चांद पर बिजली बनाने के लिए ऐतिहासिक कदम, न्यूक्लियर प्लांट बनाएगी रोल्स-रॉयस, जानिए क्या है प्रोजेक्ट?
चंद्रमा को लेकर दुनिया में कई मिशन चलाए जा रहे हैं। वहीं, अमेरिका करीब 50 सालों के बाद एक बार फिर से चंद्रमा पर इंसानों को भेजने की तैयारी कर रहा है। लिहाजा, भविष्य के मिशनों के लिए निर्बाध बिजली की जरूरत होगी।

Rolls-Royce Moon Project: चंद्रमा को लेकर दुनियाभर के वैज्ञानिक कई मिशन चला रहे हैं, जिनमें एक मिशन ये भी है, कि चंद्रमा पर एक ऐसे बेस कैंप का निर्माण किया जाए, जहां से मंगल ग्रह के लिए भविष्य में उड़ान भरना संभव हो सके। अमेरिका और चीन के साथ साथ भारत, ब्रिटेन, जापान और रूस की अंतरिक्ष एजेंसियां भी चंद्रमा को लेकर कई असंभव से दिखने वाले प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे हैं। इन्हीं प्रोजेक्ट्स में से एक प्रोजेक्ट है, चंद्रमा के ऊपर बिजली तैयार करना। ताकि आने वाले समय में अंतरिक्षयात्री चंद्रमा से ही कई तरह के अन्य मिशन पर काम कर सकें। बिजली तैयार करने के लिए वैज्ञानिकों ने चंद्रमा की सतह पर न्यूक्लियर रिएक्टर बनाने की योजना तैयार की है और इस काम को अंजाम तक पहुंचाने की जिम्मेदारी ब्रिटेन स्थिति कंपनी रोल्स-रॉयस को दी गई है।

चंद्रमा पर परमाणु रिएक्टर भेजने की तैयारी
यूके स्पेस एजेंसी ने शुक्रवार को कहा है, कि वो रोल्स-रॉयस के चंद्रमा के लिए परमाणु रिएक्टर प्रोजेक्ट का समर्थन करेगी, क्योंकि चंद्रमा पर परमाणु ऊर्जा की जरूरत है। यूके की सरकारी स्पेस एजेंसी ने कहा है, कि रोल्स-रॉयस के शोधकर्ता एक माइक्रो-रिएक्टर कार्यक्रम पर काम कर रहे है, और ये कार्यक्रम अगर सफल होता है, तो ये "टेक्नोलॉजी मनुष्यों को रहने और चंद्रमा पर काम करने के लिए आवश्यक शक्ति प्रदान करेगी।" रिपोर्ट के मुताबिक, रोल्स-रॉयस के इस न्यूक्लियर प्रोजेक्ट के जरिए चंद्रमा के बेस से न्यूक्लियर शक्ति को उत्पन्न किया जाएगा और फिलहाल तय प्रोजेक्ट के मुताबिक, साल 2029 तक चंद्रमा पर न्यूक्लियर रिएक्टर भेजने की तैयारी की जा रही है।
चांद पर बनाया जाएगा परमाणु ऊर्जा बेस
यूके स्पेस एजेंसी ने इस परियोजना के लिए 2.9 मिलियन पाउंड (लगभग 3.52 मिलियन डॉलर) का पैकेज देने की घोषणा की है। स्पेस एजेंसी के इस फंड से चांद पर परमाणु रिएक्टर स्थापित करने को लेकर जो भी मिशन होंगे, उन्हें सपोर्ट किया जाएगा। आपको बता दें, कि चांद पर परमाणु ऊर्जा तैयार करने के लिए पिछले साल भी यूके स्पेस एजेंसी ने 2 लाख 49 हजार पाउंड का एक बजट जारी किया था। यूके स्पेस एजेंसी की तरफ से जारी बयान में कहा गया है, कि "सभी तरह से स्पेस मिशन किसी ना किसी पावर सोर्स पर निर्भर करते हैं, ताकि कम्युनिकेशन मिशन, मिशन में शामिल इंसान और वैज्ञानिक खोजों को जारी रखा जा सके।" यूके स्पेस एजेंसी ने कहा, कि "परमाणु ऊर्जा के जरिए भविष्य के चंद्र मिशनों की अवधि और उनके वैज्ञानिक मूल्य को नाटकीय रूप से बढ़ाने की क्षमता हासिल हो सकती है।"

