US-India Politics: PM मोदी और आसिम मुनीर के बीच क्या बैलेंस तलाश रहे ट्रंप? ईरान युद्ध के बाद बैकफुट पर US

US-India Politics: ईरान के युद्ध से के बाद किसी अमेरिका-इजरायल और ईरान का हासिल क्या है इस पर एक लंबी बहस छिड़ सकती है। लेकिन अगर डोनाल्ड ट्रंप के हासिल की बात करें तो वे बुरी तरह बैकफुट पर धकेले गए हैं। युद्ध के पहले जो ट्रंप तानाशाह की तरह व्यवहार कर रहे थे वे अब भारत और पाकिस्तान के साथ बैलेंस बनाते हुए चल रहे हैं। पर्दे के पीछे की बातचीत और भारत सरकार 'नो नॉनसेंस एटीट्यूड' अब ट्रंप को समझ आ चुका है। दूसरी तरफ पाकिस्तान में वे प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की जगह फील्ड मार्शल आसिम मुनीर को मोहरा बना चुके हैं और अब भारत-पाकिस्तान में एक नए बैलेंस की तलाश में हैं।

मोदी-ट्रंप की 40 मिनट की बात का क्या मतलब?

14 अप्रैल को ट्रंप ने मोदी से करीब 40 मिनट फोन पर बात की। पूर्व अमेरिकी राजदूत Sergio Gor के मुताबिक, ट्रंप ने मोदी से कहा, "मैं बस आपको यह बताना चाहता हूं कि हम सभी आपसे प्यार करते हैं।" यह बयान दोनों देशों के रिश्तों को मजबूत दिखाने वाला था। इसी दिन ट्रंप ने अमेरिका-ईरान वार्ता के पाकिस्तान में दोबारा शुरू होने का संकेत दिया। उन्होंने कहा, "क्यों? क्योंकि फील्ड मार्शल बहुत अच्छा काम कर रहे हैं।" ट्रंप ने मुनीर को 'शानदार' बताया, जिससे साफ हो गया कि वे उन्हें खास महत्व दे रहे हैं न कि शहबाज शरीफ को।

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अमेरिका की नजर में मुनीर का बढ़ता कद

अमेरिकी नेताओं ने मुनीर की खुलकर तारीफ की है और उन्हें शरीफ से ऊपर रखा है। ट्रंप आसिम मुनीर को कई मौकों पर अपना फेवरेट फील्ड मार्शल भी कह चुके हैं। यह बताता है कि अमेरिका अब पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति को अलग नजर से देख रहा है। साथ ही, अमेरिका-ईरान मध्यस्थता में मुनीर की भूमिका साफ दिखी। 15 अप्रैल से मुनीर ने तेहरान का दौरा किया, जबकि उसी दिन शहबाज शरीफ और विदेश मंत्री Ishaq Dar को सऊदी अरब, कतर और तुर्की भेजा गया। मतलबा ज्यादा इंपोर्टेंट रोल आसिम मुनीर के खाते में आया।

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शरीफ और डार का अलग मिशन

शरीफ और डार का काम इन देशों को अमेरिका-ईरान वार्ता की जानकारी देना और पाकिस्तान की भूमिका को लेकर पैदा हुई नकारात्मक सोच को कम करना था। कुछ एक्सपर्ट शरीफ और डार की यात्रा को सिर्फ इमेज बचाने वाली यात्रा कह रहे हैं। उसके पीछे कारण है अगर सेना प्रमुख डिप्लोमेटिक यात्रा पर जाएगा और पीएम-विदेश मंत्री नहीं, तो सवाल उठेंगे। लेकिन ये भी जग जाहिर है कि असली बातचीत की कमान मुनीर के हाथ में है, जो आगे वाशिंगटन भी जाने वाले हैं।

व्हाइट हाउस में मुनीर की खास एंट्री

ट्रंप का मुनीर के प्रति सकारात्मक रवैया नया नहीं है। मुनीर इकलौते सैन्य नेता हैं जिन्हें अमेरिकी राष्ट्रपति ने व्हाइट हाउस में बातचीत और डिनर के लिए बुलाया था। इससे उनके रिश्तों की गहराई का अंदाजा लगता है। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि मुनीर को महत्व देकर ट्रंप पाकिस्तान की असली पावर स्ट्रक्चर को पहचान रहे हैं। लेकिन ऐसा करना पाकिस्तान के कमजोर लोकतांत्रिक ढांचे को और नुकसान पहुंचा सकता है, पर ट्रंप को इससे फर्क नहीं पड़ता।

पाकिस्तान में सेना की भूमिका पर सवाल

यह स्थिति न तो पाकिस्तान के लोकतंत्र के लिए अच्छी है और न ही क्षेत्रीय शांति के लिए। हालांकि ये स्थिति पाकिस्तान लिए नई नहीं है। पाकिस्तान की सेना 1990 के दशक की शुरुआत से ही क्षेत्र में आतंकवाद और अस्थिरता से जुड़ी रही है, ये बात आरोपों से बाहर निकलकर खुद रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ भी मान चुके हैं और ऑपरेशन सिंदूर में मारे गए आतंकियों को श्रद्धांजलि देने पहुंचे आर्मी कमांडरों ने भी पुख्ता की है।

