US Default: क्या अमेरिका की अर्थव्यवस्था ढहने वाली है? सोची समझी साजिश या कुछ और... जानें हकीकत
अमेरिका के ट्रेजरी डिपार्टमेंट की प्रमुख जेनेट येलेन ने अपने पत्र में आशंका जताई है, कि 1 जून के बाद अमेरिका की सरकार के पास खर्च करने के लिए पैसे नहीं होंगे और अगर देश डिफॉल्ट करता है, तो इसके विनाशकारी परिणाम होंगे।

US Default: अमेरिका के वित्तमंत्री जेनेट येलेन ने अमेरिकी संसद के स्पीकर को लिखी चिट्ठी में कहा है, कि अगर अमेरिकी सरकार के खर्च करने की सीमा को नहीं बढ़ाया गया, तो अमेरिका 1 जून को डिफॉल्ट कर जाएगा।
अमेरिकी वित्तमंत्री की इस रिपोर्ट ने पूरी दुनिया में सनसनी फैला दी है, क्योंकि अगर अमेरिका डिफॉल्ट करता है, तो उसके क्या अंजाम होंगे, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है। इसके अलावा, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का मानना है, कि सुपर अमेरिका अब शक्तिशाली नहीं रहा, बल्कि अब वो धीरे धीरे नीचे की तरफ जा रहा है।
सिर्फ शी जिनपिंग ही नहीं, बल्कि कई अमेरिकियों ने भी ये मानना शुरू कर दिया है। यह आश्चर्य की बात नहीं है, कि हाल ही में द इकोनॉमिस्ट कवर स्टोरी ने इतना ध्यान आकर्षित किया है। द इकोनॉमिस्ट ने अपनी चार पन्नों की रिपोर्ट में दर्जनों सबूत पेश किए हैं, जिसमें रिपोर्ट को सही ठहराने की कोशिश की गई है।
लेकिन, अमेरिका दुनिया की सबसे अमीर, सबसे अधिक उत्पादक और सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बना हुआ है। प्रभावशाली संख्या में आयामों के साथ, यह अपने साथियों को और पीछे छोड़ रहा है।
क्या अमेरिका की अर्थव्यवस्था गिर रही है?
अमेरिका में द इकोनॉमिस्ट की रिपोर्ट को लेकर बहस शुरू हो गई है और अर्थशास्त्री इस रिपोर्ट को लेकर बंटे हुए हैं। लेकिन, कुछ आंकड़े हैं, जिनके आधार पर आईये समझने की कोशिश करते हैं, कि क्या वाकई अमेरिकी अर्थव्यवस्था गर्त में जा रही है या फिर कुछ अर्थशास्त्रियों की नियत में ही 'खोट' है?
साल 1990 में, अमेरिका के सकल घरेलू उत्पाद ने दुनिया के कुल का 25% हिस्से का प्रतिनिधित्व किया था। जबकि, चीन के उदय के बावजूद, अमेरिका अभी भी दुनिया के आर्थिक उत्पादन का 25% हिस्सा कवर कर रहा है।
G-7 देशों के बीच की बात की जाए, जिसमें जापान और जर्मनी जैसे देश शामिल हैं, तो इसमें अमेरिका का हिस्सा लगातार बढ़ रहा है। अमेरिका की क्रय शक्ति अभी भी जी-7 की कुल जीडीपी में 51% हिस्सा है, जो साल 1990 में 43% था।
1990 में अमेरिका की प्रति व्यक्ति आय पश्चिमी यूरोप की तुलना में 24% अधिक थी, जो आज 30% से ज्यादा है।
1990 और 2022 के बीच, श्रम उत्पादकता (उत्पादन प्रति घंटा काम) अमेरिका में 67%, यूरोप में 55% और जापान में 51% बढ़ी है।
इसके अलावा, रिसर्च और डेवलपमेंट पर अमेरिकी खर्च पिछले एक दशक में सकल घरेलू उत्पाद का 3.5% तक बढ़ गया है, जो अधिकांश देशों से काफी ज्यादा है।
आर्थिक सहयोग और विकास संगठन के 23 अन्य अमीर देशों की तुलना में अमेरिका प्रति छात्र शिक्षा पर 37% ज्यादा खर्च करता है, और 34% अमेरिकियों ने तृतीयक शिक्षा पूरी की है, यह अनुपात केवल सिंगापुर से ज्यादा है।
द इकोनॉमिस्ट की रिपोर्ट में निगेटिव क्या है?
द इकोनॉमिस्ट का मानना है, कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था में नकारात्मकताएं तो हैं, खासकर आय असमानता बढ़ी है। प्रति व्यक्ति अमेरिकी आय में बहुत अधिक वृद्धि हुई है और अमेरिका "अल्ट्रा-रिच" के पास संपत्ति काफी ज्यादा बढ़ी है। वहीं, 77 साल की उम्र में, अमेरिकियों की जीवन प्रत्याशा अन्य अमीर देशों की तुलना में पांच साल कम है, क्योंकि अमेरिका के गरीबों को खराब चिकित्सा देखभाल मिलती है।
द इकोनॉमिस्ट की रिपोर्ट में कहा गया है, कि जी7 देशों में अमेरिका एक ऐसा देश है, जहां इनकम को लेकर काफी असमानताएं हैं। द इकोनॉमिस्ट में कहा गया है, कि "ओक्लाहोमा में एक ट्रक वाला पुर्तगाल में एक डॉक्टर से ज्यादा कमा सकता है।"
राष्ट्रपतियों को आमतौर पर मजबूत अर्थव्यवस्थाओं का श्रेय दिया जाता है, लेकिन द इकोनॉमिस्ट स्पष्ट रूप से बाइडेन और ट्रम्प दोनों की आलोचना करते हुए चेतावनी देता है, कि संरक्षणवाद और औद्योगिक नीति के लिए उनकी नीति से अमेरिका की ताकत खत्म हो सकती है।
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अर्थशास्त्री क्रुगमैन कहते हैं, कि भले ही अमेरिका सुपरपावर है, लेकिन अमेरिका में वर्क लाइफ बैलेंस नहीं है। उनका कहना है, कि हालांकि, यूरोप आर्थिक रूप से अमेरिका से काफी पीछे है, फिर भी यूरोपीय लोग जीवन की उच्च गुणवत्ता का आनंद लेते हैं। उनकी लंबी छुट्टियां उन्हें बेहतर वर्क-लाइफ बैलेंस देती हैं।
लेकिन, क्या अब अमेरिका डिफॉल्ट होगा और क्या अमेरिकी अर्थव्यवस्था के ये पतन की शुरूआत है, ये आने वाला वक्त बताएगा।












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