तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन ने ओडिशा ट्रेन हादसे पर जताया शोक, 10 दिन पहले ही फिर जीते हैं चुनाव

Turkey on India train Accident: तुर्की ने हमेशा से पाकिस्तान का साथ दिया है और पीएम बनने के बाद जहां पीएम मोदी एक बार भी तुर्की नहीं गये हैं, वहीं तुर्की के राष्ट्रपति ने मोदी शासन में एक बार भारत का दौरा किया है।

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India-Turkey: रविवार की रात लगभग 10.40 बजे भयानक दुर्घटना के लगभग 50 घंटे बाद बालासोर दुर्घटनास्थल पर राहत और बचाव कार्य करीब करीब खत्म हो गया है और ट्रेनों की आवाजाही फिर से शुरू हो गई है।

तीन ट्रेनों के बीच हुए इस भीषण टक्कर में करीब 280 लोग मारे गये हैं और बताया जा रहा है, कि करीब 800 लोग घायल हुए हैं। इस ट्रेन हादसे को लेकर दुनियाभर के नेताओं ने अपने शोक संदेश भेजे हैं, जिसमें अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन, पाकिस्तान समेत दर्जनों देश हैं, जिन्होंने इस हादसे को लेकर अपनी संवेदना जताई है।

वहीं, इस ट्रेन हादले के करीब 50 घंटे बीतने के बाद तुर्की में फिर से राष्ट्रपति बनने वाले रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने भी भारत को अपना शोक संदेश भेजा है।

पिछले 20 सालों से ज्यादा वक्त से तुर्की की राजनीति को नियंत्रित करने वाले अर्दोआन ने ओडिशा ट्रेन हादसे को लेकर ट्वीट करते हुए लिखा है, कि "मैं अपनी और अपने देश की तरफ से, भारत के ओडिशा में रेल दुर्घटना में जान गंवाने वालों के परिवारों के प्रति, भारत की जनता और सरकार के प्रति अपनी संवेदना व्यक्त करता हूं और घायलों के शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की कामना करता हूं।"

तुर्की-भारत में सुधरेंगे संबंध

तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन ने देर से ही सही, लेकिन अपना शोक संदेश भारत को भेजा है, जबकि उनके फिर से राष्ट्रपति चुनाव जीतने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, बधाई संदेश भेजने वाले अग्रिम नेताओं में से एक थे।

आपको बता दें, कि तुर्की में इस साल दूसरे चरण के मतदान के बाद रेचेप तैय्यप अर्दोआन को पूर्ण बहुमत मिला है और वो फिर से तुर्की के राष्ट्रपति बन गये हैं। एक्सपर्ट्स का कहना था, कि अगर अर्दोआन हार जाते, तो भारत और तुर्की के संबंध फिर से बेहतर हो सकते थे, लेकिन अर्दोआन के जीतने के बाद अब इसकी संभावना नगण्य हो गई हैं।

एक्सपर्ट्स का कहना है, कि राष्ट्रपति अर्दोआन अपने इस कार्यकाल में अपने इस्लामिक खिलाफत के एजेंडे को तेजी से आगे बढ़ाने की कोशिश करेंगे, जिससे वैश्विक टकराव बढ़ सकता है और भारत, जिसके साथ तुर्की के संबंध खराब करने में अर्दोआन ने अहम भूमिका निभाई है, उनके इस कार्यकाल में भी संबंधों में मधुरता की उम्मीद नहीं की जा सकती है।

दूसरे राउंड का चुनाव 28 मई को हुआ, जिसमें अर्दोआन को 52.16 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि उनके प्रतिद्वंदी कमाल कलचदारलू को 47.84 प्रतिशत वोट मिले थे। जिसका मतलब ये हुआ, कि देश की करीब करीब आधी आबादी ने अर्दोआन के खिलाफ मतदान किया था और उन्हें अर्दोआन के अधिनायकवादी शासन पद्धति रास नहीं आई है, लेकिन ऐसा होने के बाद भी अर्दोआन की नीति में कोई परिवर्तन आने की संभावना नहीं है और माना जा रहा है, कि कश्मीर को लेकर वो पाकिस्तान का पक्ष लेते रहेंगे।

भारत के पूर्व राजनयिक अशोक सज्जनहर, जो कजाकिस्तान, स्वीडन में भारत के राजदूत रह चुके हैं, उनका मानना है, कि अर्दोआन का जीतना, भारत के लिहाज से सही नहीं है। उन्होंने वन इंडिया हिन्दी से एक्सक्लूसिव बातचीत में कहा, कि "अर्दोआन का जीतना सिर्फ भारत के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए सही नहीं है"।

सलाम-नमस्ते तक ही रहेंगे भारत-तुर्की के संबंध

अर्दोआन इतिहास के एक ऐसे व्यक्ति हैं, जिन्होंने सत्ता का कंट्रोल नागरिकों के सहयोग से अपने हाथों में रखा है और लोकतांत्रिक व्यवस्था होने के बाद भी उन्हें जनता से समर्थन ही मिला है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में रहकर उन्होंने अपने देश में एक तानाशाही व्यवस्था कायम की है, जो देश की एक बड़ी आबादी को कबूल है।

वहीं, भारत के पूर्व राजदूत जेके त्रिपाठी ने वन इंडिया हिन्दी से कहा, कि "अर्दोआन कट्टर इस्लामवादी नेता हैं और उनके कार्यकाल में तुर्की लिबरल देस से कट्टरवादी देश बनकर उभरा है, जो भारत के लिए सही नहीं रहा है"।

उन्होंने कहा, कि "तुर्की में आए भूकंप में भारत सबसे पहले सहायता पहुंचाने वाले देशों में से एक था, फिर भी जेनेवा में ह्यूमन राइट्स की बैठक में तुर्की ने पाकिस्तान का पक्ष लिया है, अर्दोआन भारत के लिए कृतघ्न किस्म के नेता रहे हैं, लिहाजा अगर अर्दोआन का जीतना भारत के लिए नुकसान दायक ही रहेगा"।

हालांकि, जियो पॉलिटिक्स में ऊंट कब किस करवट बैठता है, कहा नहीं जा सकता है और पाकिस्तान जिस आर्थिक संकट से गुजर रहा है, उसे देखते हुए, बहुत संभव है, कि तुर्की पाकिस्तान से अपना मुंह फेर ले और भारत से संबंधों को फिर से सुधारने की कोशिश करे।

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