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यूक्रेन पर रूस का हमला, संयुक्त राष्ट्र, नेटो और यूरोपीय संघ क्या कर रहे हैं?

बात 24 फरवरी 2022 की है.

एक तरफ़ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक चल रही थी तो दूसरी तरफ़ रूस ने यूक्रेन पर हमला कर दिया था.

दोनों घटनाओं के बीच फ़ासला महज़ कुछ मिनटों का था.

UN, NATO EU on russia ukraine crisis

ग़ौर करने वाली बात ये थी कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक की अध्यक्षता वही रूस कर रहा था, जिसके ऊपर यूक्रेन पर हमला करने का आरोप है.

इस बैठक में संयुक्त राष्ट्र में यूक्रेन के स्थाई प्रतिनिधि सर्गेई किसलित्सा ने अपने बयान में भावुक अपील की.

उन्होंने कहा, "युद्ध अपराधियों के लिए कोई सज़ा नहीं है. वे सीधे नर्क में जाते हैं."

"डी-एस्केलेशन की बात के लिए अब बहुत देर हो चुकी है. रूसी राष्ट्रपति ने जंग की घोषणा कर दी है. इस बैठक का अब कोई मतलब नहीं है."

https://news.un.org/en/story/2022/02/1112592

रूस के यूक्रेन पर हमले के बाद यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की यूरोप के दूसरे देशों से लगातार मदद की गुहार लगाते नज़र आ रहे हैं.

उनकी गुहार का कुछ असर भी हुआ.

यूरोपीय देशों की तरफ़ से रूस पर 'कुछ प्रतिबंध' लगाए गए और कुछ देशों ने रूस के हमले की 'कड़ी निंदा' की.

https://twitter.com/ZelenskyyUa/status/1497095228175663106

दो विश्व युद्ध झेलने के बाद, 21वीं सदी में एक देश दूसरे स्वतंत्र देश पर हमला कर देता है और दुनिया के दूसरे देश इसे रोक पाने में नाकाम कैसे रह जाते हैं.

इस वजह से संयुक्त राष्ट्र, नेटो और यूरोपीय संघ तीनों पर सवाल उठ रहे हैं.

एक एक कर तीनों के बारे में जानने की ज़रूरत है.

संयुक्त राष्ट्र ने क्या किया?

साल 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध ख़त्म होने के बाद दुनिया शांति चाहती थी.

तब 50 देशों के प्रतिनिधियों ने मिलकर एक चार्टर पर हस्ताक्षर किए और एक नई अंतरराष्ट्रीय संस्था की नींव रखी गई, जिसे आज संयुक्त राष्ट्र कहते हैं.

इसके छह अंग हैं, जिनमें से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की ज़िम्मेदारी दुनिया में शांति और सुरक्षा बनाए रखने की है, जिसके लिए वो प्रभावित देशों में पीस कीपिंग फोर्स भेजते हैं.

उम्मीद की गई कि यह संस्था पहले और दूसरे विश्वयुद्ध जैसा कोई तीसरा युद्ध नहीं होने देगी.

लेकिन आज कई अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार इस बात से आगाह कर रहे हैं कि यूक्रेन-रूस का मामला बढ़ा तो तीसरे विश्व युद्ध की तरफ़ ना बढ़ जाए.

संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने सुरक्षा परिषद की बैठक के बाद अपने बयान में कहा, " मैं अपने भाषण की शुरुआत बदलते हुए कहना चाहता हूँ, मानवता के नाम पर अपने सैनिकों को रूस वापस बुला लीजिए. मानवता के लिए ऐसा कुछ शुरू ना करें जो इस सदी की शुरुआत से अब तक का सबसे ख़तरनाक युद्ध साबित हो."

https://news.un.org/en/story/2022/02/1112592

शुक्रवार को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की एक और बैठक प्रस्तावित है जिसमें यूक्रेन पर हमले को लेकर एक प्रस्ताव पारित होने की संभावना है.

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में रूस एक स्थाई सदस्य है और चीन भी इस मामले पर उसका साथ दे सकता है.

ऐसे में पाँच स्थायी सदस्य में दो सदस्य अपनी वीटो पावर का इस्तेमाल कर लें तो प्रस्ताव का कोई महत्व नहीं रह जाता.

इस वजह से सवाल उठ रहे हैं कि क्या इस मामले में संयुक्त राष्ट्र केवल बयान, प्रस्ताव और बैठक ही कर सकता है?

उसके पास दुनिया में शांति बनाए रखने के लिए कोई और पावर नहीं है?

प्रोफ़ेसर हर्ष वी पंत दिल्ली स्थित थिंक टैंक 'ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन' में स्ट्रैटेजिक स्टडीज़ प्रोग्राम' के प्रमुख हैं.

