US Default: जान-बूझकर डिफॉल्ट हो रहा है अमेरिका, पैसे खत्म, जानिए कितने विनाशकारी होंगे परिणाम?

अमेरिका की ट्रेजरी सचिव (वित्त मंत्री) जेनेट येलेन ने चेतावनी दी है, कि सरकार के पास 1 जून तक अपने बिलों का भुगतान करने के लिए नकदी खत्म हो सकती है। यानि, अमेरिकी सरकार का खजाना खाली हो जाएगा।

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US Default News: अमेरिका की सरकार ने अपनी खर्च करने की सीमा को पार कर लिया है, यानि, अमेरिकी सरकार के पास अब अपने बिलों का भुगतान करने के लिए, अपना कर्ज चुकाने के लिए पैसे नहीं बचे हैं। अमेरिका की वित्त मंत्री जेनेट येलेन ने इस बाबत जनवरी के बाद दूसरा पत्र अमेरिकी कांग्रेस के स्पीकर केविन मैक्वार्थी को लिखा है।

अमेरिका के ट्रेजरी डिपार्टमेंट की प्रमुख जेनेट येलेन ने अपने पत्र में आशंका जताई है, कि 1 जून के बाद अमेरिका की सरकार के पास खर्च करने के लिए पैसे नहीं होंगे और अगर देश डिफॉल्ट करता है, तो इसके विनाशकारी परिणाम होंगे।

ऋण सीमा (debt limit) तक पहुंचने का मतलब है, कि सरकार को अपना खर्च चलाने के लिए और ज्यादा धन उधार लेने की इजाजत नहीं है, जब तक कि अमेरिकी कांग्रेस की तरफ से इसकी इजाजत नहीं दी जाए। अमेरिकी कांग्रेस अगर इस कैप को हटा ले, या सस्पेंड कर दे, तो फिर सरकार अपने खर्च का दायरा बढ़ा सकती है।

फिलहाल, अमेरिका में सरकार के पास खर्च करने की क्षमता 31.4 ट्रिलियन डॉलर है, जिसे सरकार पूरी तरह से खर्च कर चुकी है, लिहाजा अब अमेरिका की संघीय सरकार के पास अपने कर्ज का भुगतान करने के लिए पैसे नहीं बचे हैं, लिहाजा देश के ऊपर डिफॉल्ट होने का खतरा मंडरा गया है।

अमेरिका में साल 1960 के बाद से ऋण सीमा को अभी तक 78 बार बढ़ाया या संसोधित किया जा चुका है, जिसमें तीन संशोधन ने पिछले एक साल में ही किए गये हैं।

लेकिन, बाइडेन प्रशासन के लिए इस बार का खतरा इसलिए बड़ा है, क्योंकि संसद में उनकी विरोधी, रिपब्लिकन पार्टी बहुमत में है, जो लगातार सरकार के खर्च में कटौती की मांग करते आए हैं। रिपब्लिकन पार्टी की तरफ से कहा गया है, कि इस बार खर्च करने की सीमा रेखा को नहीं बढ़ाया जाएगा, जिसका मतलब ये हुआ, कि अमेरिका अपने इतिहास में पहली बार डिफॉल्ट करने वाला है और ऐसा जान-बूझकर किया जा रहा है।

Janet Yellen

बाइडेन प्रशासन अब क्या करेगा?

रिपब्लिकन पार्टी के बार बार कहने के बाद भी बाइडेन प्रशासन ने अमेरिकी सरकार के खर्च में कटौती नहीं की, जिसकी वजह से खजाना खाली हुआ है। लिहाजा, रिपब्लिकन पार्टी अब संसद में सरकार के खर्च को बढ़ाने की अनुमति देगी, इसकी संभावना काफी कम है।

राष्ट्रपति जो बाइडेन ने संकट को हल करने के लिए 9 मई को रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक नेताओं की बैठक बुलाई है, जिससे पता चलेगा, कि क्या रिपब्लिकन पार्टी कर्ज की सीमा को बढ़ाने के लिए तैयार होती है या नहीं।

व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव काराइन जीन-पियरे ने एक बयान में कहा, कि "हमारे इतिहास में, हमने कभी भी अपने कर्ज पर चूक नहीं की है या अपने बिलों का भुगतान करने में हम कभी भी विफल नहीं रहे हैं।"

यूएस ट्रेजरी का कहना है, कि सरकार के खर्च को कम करने के लिए कुछ कदम उठाए गये, जो नाकाफी साबित हुए, जिनमें पेंशन, स्वास्थ्य लाभ में कटौती जैसे कुछ कदम सामिल थे।

अगर देश डिफॉल्ट करता है, तो उसकी S&P क्रेडिट रेटिंग एजेंसी गिर जाएगी, जिससे निवेशकों में निराशा बढ़ेगी और इसका गंभीर असर बाजार पर पड़ेगा। विशेषज्ञों को पहले ही डर है, कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था और बाजार पर इसका क्या असर होगा, इसका अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता है, क्योंकि इतिहास में पहली बार अमेरिका डिफॉल्ट करेगा।

