रॉबिन एल राफेल जिनकी वजह से कश्मीर हुर्रियत को मिली थी ताकत
वाशिंगटन। अमेरिका की वरिष्ठ डिप्लोमैट और पाकिस्तान मसलों की विशेषज्ञ रॉबिन एल राफेल जिन पर पाक प्रेम की वजह से अमेरिका ने जांच का फैसला किया है, वह अमेरिकी डिप्लोमैट हैं जिन्होंने कश्मीर में हुर्रियत की मौजूदगी का पुरजोर समर्थन किया।

भारत पर बनाया दबाव
यहां तक कि रॉफेल ने भारत पर कभी-कभी गैरजरूरी दबाव भी बनाया कि वह पाकिस्तान के साथ बातचीत को आगे बढ़ाए। वह भी उस दौर में जब भारत और पाक के बीच द्विपक्षीय बातचीत की संभावना कम रहती थी।
यह जानकारी उन भारतीय अधिकारियों की ओर से एक अंग्रेजी डेली को दी गई है जिन्होंने पिछले दो दशकों के दौरान राफेल के साथ काम किया।
67 वर्षीय रॉफेल जून 1997 में अमेरिकी स्टेट विभाग के दक्षिण एशिया विभाग से हटाए जाने के बाद भी पाक के लिए अमेरिकी सलाहकार के तौर पर काम कर रही थीं।
यह वह दौर था जब कश्मीर में चरमपंथी ताकतों में इजाफा हो रहा था। उस समय भारतीय मीडिया ने राफेल को भारत को तंग करने वाले अमेरिकी के तौर पर करार दिया था।
हुर्रियत के निर्माण की जिम्मेदार
90 के दशक में जिन सरकारी अधिकारियों ने राफेल के साथ काम किया उन्होंने इस इंग्लिश डेली को जानकारी दी है कि अगर कश्मीर में आज हुर्रियत और अलगाववादी ताकतें हावी हैं तो उसके लिए सिर्फ राफेल ही जिम्मेदारी हैं।
1993 में हुर्रियत के गठन को राफेल ने न सिर्फ बढ़ावा दिया बल्कि उनके प्रोत्साहन पर ही हुर्रियत अस्तित्व में आया।
अब जबकि अमेरिका ने राफेल के खिलाफ कार्रवाई करने का फैसला किया है तो उनके साथ काम कर चुके भारतीय अधिकारी काफी खुश हैं। इन अधिकारियों के मुताबिक यह वाकई काफी रोचक कदम है। राफेल हमेशा से ही पाक के करीब रही हैं। कश्मीर में उनकी जड़ें काफी गहरी हैं।
विकीलीक्स में जिक्र
एक पूर्व भारतीय अधिकारी ने राफेल पर आरोप लगाया कि वह सभी अलगाववादी संगठनों के काफी करीब रही हैं। एक बार तो राफेल ने भारत में कश्मीर के विलय पर ही सवाल उठा दिए थे।
सिर्फ इतना ही राफेल कश्मीर में आईएसआई के लिए काम करने वाले उस गुलाम मोहम्मद फई के भी काफी करीब रही हैं जो इस समय अमेरिका की जेल में बंद है।
इसके अलावा जेएंडके लिब्रेशन फ्रंट के यासीन मलिक, हुर्रियत कांफ्रेंस के अहम नेता मीरवाइजउमर फारूक और इस तरह के कई कश्मीर नेताओं के साथ अक्सर राफेल की करीबियां सुर्खिंया बनी हैं।
विकीलीक्स में भी एक ऐसे अमेरिकी राजनायिक का जिक्र किया गया है जो कश्मीर में हुर्रियत और अलगाववादी नेताओं के काफी करीब रही हैं।
कश्मीर को करार दिया था विवादित क्षेत्र
वह पहली ऐसी अमेरिकी राजनायिक भी हैं जिन्होंने कश्मीर को एक 'विवादित क्षेत्र' के तौर पर परिभाषित किया। आज अगर कश्मीर मुद्दा एक अंतराष्ट्रीय मुद्दा बना है तो उसकी वजह भी राफेल ही थीं।
वर्ष 1995 में जब पहली बार पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो ने कश्मीर के मुद्दे को अपनी अमेरिकी यात्रा के दौरान उठाया तो उसकी वजह था राफेल की ओर से किए गए प्रयास।
यही वजह थी कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने उनको दिल्ली में बतौर अमेरिका राजदूत की पोस्ट से हटाकर स्टेट फॉर साउथ एशिया में बतौर सहायक सचिव का जिम्मा सौंप दिया था।












Click it and Unblock the Notifications