बीबीसी से बातचीत में वो कहते हैं, "संयुक्त राष्ट्र में शांति और सुरक्षा के मुद्दे तभी तक सुलझाए जा सकते हैं जब बात दो कमज़ोर देशों की हो. अगर पाँच स्थाई सदस्य में से एक भी सदस्य पर शांति और सुरक्षा भंग करने का आरोप हो तो इस संस्था के कोई मायने नहीं रह जाते. ये इराक युद्ध के समय भी देखा गया था."

हालांकि हर्ष पंत ये भी जोड़ते हैं कि इराक युद्ध के समय अमेरिका ने रूस जैसे रवैया नहीं अपनाया था.

उस समय सुरक्षा परिषद की कार्यवाही को याद करते हुए वो कहते हैं, "इराक पर हमले के वक़्त अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र में एक प्रेज़ेंटेशन दी थी, बाक़ी सदस्यों को यकीन दिलाने की कोशिश की थी उनका हमला क्यों जायज़ है. लेकिन इस समय रूस ऐसा कुछ करते नहीं दिख रहा."

संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस के बारे में हर्ष पंत कहते हैं, " उन्होंने भी अपनी तरफ़ से कुछ बयान देने के अलावा कुछ नहीं किया. वो चाहते तो प्लेन लेकर मॉस्को जाते, रूसी राष्ट्रपति से मिल कर बात करते. भले ही उससे कुछ हासिल ना होता, लेकिन एक प्रयास करते तो कम से कम दिखते."

इराक युद्ध के दौरान अमेरिका की कार्रवाई को संयुक्त राष्ट्र ने अवैध करार दिया था और संयुक्त राष्ट्र के चार्टर का उल्लंघन बताया था.

http://news.bbc.co.uk/2/hi/middle_east/3661134.stm#:~:text=The%20United%20Nations%20Secretary%2DGeneral,the%20Security%20Council%2C%20not%20unilaterally.

नेटो

यूरोप और उत्तरी अमेरिका में ही शांति बनाए रखने के लिए एक दूसरी संस्था भी बनी थी, जिसे नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइज़ेशन यानी नेटो कहते हैं.

इसका गठन दूसरे विश्व युद्ध के चार साल बाद 1949 में हुआ था.

उस समय दुनिया में दो महाशक्तियाँ हुआ करती थीं - अमेरिका और सोवियत संघ. सदस्य देशों की सोवियत यूनियन से सुरक्षा के मक़सद से ही इसका गठन हुआ था.

शुरुआत में नेटो के अमेरिका और कनाडा समेत 12 सदस्य देश थे . अभी नेटो के कुल 30 देश सदस्य हैं, जिसमें यूक्रेन शामिल नहीं है.

यूक्रेन पर रूस के ताज़ा हमले की एक वजह नेटो का यही विस्तार है.

आर्मीनिया में भारत के राजदूत रह चुके अचल मल्होत्रा कहते हैं, "पुतिन को लगता है कि नेटो का विस्तार और यूक्रेन को नेटो में शामिल करने की कोशिश, रूस को घेरने के लिए हो रही है. रूस इस वजह से दोनों बातों को अपनी सुरक्षा के लिए ख़तरा मानते हैं."

"1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद, माना जा रहा था कि नेटो का कोई औचित्य नहीं रह गया है. सोवियत संघ टूट कर 15 छोटे-छोटे देश में बिखर गया था. ऐसे में रूस का दावा है कि नेटो ने उन्हें भरोसा दिलाया था कि वो अपना आगे विस्तार नहीं करेगा. इस भरोसे का कोई लिखित स्वरूप है या नहीं इस पर लंबे समय से विवाद चल रहा है. लेकिन हक़ीकत ये है कि नेटो का विस्तार हाल तक जारी रहा."

नेटो की आधिकारिक वेबसाइट बताती है कि रोमानिया, बुल्गारिया, स्लोवाकिया, स्लोवेनिया, लात्विया, एस्टोनिया और लिथुआनिया 2004 में नेटो में शामिल हुए. क्रोएशिया और अल्बानिया नेटो में 2009 में शामिल हुए.

https://www.nato.int/nato-welcome/index.html

2008 में यूक्रेन और जॉर्जिया के नेटो में शामिल होने की बात थी, लेकिन ऐसा हो ना सका.

इसका जिक्र करते हुए अचल मल्होत्रा कहते हैं, "साल 1991-2000 के बीच रूस का नेतृत्व पुतिन के मुक़ाबले तुलनात्मक रूप से कमज़ोर था. इसलिए नेटो के विस्तार को वो रोक नहीं पाए. पुतिन के आने के बाद रूस थोड़ा मज़बूत हुआ. 2008 में जब यूक्रेन और जॉर्जिया को नेटो में शामिल होने की बात चली तो पुतिन ने इसका सख़्ती से विरोध किया. पहले रूस ने जॉर्जिया में सैन्य हस्तक्षेप किया और अब यूक्रेन पर हमला किया है."

