यूक्रेन युद्ध में गाजर-मूली की तरह ध्वस्त हो रहे रूसी टैंक, जेट्स, रूसी हथियार खरीदकर फंस गया भारत?

पिछले एक दशक में भारत ने रूस से हथियारों को खरीदना करीब 30 प्रतिशत तक भले ही कम कर चुका हो, लेकिन अभी भी भारत के सैन्य भंडार में करीब 60 प्रतिशत रक्षा उपकरण रूस निर्मित ही हैं।

कीव/मॉस्को/नई दिल्ली, मार्च 08: यूक्रेन की जंग में दोनों देशों की सेनाओं का भारी नुकसान हो रहा है, लेकिन युद्ध जितने दिनों तक खिंचता जा रहा है, और जिस तरह से यूक्रेनी हथियार ध्वस्त हो रहे है, उसने भारत की चिंताओं को बढ़ाना शुरू कर दिया है। युद्ध में देखने को मिल रहा है, कि अमेरिका की जेवलिन मिसाइलों के जरिए बेहद आसानी से रूसी टैंकों को ध्वस्त किया जा रहा है, तो फिर सवाल ये उठता है कि, भारतीय सेना के पास भी रूसी हथियारों की भरमार है। तो क्या चीन और पाकिस्तान जैसे दुश्मन देशों से घिरे भारत के लिए रूसी हथियारो का गाजर-मूली की तरह तबाह होना... क्या चिंता की बात नहीं है?

रूस से कितना हथियार खरीदता है भारत?

रूस से कितना हथियार खरीदता है भारत?

पिछले एक दशक में भारत ने रूस से हथियारों को खरीदना करीब 30 प्रतिशत तक भले ही कम कर चुका हो, लेकिन अभी भी भारत के सैन्य भंडार में करीब 60 प्रतिशत रक्षा उपकरण रूस निर्मित ही हैं। भारतीय सेना के लिए अभी भी ज्यादातर सैन्य उपकरण रूस से ही मंगाए जाते हैं, लिहाजा भारत की निर्भरता रूस पर बनी हुई है। भारत ने अक्टूबर 2018 में रूस के साथ एस-400 मिसाइल समझौता किया था और ये समझौता करीब 5 अरब डॉलर का किया गया था। दावों के मुताबिक, ये एक हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणाली है, जिसे भारत ने चीन की सीमा के पास तैनात किया है।

कम कीमत पर रक्षा सामान देता है रूस

कम कीमत पर रक्षा सामान देता है रूस

एशिया टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, यूक्रेन युद्ध से पहले, रूसी हथियारों की बिक्री करीब 55 अरब डॉलर की थी। यानि, रूस के पास करीब 55 अरब डॉलर के हथियारों के ऑर्डर थे और रूस के साथ सबसे खास बात ये रही है, कि वो पश्चिमी देशों के मुकाबले रूस कम कीमत पर हथियारों की सप्लाई करता है, लिहाजा रूसी हथियारों को खरीदना सस्ता पड़ता है। खासकर एस-400 जैसे हथियार, अपने प्रतिद्वंदियों के मुकाबले काफी आगे भी है, लेकिन यूक्रेन युद्ध के बाद अब हालात तेजी से बदल रहे हैं और अब आशंका है कि, तमाम वैश्विक प्रतिबंधों के बाद अब ज्यादातर देश रूस से हथियार खरीदना बंद कर सकते हैं और रूसी हथियारों की सप्लाई ज़ीरो तक पहुंच सकती है और भारत की परेशानी भी यहीं से शुरू हो सकता है।

आर्मीनिया में ‘कुचले’ गये रूसी हथियार

आर्मीनिया में ‘कुचले’ गये रूसी हथियार

यूक्रेन युद्ध से पहले दिलचस्प बात यह है, अजरबैजान और आर्मीनिया के बीच दो साल पहले हुए जंग में आर्मीनिया की सेना को बुरी तरह से हार मिली थी और आर्मीनिया को भी हथियारों की सप्लाई रूस ही करता है। युद्ध मे अजरबैजान ने आर्मीनिया के हथियारों को बुरी तरह से ध्वस्त किया था। सबसे दिलचस्प बात ये थी... कि आर्मीनिया की सेना को जहां रूस ने ही सैन्य सामानों की सप्लाई की थी, वहीं अजबैजान की सेना को रूस के साथ साथ इजरायल और तुर्की से भी हथियारों की सप्लाई हो रही थी। लिहाजा, आर्मीनिया की हार की जिम्मेदारी लेने से रूस बच गया था। लेकिन, पूरी दुनिया ने देखा, कि अजरबैजान की हाइब्रिड फोर्स ने आर्मीनिया के हथियारों को किस तरह से नेस्तनाबूद कर दिया था। नगर्नो काराबाख की जंग में तुर्की और इजरायल के दिए हुए हथियारों ने आर्मीनिया के रूसी एयर डिफेंस सिस्टम के साथ साथ रूसी रेडॉर और मिसाइल लॉन्चर को ध्वस्त कर दिया था। लिहाजा, इजरायली और तुर्की के हथियारों के सामने रूसी हथियारों की बड़ी कमजोरी का खुलासा हो गया।

आर्मीनिया से भी नहीं सीख पाया रूस?