विनाशकारी आर्थिक तबाही

ट्रेजरी सचिव जेनेट येलेन ने जनवरी में अनुमान लगाया था, कि तमाम उपायों के बाद भी अमेरिका को जून महीने तक के लिए ही डिफॉल्ट होने से बचाया जा सकता है, लिहाजा कई विश्लेषक एक वास्तविक आर्थिक तबाही के रूप में इसे देख रहे हैं।

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कुछ आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है, कि अधिकारियों को डिफ़ॉल्ट से बचने के लिए जितना संभव हो उतना काम करना होगा। इसका मतलब होगा, कि फिलहाल ब्याज का भुगतान किया जाए और अन्य भुगतान रोके जाएं। जैसे डिफेंस सेक्टर में जो भुगतान करना है, फिलहाल उसे होल्ड पर रखा जाए।

इसके अलावा विशेषज्ञों का कहना है, कि देश भर के सेवानिवृत्त लोगों द्वारा प्राप्त सामाजिक सुरक्षा चेक और सेना सहित सरकारी कर्मचारियों के वेतन को फिलहाल रोक दिया जाए।

बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, आर्थिक मामलों के जानकारों का कहना है, कि डिफ़ॉल्ट होना, देश की विश्वसनीयता को बर्बाद कर सकता है, वैश्विक वित्तीय बाजारों में उथल-पुथल मचा रहा है, जहां अमेरिकी ऋण का भारी कारोबार होता है और पारंपरिक रूप से अमेरिकी कर्ज को कम जोखिम के रूप में देखा जाता है।

अमेरिका के ऊपर क्यों आया है ये खतरा?

पहले विश्वयुद्ध के दौरान धन जुटाने के लिए सरकार को लचीलापन देने के तरीके के रूप में ऋण सीमा पहली बार 1917 में पेश की गई थी। सिद्धांत रूप में यह कांग्रेस को खर्च पर जांच करने का यह एक तरीका देता है।

यानि, अमेरिकी सरकार कितना खर्च कर सकती है, इसकी निगरानी अमेरिकी कांग्रेस करती है और खर्च करने की सीमा रेखा तय की गई है, जिसे 1960 के बाज से 78 बार बढ़ाया जा चुका है। पिछली बार ऋण सीमा को दिसंबर 2021 में बढ़ाया गया था और इस सीमा को 31.4 ट्रिलियन डॉलर कर दिया गया था।

लेकिन, अमेरिका में राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ा है और अमेरिका का कर्ज पिछले एक दशक में दोगुना हो गया है। जिसकी वजह से कर्ज की सीमा पर झगड़े तेजी से भयावह हो गए हैं। सरकार का कहना है, कि आशंकि वित्तीय संकट और महामारी के दौरान सरकारी खर्च में भारी बढ़ोतरी की वजह से सरकार अपने खर्च की सीमा को पार कर गई है, जिसकी वजह से सरकार का बजट घाटा काफी बढ़ गया है।

वहीं, एक्सपर्ट्स का कहना है, कि ऋण सीमा एक बारहमासी राजनीतिक सौदेबाजी चिप है।

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ऋण सीमा पर 2011 की लड़ाई को तब सुलझाया गया था, जब तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा ने सरकारी खर्च में 900 अरब डॉलर से ज्यादा की कटौती की थी और उसके बाद अमेरिकी कांग्रेस ने सरकार के खर्च की सीमा में 900 अरब डॉलर कम कर दी थी।

वहीं, कुछ रिपब्लिकन इस बार फिर से खर्च में कटौती पर जोर दे रहे हैं, जिसे डेमोक्रेट्स ने खारिज कर दिया है।

सरकार का कहना है, अगर खर्च में कटौती की जाती है, तो फिर सरकार कई तरह के बिलों का भुगतान, जैसे सोशल सिक्योरिटी, मेडिकेयर, बुजुर्गों को दी जाने वाली सहायता, फूड और हाउसिंग प्रोग्राम का भुगतान नहीं कर पाएगी, जिससे अमेरिका की सामाजिक व्यवस्था ही चरमरा जाएगी।

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दुनिया पर क्या होगा प्रभाव?

अमेरिका के निवेशक दुनियाभर के बाजारों में निवेश करते हैं, लिहाजा निश्चित तौर पर इसका गंभीर असर दुनिया के बाजारों पर पड़ेगा। कितना असर पड़ेगा, ये फिलहाल कहना मुश्किल है।

लेकिन, अगर अमेरिका डिफॉल्ट करता है, तो फिर सभी तरह के आउटस्टेंडिंग सीरीज ऑफ बॉन्ड्स पर इसका असर होगा। जिसमें ग्लोबल कैपिटल मार्केट में जारी किए गये बॉन्ड्स, गवर्नमेंट टु गवर्नमेंट क्रेडिट, कमर्शियल बैंकों और इंस्टीट्यूशनल लेंडर्स का साथ हुए फॉरेन करेंसी डिनॉमिनेटेड लोन एग्रीमेंट भी शामिल हैं।

जिसका असर ये होगा, कि अमेरिकी को बॉन्ड मार्केट से पैसे उठाने पर रोका जा सकता है, जब तक कि निवेशकों को ये यकीन नहीं हो जाता, कि अमेरिकी सरकार भुगतान करना चाहती है और सरकार ने भुगतान करने की क्षमता को हासिल कर लिया है।

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