अमेरिका जैसे 'दगाबाज दोस्त' के साथ चीन को चुनौती दे पाएगा भारत? क्यों बढ़ गई मोदी सरकार की चिंता?

जानकारों ने अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया के क्वाड ग्रुप के भविष्य पर भी सवाल उठाना शुरू कर दिया है। विशेषज्ञ, अमेरिका के अफगानिस्तान में उठाए गये कदम को काफी नकारात्मक मान रहे हैं।

नई दिल्ली, सितंबर 04: पिछले एक महीने में वैश्विक राजनीति पूरी तरह से बदल गई है और अफगानिस्तान में पाकिस्तान और चीन ने भारत के खिलाफ जो जाल बुना है, उसने भारत को चिंता में डाल दिया है। लेकिन, सबसे बड़ी चिंता अमेरिका की विश्वसनीयता में आई कमी को लेकर है और सवाल ये उठ रहे हैं कि क्या अमेरिका जैसे 'मौकापरस्त' पार्टनर के साथ मिलकर क्या भारत चीन को चुनौती दे पाएगा? और दूसरा सवाल ये है कि क्या चीन को रोकने के लिए बनाया गया क्वाड अपना प्रभाव खोता हुआ नजर आ रहा है?

अमेरिका के रवैये से हैरत में दुनिया

अमेरिका के रवैये से हैरत में दुनिया

अफगानिस्तान से अमेरिका जिस तरीके से गैरजिम्मेदार होकर बाहर निकला है, वो पूरी दुनिया को हतप्रभ करने वाला है और सवाल उठ रहे हैं कि क्या अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन और उनके प्रशासन ने खुद की अमेरिका की साख को बट्टे में मिला दिया है और क्या अमेरिका से एक महाशक्ति होने का तमगा अब छिन गया है। ब्रिटेन के विदेश मंत्री ने खुले तौर पर कल कहा है कि अमेरिका अब सुपरपॉवर नहीं रहा है। लेकिन, यह सवाल तब और अहम हो जाता है, जब चीन ने साउथ चायना सी, हिंद महासागर, ताइवान और हांगकांग में अमेरिका को सीधे तौर पर चुनौती दी हो, भारत को लगातार अफगानिस्तान में घेर रहा हो और अमेरिका अफगानिस्तान को बीच मझधार में छोड़कर बाहर निकल गया हो। तो फिर अमेरिका के इस कदम से सवाल ये उठता है कि, आखिर क्वाड अब कितना गंभीर रहा है? क्या क्वाड की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े नहीं हो गये हैं?

अमेरिका की विश्वसनीयता पर सवाल

अमेरिका की विश्वसनीयता पर सवाल

अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकारों ने अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया के क्वाड ग्रुप के भविष्य पर भी सवाल उठाना शुरू कर दिया है। विशेषज्ञ, अमेरिका के अफगानिस्तान में उठाए गये कदम को काफी नकारात्मक मान रहे हैं और कह रहे हैं कि अमेरिका के इस कदम से सहयोगी देशों में यही संदेश गया है कि अमेरिका आपको अचानकर कहीं भी छोड़ सकता है। खासकर तब, जब क्वाड ग्रुप को चीन के खिलाफ एकजुट देशों के समूह के रूप में देखा जाता है और ऑस्ट्रेलिया, जापान और भारत लगातार चीन के खिलाफ खड़े हुए हैं। अफगानिस्तान में अमेरिका ने हजारों ऐसे अफगानों को तालिबान के चंगुल में फंसा हुआ छोड़ आया, जिन्होंने अपनी जान पर खेलकर अमेरिका और नाटो देश की सेनाओं की मदद की थी। 15 अगस्त को काबुल पर कब्जे के बाद काबुल एयरपोर्ट पर अमेरिकी सैन्य विमान पर लटकते और सैकड़ों फीट की ऊंचाई से गिरते अमेरिकी मददगार अफगानों की तस्वीर अमेरिका की साख को जमींदोज कर चुका है, ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या भारत को अमेरिका के ऊपर भरोसा करना चाहिए?

जमीन पर अमेरिका की प्रतिष्ठा

जमीन पर अमेरिका की प्रतिष्ठा

एक अंग्रेजी न्यूज पोर्टल से बात करते हुए प्रोफेसर हर्ष पंत कहते हैं कि 'निश्चित तौर पर जिस तरह से अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी हुई और जितनी आक्रामकता के साथ तालिबान ने अफगानिस्तान की सत्ता पर कब्जा जमाया है, उससे अमेरिका की साख को ठेस पहुंची है।'' प्रोफेसर पंत बताते हैं कि, ''इसमें कोई शक नहीं कि इस पूरे मामले से भारत की नजर में अमेरिका की साख भी कम हो गई है''। उन्होंने कहा कि जिस तरह अमेरिका ने अपने मित्र देशों और सहयोगी देशों की चिंता किए बिना अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए अफगानिस्तान से निकला, उसका सबसे ज्यादा नुकसान भारत को हुआ है। भारत के अफगानिस्तान की लोकतांत्रिक सरकार के साथ काफी मजबूत संबंध थे। भारत ने अफगानिस्तान में 3 अरब डॉलर का निवेश किया हुआ था, तो यह निश्चित तौर पर भारत के लिए एक बड़ा झटका है। प्रो. हर्ष पंत ने कहा कि, यकीनन अमेरिका की अफगानिस्तान नीति ने भारत की सुरक्षा को खतरे में डाल दिया है।