आर्मीनिया में रूसी हथियारों की जो दुर्गती हुई, उसे देखते हुए भी रूस ने कोई सीख नहीं सीखा। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, रूस को को नागोर्नो-कराबाख की जंग से निश्चित रूप से सीखना चाहिए था और यूक्रेन में अपने आक्रमण बलों में ड्रोन और घुसपैठ करने वाले हथियारों के खिलाफ सुरक्षा की आवश्यकता को पहचाना चाहिए था। लेकिन, रूस ने सबक नहीं सीखा। यूक्रेन युद्ध में रूस को अब अपनी गलती बुरी तरह से भारी पड़ रही है। यूक्रेनी सेना तुर्की के दिए ड्रोन से रूसी सेना के हथियारों को तबाह कर रहे हैं। अभी भी यूक्रेन के पास काफी ड्रोन बचे हुए हैं और रूसी सेना में भारी तबाही मचा रहे हैं। वहीं, रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान ने भी तुर्की से टीबी-2 ड्रोन खरीदने का फैसला किया है। लिहाजा, वक्त रहते भारत को सतर्क रहने की जरूरत है।

यूक्रेन युद्ध में तबाह हो रहे रूसी टैंक

यूक्रेन युद्ध में तबाह हो रहे रूसी टैंक

यूक्रेन युद्घ में सबूतों के साथ पता चला है कि, रूस के आधुनिक टी-72एस टैंक भी यूक्रेन में ज्यादा तबाही मचा नहीं पा रहे हैं और अमेरिका के जेवलिन और ब्रिटेन में निर्मित एनएलएडब्ल्यू मिसाइलों के जरिए रूसी टी-72एस टैंकों को भारी संख्या में बर्बाद किया जा रहा है। वहीं, तुर्की में निर्मित बायरकतार ड्रोन ने भी रूस के बीयूके मिसाइल सिस्टमों को बड़ी संख्या में ध्वस्त किया है। लिहाजा, जिन देशों में रूसी टैकों को ज्यादा संख्या में खरीदा है, उन देशों के लिए बड़ा सिरदर्द पैदा हो गया है और भारत के लिए यहां पर सबसे ज्यादा सोचने की बात है, क्योंकि भारतीय सेना के पास करीब 2000 की संख्या में टी-72एस टैंक हैं।

यूक्रेन युद्ध मे रूसी दावे हवाई-हवाई

यूक्रेन युद्ध मे रूसी दावे हवाई-हवाई

इतना ही नहीं, डिफेंस सिस्टम को लेकर भी अब तक रूस बड़े-बड़े दावे करता आया है। रिपोर्ट के मुताबिक, रूस ने दावा किया था कि, उसके पास ARENA-M नाम का एक्टिव डिफेंस सिस्टम है और उसकी क्षमता इजरायल और अमेरिका में बने डिफेंस सिस्टम बराबर है। लेकिन, यूक्रेन युद्ध में रूसी दावे की पोल खुल गई है। अमेरिका और ब्रिटेन की तरफ से यूक्रेन को हजारों की तादाद में एंटी टैंक मिसाइल सिस्टम मिले हैं और उनके सामने रूसी डिफेंस सिस्टम फेल साबित हो रहे हैं। इसके साथ ही यूक्रेन युद्ध में रूसी वायुसेना का भी बुरा हाल हो चुका है और स्टिंगर मिसाइलों के सामने रूसी वायुसेना की हालत पतली हो चुकी है। कंधे पर रखकर चलाई जाने वाली स्टिंगर मिसाइलों ने काफी संख्या में रूसी विमानों को मार गिराए हैं। यूक्रेन युद्ध में देखा जा रहा है कि, रूस के सुखोई और मिग विमानों को यूक्रेनी सेना काफी आसानी के साथ अपने स्टिंगर मिसाइलों से नेस्तनाबूत कर रही है। यूक्नेन की सेना का एक आम जवान, अपने कंधे पर स्टिंगर मिसाइल के जरिए रूसी विमानों को उड़ा रहा है और इसे देखते हुए अमेरिका ने भारी संख्या में स्टिंगर मिसाइलों की सप्लाई यूक्रेन को करने का फैसला किया है।

भारत ने कितने रुपये के हथियार खरीदे?