पाकिस्तान की सबसे बड़ी

यह एक विडंबना है कि सेना प्रमुख, जो खुद को प्रमोट करके शीर्ष पद पर पहुंचे, अब अमेरिका के लिए ईरान जैसे देश के साथ बातचीत में प्रमुख मध्यस्थ बन गए हैं। भले ही ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के साथ मुनीर के संपर्क बातचीत में मददगार हों, लेकिन सवाल यह है कि क्या अमेरिका को सार्वजनिक रूप से उनका कद बढ़ाना चाहिए, वो भी लोकतांत्रिक नेतृत्व की कीमत पर?

भारत के लिए चिंता की बात क्यों?

ट्रंप का मोदी-मुनीर संतुलन भारत के लिए एक बड़ा सवाल खड़ा करता है कि क्या अमेरिका फिर से भारत-पाकिस्तान को एक साथ देखने (hyphenation) की नीति अपना रहा है? यह पुराना नजरिया अब अप्रासंगिक माना जाता है। क्योंकि आज भारत का वैश्विक महत्व काफी बढ़ चुका है, जबकि पाकिस्तान अपनी आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहा है। इसकी एक बड़ी वजह वहां जरूरी सुधारों की कमी है, खासकर सेना की भूमिका को कम करने में।

सेना का संसाधनों पर कब्जा

पाकिस्तान की सेना न सिर्फ संसाधनों का बड़ा हिस्सा कंट्रोल करती है, बल्कि यह एक बड़ा गैर-जवाबदेह और गैर-जिम्मेदार बिजनेस ग्रुप भी बन चुकी है। ऐसे में सुधार की संभावना कम नजर आती है। साथ ही, मुनीर को बढ़ती अहमियत मिलने से सेना का प्रभाव और बढ़ सकता है, जिससे राजनीतिक नेतृत्व और कमजोर होने लगा है, कितना और होगा कहा नहीं जा सकता।

मध्यस्थता के जरिए अपनी इमेज बदल रहा पाक

अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता की भूमिका मिलने से पाकिस्तान का प्रभाव पश्चिम एशिया और इस्लामी दुनिया में बढ़ सकता है। हालांकि, आंतरिक कमजोरियों के कारण इसे आर्थिक लाभ में बदलना मुश्किल होगा। संभावना है कि अमेरिका पाकिस्तान को पश्चिम एशिया में बड़ी सुरक्षा भूमिका दे लेकिन यहां भी आर्थिक चुनौतियां उसका पीछा करेंगी। 1970 के दशक से ही कुछ खाड़ी देशों ने रक्षा मामलों में पाकिस्तान पर भरोसा किया है।

सऊदी के साथ रक्षा सहयोग का इतिहास

पाकिस्तानी सैनिक खाड़ी देशों की सेनाओं में काम कर चुके हैं। बाद में यह कम हुआ, लेकिन सऊदी अरब के साथ रणनीतिक रक्षा समझौते के बाद सहयोग फिर बढ़ा। पाकिस्तान ने धहरान के King Abdulaziz Air Base पर सैनिक और फाइटर जेट्स भी भेजे।

भारत के लिए क्या है चुनौती?

पश्चिम एशिया में भारत के बड़े हित हैं। ऐसे में भारत को अपनी सुरक्षा और कूटनीतिक स्थिति मजबूत करनी होगी। यह केवल United Arab Emirates तक सीमित नहीं रह सकता। ईरान युद्ध खत्म होने के बाद जो अनिश्चितता आएगी, उसमें भारत को सभी खाड़ी देशों के साथ अपने रिश्ते और मजबूत करने होंगे। यह प्रक्रिया तुरंत शुरू करनी होगी।

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जयशंकर का सीमित दौरा, उठे सवाल

विदेश मंत्री S Jaishankar ने अभी तक केवल यूएई का दौरा किया है, जो इस बड़े रणनीतिक संदर्भ में सवाल खड़े करता है। अमेरिका भारत को इंडो-पैसिफिक में बड़ी भूमिका देने के लिए Quad (भारत, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया) में उसकी भूमिका मजबूत कर रहा है। लेकिन चीन के साथ अपने विवादों को देखते हुए भारत के लिए केवल क्वाड पर निर्भर रहना सही नहीं होगा। उसे अपनी स्वतंत्र रणनीति बनानी होगी। एक और बात, हमें अमेरिका सेक्रेटरी ऑफ स्टेट क्रिस्टोफर लैंडो ने कहा था कि अमेरिका भारत के साथ वही गलती नहीं करेगा जो उसने चीन के साथ की थी। यह भारत के लिए एक अहम संकेत है कि उसे अपने भू-राजनीतिक हित खुद तय करने होंगे।

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