मोदी सरकार को बड़ा झटका

मोदी सरकार को बड़ा झटका

अफगानिस्तान में एक लोकतांत्रिक सरकार का पतन और तालिबान के नेतृत्व में इस्लामिक अमीरात का गठन निश्चित तौर पर भारत की नरेन्द्र मोदी सरकार के लिए बहुत बड़ा झटका है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी पहले कार्यकाल के दौरान अफगानिस्तान में कई विकासपूर्ण योजनाओं को चलाया और पिछले एक दशक में भारत ने अफगानिस्तान में 300 करोड़ डॉलर के विकासकार्य किए हैं। जिनमें अफगानिस्तान में स्कूल, कॉलेज, संसद भवन, बिजली बांध और हाईवे बनाए गये। लेकिन, अफगानिस्तान से एक झटके से अमेरिका का निकल जाने का मतलब है कि तीन अरब डॉलर खर्च करने के बाद भी भारत के लिए चुनौतियों का बरकरार रहना। अमेरिका ने जब अफगानिस्तान छोड़ा, तो भारत की चिंताओं का जरा भी ध्यान नहीं रखा। भारत पर आए इस संकट के लिए प्रत्यक्ष तौर पर अमेरिका और जो बाइडेन प्रशासन जिम्मेदार है। भारत ने अफगानिस्तान में अमेरिका की नीतियों का पूरा समर्थन किया, बावजूद इसके संकट के वक्त में भारत अकेला खड़ा है। खासकर तब, जब भारत के तमाम पड़ोसी देशों पर चीन का भारी प्रभाव है और अफगानिस्तान में एंटी-इंडिया सरकार की स्थापना हो रही है।

भारत के सामने बड़ी चुनौती

भारत के सामने बड़ी चुनौती

अब इसमें कोई शक नहीं है कि साउथ एशिया में भारत को अपनी चुनौतियों का सामना खुद करना होगा और अफगानिस्तान से अमेरिका के निकलने के काफी दूरगामी परिणाम होंगे। अफगानिस्तान संकट में वैश्विक परिदृश्य में नये राजनीतिक समीकरणों को जन्म दिया है। इसमें सबसे बड़ी चुनौती भारत और नरेन्द्र मोदी की सरकार के सामने खड़ी हो गई है। खासकर जब अफगानिस्तान में चीन और पाकिस्तान का दबदबा बढ़ा है और अमेरिका का दबदबा काफी कम हो गया है। अफगानिस्तान के मामले में अब भारत की नजर रूस और ईरान के कदमों पर टिकी हुई है। अगर रूस और ईरान भी तालिबान के समर्थन में चीन और पाकिस्तान के साथ आते हैं, तो भारत के लिए बड़ी रणनीतिक और कूटनीतिक चुनौती खड़ी हो जाएगी। खासकर तब जब, ईरान और रूस अमेरिका के खिलाफ खड़े हों। यानि, अफगानिस्तान में अपने हितों को आगे बढ़ाने के लिए भारत को ईरान और रूस की मदद लेनी पड़ सकती है।

काबुल एयरपोर्ट पर भारत को झटका

काबुल एयरपोर्ट पर भारत को झटका

अफगानिस्तान में भारत को उस वक्त सबसे बड़ा झटका लगा, जब काबुल एयरपोर्ट पर अमेरिका ने भारत की मदद करने से साफ इनकार कर दिया। भारत के अनुरोध के बाद भी काबुल एयरपोर्ट पर भारत को राजनयिक जमीन नहीं दी गई, जिसके जरिए भारत अपने नागरिकों और अफगान शरणार्थियों को अफगानिस्तान से निकालना चाहता था। यही वजह है कि भारत को अफगानिस्तान से पूरी तरह से हटने के लिए मजबूर होना पड़ा। अमेरिका ने भारत को काबुल एयरपोर्ट पर तब धोखा दिया, जब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अमेरिका लगातार कहता रहा कि भारत दुनिया में उसका सबसे गहरा और रणनीतिकार दोस्त है। अमेरिकी सहयोग नहीं मिलने के बाद भी भारत अभी भी चुप है और पूरी स्थिति को अपने हिसाब से समझने की कोशिश में है। भारत फिलहाल अफगानिस्तान संकट और तालिबान की हर चाल पर नजर बनाए हुए है।

अब 'क्वाड' का क्या होगा?

अब 'क्वाड' का क्या होगा?

अमेरिका की अफगानिस्तान नीति ने अब क्वाड के महत्व पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं और अमेरिका की जिम्मेदारियां अब संदिग्ध हैं। खासकर जब क्वाड ग्रुप के गठन को चीन के खिलाफ एकजुट देशों के समूह के रूप में देखा जा रहा है। आपको बता दें कि क्वाड में अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं, जिसका मकसद इंडो-पैसिफिक में चीन के बढ़ते वर्चस्व को रोकना है, लेकिन अफगानिस्तान में अमेरिका ने जो खेल खेला है, उसके बाद क्वाड देशों की सुरक्षा को लेकर सवाल उठ रहे हैं। क्वाड ग्रुप अमेरिका को एशियाई के दोस्त देशों के साथ मिलकर जमीन पर काम करने का बेहतर मौका देता है, जिससे वो चीन को एशिया में उलझाकर रख सकता है, लेकिन, अब साफ दिख रहा है कि क्वाड को लेकर अमेरिका उदासीन बना हुआ है, जो क्वाड ग्रुप के सदस्यों के लिए यह एक बड़ा झटका है। लिहाजा सवाल यही है कि क्या अमेरिका को 'दोस्त' मानते हुए भारत को अपने रास्ते पर चलना चाहिए या फिर भारत को अपने कदम खुद उठाने चाहिए?

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