अमेरिका में नस्ल के आधार पर कॉलेजों में आरक्षण खत्म, ओबामा का टूटा दिल, तो ट्रंप ने बताया ऐतिहासिक दिन
Obamas Trump on US Court's Reservation Ruling: अमेरिका के स्कूलों और कॉलेजों में अब नस्ल के आधार पर होने वाले एडमिशन को खत्म कर दिया गया है। अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुआ कहा है, कि अब नस्ल के आधार पर कॉलेजों में एडमिशन नहीं मिलेगा।
अमेरिका में भी तक नस्ल के आधार पर 'ब्लैक कम्युनिटी' के लोगों को आरक्षण मिलता था, ताकि उन्हें समाज की मुख्यधारा में लाया जा सके। लेकिन, अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने अमेरिका में अफर्मेटिव एक्शन यानि, सकारात्मक पक्षपात कानूनों के सामने भारी मुश्किलें पैदा कर दी हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है, कि विश्वविद्यालयों में एडमिशन के वक्त अब उनके नस्ल पर विचार नहीं किया जाएगा।

नस्ल के आधार पर मिलता है आरक्षण
अमेरिका में ब्लैक कम्युनिटी को शिक्षा के आधार पर आगे लाने के लिए शिक्षण संस्थानों में उन्हें आरक्षण दिया जाता था। अभी तक काले और सामाजिक तौर पर निम्न कैटोगिरी से आने वाले छात्रों को विश्वविद्यालयों में दाखिले के वक्त रिजर्वेशन मिलता था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने खत्म कर दिया है।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद समाज के अलग अलग वर्गों से अलग अलग प्रतिक्रियाएं आ रही हैं और अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ऐतिहासिक बताया है। डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth पर लिखे एक पोस्ट में कहा है, कि 'अमेरिका के लिए ये एक शानदार दिन है।'
वहीं अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने एक बयान जारी करते हुए कहा है, कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले से उनका दिल टूट गया है।
पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने विश्वविद्यालय में दाखिले में नस्ल के आधार पर आरक्षण खत्म किए जाने के फैसले की आलोचना करते हुए कहा, कि वो अपनी पत्नी मिशेल ओबामा के साथ 'सकारात्मक भेदभाव' कानून सालों से रहा है और वो अपनी पत्नी के साथ कोर्ट के फैसले के खिलाफ खड़े हैं।
ओबामा ने अपने बयान में तर्क दिया है, कि ये नीतियां यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक थीं, कि नस्ल या नस्ल की परवाह किए बिना सभी छात्रों को सफल होने का अवसर मिले।
बराक ओबामा ने सोशल मीडिया ट्विटर पर जो बयान जारी किया है, उसमें उन्होंने लिखा है, कि "एक न्यायपूर्ण समाज के निर्माण के लिए 'सकारात्मक भेदभाव कानून' कभी भी एक पूर्ण विकल्प नहीं था, लेकिन कई जेनरेशंस से, जब अमेरिका के ज्यादातर संस्थानों में कुछ समुदायों को बाहर रखा गया है, तो ये कानून हमें उन प्लेटफॉर्म्स पर खड़े होने का हक देता था, जहां से हम कह सकते थे, कि हम और भी ज्यादा के हकदार हैं।"
कब बना था सकारात्मक भेदभाव' कानून?
आपको बता दें, कि अमेरिका में अफर्मेटिव एक्शन कानून 1960 के दशक में बनाया गया था और इस कानून को समाज को विविधतापूर्ण बनाने की दिशा में इसकी भूमिका की काफी सराहनाकी गई है। वहीं, अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर गहरी आपत्ति और नाराजगी जताई है।
जो बाइडेन ने कहा, कि इस फैसले को आखिरी शब्द नहीं माना जा सकता है, क्योंकि अमेरिका में अभी भी भेदभाव बरकरार है। उन्होंने कहा, कि सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों ने इस फैसले को सुनाया है, जिसमें से 6 जज कंजर्वेटिव हैं, तो 3 जज लिबरल हैं।
वहीं, बीबीसी से बात करते हुए अमेरिका की शिक्षा मंत्री मिगेल कार्डोना ने कहा, कि "विश्वविद्यालय चलाने के लिए इस कानून का बेहतरीन इस्तेमाल किया जाता रहा है, ताकि समाज में विविधता फैले, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रमुख औजार को छीन लिया है।" हालांकि, उन्होंने आगे ये कहा, कि "विश्वविद्यायलों को विविध बनाने के हमारे संकल्प को सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला नहीं छीन सकता है।"












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