषणा करता है।
आदेश में कहा गया है, कि इन क्षेत्रों में चीन की प्रगति "संयुक्त राज्य अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक असामान्य और असाधारण खतरा" है और कुछ अमेरिकी निवेश "इस खतरे को बढ़ाने का जोखिम" पैदा करते हैं।
राष्ट्रपति के आदेश के बाद अब अमेरिका की वित्त मंत्री को ये अधिकार मिल गया है, कि वो इन सेक्टर्स में चीन के साथ किसी भी व्यापार को या तो सीमित कर सकते हैं या पूरी तरह से रोक सकते हैं। अमेरिका की वित्त मंत्री इस वक्त जेनेट येलेन है, लिहाजा उन्हें ये अधिकार दिया गया है।
वहीं, चीनी वाणिज्य मंत्रालय ने गुरुवार को कहा, कि वह आदेश को लेकर "गंभीर रूप से चिंतित" है और उसने उपाय करने का अधिकार सुरक्षित रखा है।
चीनी विदेश मंत्रालय ने एक बयान में कहा गया है, कि "यह बाजार अर्थव्यवस्था और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा सिद्धांतों से गंभीर रूप से विचलित है, जिसकी अमेरिका ने हमेशा वकालत की है।"
चीनी बयान में आगे कहा गया है, कि "यह उद्यमों के सामान्य संचालन और निर्णय लेने को प्रभावित करता है और अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक और व्यापार व्यवस्था को कमजोर करता है।"
लेकिन, अमेरिकी राष्ट्रपति ने जिस प्रस्ताव पर दस्तखत किए हैं, उसमें कहा गया है, कि चीन में होने वाले उन निवेशों को रोका जाए, जिनसे अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा को खतका पैदा होता है, लिहाजा बाइडेन ने अमेरिकी संसद को जो चिट्ठी लिखी है, उसमें उन्होंने कहा है, कि वो निवेश को लेकर राष्ट्रीय आपातकाल घोषित कर रहे हैं।
आपको बता दें, कि अमेरिकी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर चीन, चिप टेक्नोलॉजी में आगे बढ़ना चाहता है, लेकिन भारतीय दवाई से अमेरिका, चीन का इलाज कर रहा है, जिसमें सीधे चीन की कंपनियों को निशाया बनाया जाता है। आपको बता दें, कि भारत चीनी कंपनियों पर प्रतिबंधों के जरिए उनपर लगाम लगा रहा है।
प्रतिबंधों से चीन पर क्या होगा असर?
चीनी वाणिज्य मंत्रालय के एक बयान में कहा गया है, उसे उम्मीद है कि अमेरिका बाजार अर्थव्यवस्था के कानूनों और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा के सिद्धांत का सम्मान करेगा, और "कृत्रिम रूप से वैश्विक आर्थिक और व्यापार आदान-प्रदान और सहयोग में बाधा डालने या विश्व अर्थव्यवस्था की वसूली के लिए बाधाएं खड़ी करने" से परहेज करेगा।
जो बाइडेन का ये फैसला कंप्यूटर चिप्स और उनके निर्माण के लिए उपकरण डिजाइन करने के लिए सॉफ्टवेयर विकसित करने वाली चीनी कंपनियों में निवेश पर केंद्रित है। उन क्षेत्रों में अमेरिका, जापान और नीदरलैंड का दबदबा है, और चीनी सरकार घरेलू विकल्प बनाने के लिए काम कर रही है।
व्हाइट हाउस ने कहा है, कि बाइडेन ने योजना पर सहयोगियों से परामर्श किया और जी-7 देशों के समूह से फीडबैक लिया है।
अमेरिकी सीनेट के डेमोक्रेटिक नेता चक शूमर ने कहा, कि "बहुत लंबे वक्त से अमेरिकी पैसों से चीन की सेना अपना विस्तार कर रही है और आज संयुक्त राज्य अमेरिका, यह सुनिश्चित करने के लिए पहला रणनीतिक कदम उठा रहा है, कि अमेरिकी निवेश चीनी सेना के आधुनिकिकरण में फायदा नहीं पहुंचाए।"
वहीं, अमेरिकी वित्त मंत्रासय ने कहा, कि नियम केवल भविष्य के निवेशों को प्रभावित करेंगे, मौजूदा निवेशों को नहीं, लेकिन इस नियम के तहत, पहले किए गये लेनदेन का खुलासा करने के लिए कह सकता है।
अमेरिका के इस कदम से दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच तनाव और बढ़ सकता है।
वहीं, वाशिंगटन में चीनी दूतावास ने कहा है, कि वह इस कदम से "बहुत निराश" है।
अमेरिकी अधिकारियों ने जोर देकर कहा है, कि प्रतिबंधों का उद्देश्य "सबसे गंभीर" राष्ट्रीय सुरक्षा जोखिमों को संबोधित करना है, न कि दोनों देशों की अत्यधिक अन्योन्याश्रित अर्थव्यवस्थाओं को अलग करना है।
हालांकि, रिपब्लिकन नेताओं ने इस बिल को कई खामियों से भरा बताया है और कहा है, कि ये बिल सिर्फ भविष्य में होने वाले निवेशों पर लागू होता है और ये बिल उतना आक्रामक भी नहीं है।
अमेरिका का आक्रामक रवैया
राष्ट्रपति बाइडेन का यह आदेश, कई सौदों पर रोक लगाएगा और इस बिल के तहत, अब अमेरिकी कंपनियों को चीन में निवेश करने से पहले अमेरिकी सरकार को सूचना देनी होगी, कि वो कहां निवेश कर रहे हैं।
अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने कहा, कि वह "कुछ लेनदेन को छूट देने की उम्मीद कर रहा है, जिसमें संभावित रूप से सार्वजनिक रूप से कारोबार किए जाने वाले उपकरण और अमेरिकी पैरेंट कंपनी से सहायक कंपनियों को इंट्राकंपनी ट्रांसफर शामिल हैं।"
चीनी टेक्नोलॉजी इंडस्ट्री, जो कभी अमेरिकी वेंचर कैपिटल इन्वेस्टमेंट के लिए मुख्य आकर्षण का केंद्र था, वो पहले से ही बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच अमेरिकी निवेश में भारी गिरावट देख चुका है।
पिचबुक डेटा के मुताबिक, पिछले साल चीन में कुल यूएस-आधारित वेंचर कैपिटल इन्वेस्टमेंट 2021 में 32.9 अरब डॉलर से घटकर 9.7 बिलियन डॉलर हो गया। इस साल अब तक, अमेरिकी निवेशकों ने सिर्फ चीनी टेक्नोलॉजी स्टार्टअप में 1.2 अरब डॉलर का ही निवेश किया है।
आपको बता दें, कि अमेरिका वही कदम अब उठा रहा है, जो भारत पिछले दो सालों से उठा रहा है और अब अमेरिका, सीधे तौर पर चीन के व्यापार पर हथौड़ा चला रहा है। भारत ने भी चीनी कंपनियों के भारत में निवेश पर रोक लगाई है और भारत, अभी तक सैकड़ों चीनी मोबाइस एप पर प्रतिबंध लगा चुका है। पिछले दिनों ही भारत ने चीन की इलेक्ट्रिक कार बनाने वाली BYD कंपनी के भारत में निवेश के प्रस्ताव को खारिज कर दिया है।












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