सऊदी-UAE में छिड़ गई जंग? बमबारी के बाद यूएई ने किया पूर्ण सैन्य वापसी का ऐलान, क्या भारत पर होगा असर?
यमन के मुकल्ला बंदरगाह पर सऊदी अरब द्वारा की गई अचानक बमबारी ने खाड़ी देशों के बीच दशकों पुराने सामरिक गठबंधन में दरार डाल दी है। सऊदी अरब के इस आक्रामक रुख के जवाब में संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने यमन से अपने सभी शेष सैन्य बलों को तत्काल प्रभाव से वापस बुलाने का ऐतिहासिक फैसला लिया है।
यह घटनाक्रम न केवल यमन युद्ध की दिशा बदल सकता है, बल्कि मध्य-पूर्व के शक्ति संतुलन को भी नए सिरे से परिभाषित करने वाला साबित हो रहा है।

मुकल्ला पोर्ट पर हवाई हमला
मंगलवार को यूएई के फुजैरा से एक समुद्री जहाज यमन के मुकल्ला बंदरगाह पहुंचा। सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने यह दावा करते हुए बंदरगाह पर बमबारी कर दी कि इस शिपमेंट में 'साउदर्न ट्रांजिशनल काउंसिल' (STC) के लिए भारी मात्रा में हथियार भेजे गए थे।
हालांकि, यूएई ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे एक 'बड़ी गलतफहमी' करार दिया है। यूएई का कहना है कि उस जहाज में केवल वहां तैनात अमीराती सेना के उपयोग के लिए वाहन थे, न कि किसी विद्रोही गुट के लिए हथियार।
UAE का सख्त जवाब: 'अपनी मर्जी से हटेंगे पीछे'
सऊदी अरब की इस कार्रवाई पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए यूएई के रक्षा मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि वह अब अपनी सेना को यमन में और अधिक समय तक रखने का इच्छुक नहीं है। मंत्रालय ने अपने बयान में कहा कि 2019 में मुख्य मिशन पूरा होने के बाद केवल आतंकवाद-विरोधी दस्ते वहां तैनात थे, जिन्हें अब सुरक्षा और सामरिक कारणों से पूरी तरह वापस बुलाया जा रहा है। यूएई ने साफ शब्दों में कहा कि यमन के राजनीतिक भविष्य का फैसला वहां की जनता को खुद करना चाहिए।
यह पूरा विवाद यमन के संसाधन संपन्न इलाकों-हद्रामौत और महरा-पर नियंत्रण को लेकर है। सऊदी अरब जहां यमन की आधिकारिक सरकार और स्थानीय कबायली गुटों का समर्थन कर रहा है, वहीं यूएई समर्थित 'साउदर्न ट्रांजिशनल काउंसिल' (STC) दक्षिण यमन में अपनी स्वतंत्र सत्ता चाहती है। हाल के दिनों में STC ने कई तेल ठिकानों और महत्वपूर्ण प्रांतों पर कब्जा जमाया है, जिसे सऊदी अरब अपने प्रभाव क्षेत्र में बड़ी सेंध मान रहा है।
भविष्य की चुनौतियां और रणनीतिक असर
जानकारों का मानना है कि सऊदी अरब के हवाई हमले अलगाववादियों के लिए एक खुली चेतावनी थे, लेकिन इसका परिणाम दोनों देशों के संबंधों में कड़वाहट के रूप में सामने आया है। यूएई की वापसी से क्षेत्र में अल-कायदा और अन्य आतंकवादी समूहों के खिलाफ चल रहे अंतरराष्ट्रीय अभियानों पर गहरा असर पड़ सकता है। यह तनाव ऐसे समय में आया है जब यमन में शांति वार्ता की कोशिशें जारी थीं, लेकिन इस सैन्य गतिरोध ने पूरी प्रक्रिया को अधर में लटका दिया है।
सहयोग से संघर्ष तक की कहानी
- बदले समीकरण: कभी ईरान समर्थित हूतियों के खिलाफ एकजुट रहने वाले सऊदी अरब और UAE के रास्ते अब यमन में पूरी तरह अलग हो चुके हैं।
- सऊदी का विजन: रियाद यमन की आधिकारिक सरकार का पक्षधर है और अपनी सीमाओं की सुरक्षा के लिए यमन की अखंडता को अनिवार्य मानता है।
- UAE की रणनीति: अबू धाबी ने दक्षिणी अलगाववादियों (STC) का हाथ थामा है, जो यमन के विभाजन और स्वशासन की मांग कर रहे हैं।
- टकराव की वजह: सऊदी अरब को अंदेशा है कि UAE अलगाववादियों को बढ़ावा देकर उसकी सीमा पर अस्थिरता पैदा कर रहा है और यमन को तोड़ने की कोशिश में है।
भारत की चिंता: तेल से लेकर कॉरिडोर तक पर संकट
- तेल की मार: भारत 85% तेल आयात करता है। दोनों देशों के झगड़े से तेल उत्पादन प्रभावित होगा, जिससे भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें आसमान छू सकती हैं।
- प्रवासियों पर खतरा: खाड़ी में करीब 60-65 लाख भारतीय रहते हैं। तनाव बढ़ा तो वहां काम कर रहे भारतीयों की नौकरियों और उनके द्वारा भेजे जाने वाले विदेशी मुद्रा भंडार पर सीधा संकट आएगा।
- डिप्लोमैटिक परीक्षा: भारत के दोनों देशों के साथ गहरे रिश्ते हैं। किसी एक का पक्ष लेना भारत के लिए 'इधर कुआं, उधर खाई' जैसी स्थिति पैदा कर सकता है।
- ड्रीम प्रोजेक्ट्स पर ब्रेक: भारत-मिडिल ईस्ट इकोनॉमिक कॉरिडोर (IMEC) इन दोनों देशों के रास्ते ही गुजरना है। आपसी कलह से यह महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट ठंडे बस्ते में जा सकता है।
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