वो आगे कहते हैं, " नेटो उस वक़्त भी जॉर्जिया के बचाव के लिए सामने नहीं आया था, जबकि जॉर्जिया के संबंध सदस्य देशों से काफ़ी अच्छे थे. इस बार भी नेटो अपने सैनिकों को यूक्रेन भेजने का इरादा नहीं रखता. ये बात साफ़ कर दी गई है. "

दरअसल नेटो के सैनिक तभी इस तरह के युद्ध में जाते हैं जब जंग में उसके सदस्य देश शामिल हों.

ये भी सच है कि नेटो ने यूक्रेन की सैन्य शक्ति बढ़ाने की दिशा में काफ़ी मदद की है.

जानकार ये भी कह रहे हैं कि अगर नेटो ने रूस और यूक्रेन की जंग में यूक्रेन का साथ दिया, तो मामला ज़्यादा बिगड़ सकता है. हालात तीसरे विश्व युद्ध जैसे पहुँच सकते हैं.

नेटो सदस्य देशों की एक बैठक भी आज प्रस्तावित है.

नेटो ने अपने पूर्वी छोर पर 100 लड़ाकू विमानों को अलर्ट पर रखा है.

यूरोपीय संघ

संयुक्त राष्ट्र और नेटो के साथ-साथ यूरोपीय देशों का एक और समूह है, यूरोपीय संघ.

इस समूह के कुल 27 सदस्य हैं, जिनमें से 21 देश, नेटो में भी शामिल हैं.

अमेरिका और ब्रिटेन यूरोपीय संघ के सदस्य नहीं है. जर्मनी, फ्रांस और इटली इसके सदस्य हैं.

रूस यूक्रेन क्राइसिस में इस संघ का ज़िक्र भी काफ़ी बार हो रहा है.

ये सुरक्षा के लिए नहीं बल्कि आर्थिक मदद के लिए बनाया गया मंच है, जो साल 1958 में बना था.

https://european-union.europa.eu/principles-countries-history/history-eu/1945-59_en

यूक्रेन पर हमले के बाद यूरोपीय संघ की तरफ़ से रूस पर काफ़ी बड़े प्रतिबंध लगाए गए हैं. इनमें वित्तीय सेक्टर, ऊर्जा, परिवहन और रूस के शासन से जुड़े अभिजात्य वर्ग के वीज़ा पर भी प्रतिबंध लगाने की बात है.

माना जा रहा है कि प्रतिबंधों के कारण रूस की तेल रिफाइनरी के लिए तकनीक और एयरक्राफ़्ट के लिए स्पेयर पार्ट्स की ख़रीद असंभव हो जाएगी और रूस आर्थिक रूप से दुनिया के दूसरे देशों से कट सकता है.

https://twitter.com/vonderleyen/status/1497021840572796928

वरिष्ठ पत्रकार और 'द हिंदू अख़बार' की कूटनीतिक मामलों की संपादक सुहासिनी हैदर कहती हैं, "ईयू ने रूस पर जो प्रतिबंध लगाएं हैं उसका लक्ष्य है कि रूस को आर्थिक, तकनीकी और सैन्य मदद से दुनिया से काट सकें."

लेकिन सुहासिनी का मानना है कि इन प्रतिबंधों से यूक्रेन समस्या का कोई समाधान नहीं हो सकता है. रूस को भले ही इससे यूरोपीय संघ कमज़ोर करने में सफ़ल हो जाए, लेकिन यूक्रेन में जो क्राइसिस चल रहा है, इन प्रतिबंधों के साथ उसे रोका नहीं जा सकता.

वो कहती हैं, "रूस को पहले 2008 में जॉर्जिया में हमने देखा, बाद में 2014 में क्राइमिया में देखा और 2022 में यूक्रेन में जो हो रहा है, उसे भी देख रहे हैं. इसके आधार पर लगता है कि रूस और यूरोपीय देशों में एक अनसुलझा संकट है जो हर कुछ साल के बाद आता रहेगा. दूसरे विश्व युद्ध के बाद यूरोप में अमन आ गया है, ये घटनाएँ उस सोच को चुनौती देती हैं."

इसके साथ सुहासिनी ये भी जोड़ती हैं कि रूस इस हमले के बाद यूरोपीय देशों की एकता में फूट डालने में कामयाब होता दिख रहा है. इस संघ के सदस्य देश एक दूसरे पर रूस के ख़िलाफ़ ज़्यादा सख़्ती से पेश नहीं आने की बात लगातार कह रहे हैं.

यूरोपीय संघ को अगर आगे अपनी प्रासंगिकता बनाए रखनी है तो रूस से बैर मोल लेकर ऐसा किया जा सकता है ये सोचने वाली बात होगी.

इस बीच फ़्रांस ने यूक्रेन को 33.6 करोड़ डॉलर की आर्थिक मदद और सैन्य उपकरण मुहैया कराने का भरोसा भी जताया है.

लेकिन रूस की सैन्य क्षमता के आगे ये प्रतिबंध और मदद कितने काम के हैं. ये तो वक़्त ही बताएगा.

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