भारत ने कितने रुपये के हथियार खरीदे?

रूस के मुकाबले बेहद कमजोर माने जाने वाले यूक्रेन ने जिस तरीके से रूसी सेना को पानी पिलाई है, उससे भारतीय रक्षा विशेषज्ञों के कान खड़े हो गये हैं, क्योंकि भारत ने अभी तक करीब 70 अरब डॉलर के हथियार रूस से खरीदे हैं। भारत ने पिछले साल ही रूस के साथ एक-203 असॉल्ट राइफल खरीदने के लिए रूसी हथियार कंपनी के साथ सौदा किया है और दोनों देशों के बीच ये करार 5 हजार करोड़ का है। रूसी कंपनी ने भारत के उत्तर प्रदेश में फैक्ट्री बनाकर 70 हजार राइफल बनाने का कॉन्ट्रैक्ट किया है।

भारतीय नौसेना के साथ समझौता

भारतीय नौसेना के साथ समझौता

भारत सरकार ने अपनी नौसेना को मजबूत करने के लिए रूस के साथ न्यूक्लियर एनर्जी के साथ चलने वाली परमाणु पनडुब्बियों का समझौता किया था। ये समझौता 3 अरब डॉलर का किया गया था और भारत रूसी परमाणु पनडुब्बी को हिंद महासागर की सुरक्षा में तैनात करना चाहता है, ताकि भविष्य में चीन के खिलाफ रक्षा कवच तैयार किया जा सके। इसके साथ ही भारत को रूस से साल 2025 तक चक्र-3, अकुला क्लास की पनडुब्बी मिलने की उम्मीद है। रूस इन्हें 10 सालों के लिए भारत को सौंपेगा। भारत सरकार ने इन पनडुब्बियों को रूस से लीज पर 10 सालों के लिए लिया है। इसके साथ ही भारत सरकार ने अपनी नौसेना की मजबूती के लिए रूस के साथ चार युद्धपोत खरीदने का भी करार किया हुआ है। वहीं, एक अरब डॉलर की लागत से भारत रूस से दो फ्रिगेट्स भी खरीद रहा है, जिसका निर्माण फिलहाल रूस में किया जा रहा है।

भारतीय वायुसेना पर रूस पर निर्भर

भारतीय वायुसेना पर रूस पर निर्भर

सिर्फ थल सेना या फिर नौसेना ही नहीं, भारतीय वायुसेना भी बहुत हद तक रूस पर ही निर्भर है। साल 2020 में, जब भारत और चीन के बीच लद्दाख में स्थिति काफी तनावपूर्ण थी, उस वक्त भारत सरकार ने रूस के साथ 18 हजार 148 करोड़ रुपये में 12 सुखोई-30 विमान, 21 मिग-29 लड़ाकू विमानों की खरीद को मंजूरी दी थी। इंडियन एयरफोर्स के लिए सुखोई और मिग लड़ाकू विमान काफी महत्वपूर्ण हैं। हालांकि, तीन दिन पहले अमेरिका ने दावा किया है कि, भारत ने रूस से मिग-29 खरीदने का करार रद्द कर दिया है, जिसका खंडन अभी तक भारत ने नहीं किया है।

भारत के लिए खतरनाक पाकिस्तान और चीन

भारत के लिए खतरनाक पाकिस्तान और चीन

रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2021 तक रूस ने 70 अरब डॉलर से ज्यादा के हथियार भारत को बेचे हैं, लेकिन यूक्रेन युद्ध में जिस तरह से रूसी विमान धाराशाई हो रहे हैं, उसने भारत की चिंता को जरूर बढ़ा दिया है। क्योंकि, पाकिस्तानी एयरफोर्स के पास भारी संख्या में अमेरिकी स्टिंगर मिसाइल हैं, जिसका इस्तेमाल अभी यूक्रेन कर रहा है। वहीं, चीन के पास भी ऐसी ऐसी घातक मिसाइलों की भरमार है, जो भारतीय सुखोई के लिए गंभीर खतरा बन सकती हैं। हालांकि, भारत ने फ्रांस से 36 राफेल विमान भी खरीदे हैं, लेकिन यूक्रेन युद्ध के बाद वक्त रहते भारत सरकार को देश की सुरक्षा के बारे में नये सिरे से सोचने की जरूर जरूर आ गई है, ताकि युद्ध की स्थिति में हम दुश्मनों के सामने बेबस नजर नहीं आएं, क्योंकि रूस का दुश्मन भले ही कमजोर है, लेकिन हमारा दुश्मन नहीं।

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