रोल्स-रॉयस को कई संगठनों का साथ
रोल्स-रॉयस अपने इस प्रोजेक्ट पर कई और संगठनों के साथ मिलकर काम करेगा, जिनमें शेफील्ड विश्वविद्यालय के एडवांस्ड मैन्यूफैक्चरिंग रिसर्च सेंटर, न्यूक्लियर एएमआरसी और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय शामिल हैं। वहीं, यूके स्पेस एजेंसी के CEO पॉल बेट ने कहा, कि "स्पेस न्यूक्लियर पॉवर का विकास नवीन तकनीकों का समर्थन करने और हमारे परमाणु, विज्ञान और अंतरिक्ष इंजीनियरिंग इनोवेशन के बेस को विकसित करने का एक अनूठा अवसर प्रदान करता है।" बाटे ने कहा, कि "रोल्स-रॉयस का रिसर्च "चंद्रमा पर इंसानों को लगातार रहने की शक्ति प्रदान करेगा और साइंस को इस स्तर पर पहुंचा सकता है, जहां से कई तरह के और अंतरिक्ष कार्यक्रम चलाए जा सकते हैं और यूके के अंतरिक्ष सेक्टर को इससे जबरदस्त फायदा होगा, नई नौकरियां पैदा होंगी और इससे इन्वेस्टमेंट भी पैदा होगा।"
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कैसा होगा चंद्रमा का न्यूक्लियर रिएक्टर?
चंद्रमा के आधार पर जिस न्यूक्लियर रिएक्टर का निर्माण किया जाएगा, वो न्यूक्लियर रिएक्टर, धरती पर बनाए गये रिएक्टर्स की तुलना में छोटा होगा, और चंद्रमा पर रहकर रिसर्च करने वाले वैज्ञानिकों को लगातार पॉवर की सप्लाई करेगा। कंपनी की तरफ से जारी बयान में कहा गया है, कि इस न्यूक्लियर रिएक्टर के ऊपर चंद्रमा के पर्यावरण और पारिस्थितिक तंत्र का प्रभाव नहीं पड़ेगा और हर वक्त ये ऊर्जा जेनरेट करने में सक्षम होगा। इंग्लैंड के लीसेस्टर में नेशनल स्पेस एजेंसी के अंतरिक्ष विशेषज्ञ धरा पटेल ने सीएनबीसी को बताया, कि चंद्रमा पर जाने वाले मनुष्यों को "एक विश्वसनीय शक्ति स्रोत" की जरूरत होगी, ताकि अंतरिक्ष यात्री "लंबे समय तक मिशन के लिए चंद्रमा पर रह सकें और काम कर सकें।" उन्होंने कहा, कि "सौर ऊर्जा निश्चित तौर पर सबका पसंदीदा है, लेकिन दिक्कत ये है, कि चंद्रमा के घूमने की वजह से वहां दो हफ्ते तक दिन तो दो हफ्तों कर रात रहती है और रात होने की स्थिति में सौर ऊर्जा काम नहीं करेगा।" वहीं, चंद्रमा पर पानी और हवा नहीं होने की वजह से चंद्रमा पर दूसरे तरह की ऊर्जा को उत्पन्न नहीं किया जा सकता है। उन्होंने कहा, कि चंद्रमा पर अगर परमाणु ऊर्जा प्रोजेक्ट कामयाब हो जाता है, तो फिर चंद्रमा के मिशन का जीवनकाल बढ़ जाएगा।












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