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UK ने चागोस द्वीपसमूह की संप्रभुता मॉरीशस को सौंपी, भारत और US ने समझौते का किया स्वागत

UK Chagos Islands Hands Over Mauritius: ब्रिटेन ने चागोस द्वीपसमूह की संप्रभुता मॉरीशस को सौंपने का फैसला लिया है। इस समझौते के तहत ब्रिटिश-अमेरिकी सैन्य अड्डा डिएगो गार्सिया (Diego Garcia Airbase) का भविष्य सुरक्षित रहेगा। यह अड्डा हिंद महासागर में स्थित एक महत्वपूर्ण सामरिक ठिकाना है, जिसका इस्तेमाल अमेरिकी और ब्रिटिश सेनाओं द्वारा किया जाता है।

इस कदम से चागोस द्वीपसमूह के इतिहास में एक नए अध्याय की शुरुआत होती है, और लंबे समय से विस्थापित चागोस निवासियों के लिए संभावित पुनर्वास का रास्ता खुलता है।

UK Mauritius Chagos Islands Agreement

डिएगो गार्सिया का महत्व और समझौते की शर्तें
इस समझौते के तहत, डिएगो गार्सिया सैन्य अड्डा कम से कम 99 सालों तक ब्रिटेन और अमेरिका के अधिकार में बना रहेगा। यह फैसला न केवल ब्रिटेन और मॉरीशस के बीच विवादित संप्रभुता को सुलझाता है, बल्कि अमेरिका और वैश्विक सुरक्षा के लिए इस अड्डे की महत्ता को भी बनाए रखता है। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने इस समझौते की सराहना करते हुए इसे "हिंद महासागर में रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण एयरबेस के प्रभावी संचालन की गारंटी" बताया।

ब्रिटेन के विदेश मंत्री डेविड लैमी ने कहा कि यह समझौता ब्रिटेन और मॉरीशस के बीच दशकों से चले आ रहे विवाद को सुलझाने में मदद करेगा, जबकि डिएगो गार्सिया की सामरिक भूमिका को भी सुरक्षित रखेगा, जो इराक और अफगानिस्तान संघर्षों के दौरान महत्वपूर्ण साबित हुई थी।

UK- मॉरीशस समझौते का भारत ने किया स्वागत
वहीं, भारत के विदेश मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि हम डिएगो गार्सिया सहित चागोस द्वीपसमूह पर मॉरीशस की संप्रभुता की वापसी पर यूनाइटेड किंगडम और मॉरीशस के बीच हुए समझौते का स्वागत करते हैं। यह महत्वपूर्ण समझ मॉरीशस के विउपनिवेशीकरण को पूरा करती है। दो साल की बातचीत के बाद, अंतर्राष्ट्रीय कानून के अनुपालन में, लंबे समय से चले आ रहे चागोस विवाद का समाधान एक स्वागत योग्य विकास है।

आलोचनाएं और विस्थापितों की चिंता
हालांकि, यह समझौता कई अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया है, ब्रिटेन में इसे आलोचना का भी सामना करना पड़ा है। कुछ लोगों का मानना है कि यह चीन के साथ मॉरीशस के घनिष्ठ व्यापारिक संबंधों को देखते हुए, चीन के हाथों में खेलने जैसा है। ब्रिटेन स्थित प्रवासी समूह चागोसियन वॉयसेज ने इस समझौते की आलोचना करते हुए कहा कि चागोसवासी इस वार्ता से बाहर रखे गए हैं, और उनके भविष्य के बारे में कोई स्पष्टता नहीं दी गई है।

समूह ने फेसबुक पर बयान जारी करते हुए कहा, चागोसवासी अपने और अपनी मातृभूमि के भविष्य का निर्धारण करने में शक्तिहीन और निःशब्द हैं।" दूसरी ओर, मॉरीशस के प्रधानमंत्री प्रविंद जगन्नाथ ने इस समझौते को "उपनिवेशवाद का अंत" बताते हुए कहा कि यह मॉरीशस के संप्रभुता को बहाल करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया पर एक नजर

अंतरराष्ट्रीय समुदाय, खासकर संयुक्त राज्य अमेरिका और भारत, ने इस समझौते का समर्थन किया है। भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी पहले मॉरीशस के चागोस पर दावे का समर्थन किया था। समझौते के तहत मॉरीशस डिएगो गार्सिया के अलावा अन्य द्वीपों पर पुनर्वास कार्यक्रम लागू कर सकता है, हालांकि इसकी शर्तें पोर्ट लुइस द्वारा तय की जाएंगी।

हालांकि, ब्रिटेन की विपक्षी कंजर्वेटिव पार्टी ने इस समझौते पर सवाल उठाए हैं। कंजर्वेटिव नेता टॉम टुगेन्डाट और रॉबर्ट जेनरिक ने इसे ब्रिटेन के लिए कमजोर स्थिति माना है। टुगेन्डाट ने चेतावनी दी कि इस समझौते से चीन को हिंद महासागर में सैन्य उपस्थिति बढ़ाने का अवसर मिल सकता है।

यह समझौता चागोस द्वीपसमूह पर लंबे समय से चल रहे विवाद का एक महत्वपूर्ण समाधान प्रदान करता है, जिसमें मॉरीशस की संप्रभुता को मान्यता दी गई है, और साथ ही डिएगो गार्सिया की रणनीतिक भूमिका को बनाए रखा गया है। हालांकि, चागोस निवासियों के पुनर्वास और चीन के संभावित प्रभाव जैसे मुद्दे अभी भी चर्चा में बने हुए हैं। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह समझौता क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा पर क्या प्रभाव डालता है।

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