अर्दोआन गरजकर बरसे क्यों नहीं? पीछे खींचे अपने क़दम

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तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने पिछले हफ़्ते जब अमेरिका समेत 10 देशों के राजदूतों को निष्कासित करने की घोषणा की थी तो इसे बहुत बड़े फ़ैसले के तौर पर देखा गया था.

कहा जा रहा था कि अर्दोआन ने टकराव का रास्ता चुना है और यह बैकफ़ायर करेगा. अर्दोआन ने अपने विदेश मंत्रालय को आदेश दिया था कि वो दसों देशों के राजदूतों को जल्दी वापस भेजे. लेकिन तुर्की का विदेश मंत्रालय कोई बीच का रास्ता निकालने में लगा था.

अर्दोआन ने कहा था कि अमेरिका, जर्मनी, फ़्रांस और सात अन्य यूरोपीय देशों ने तुर्की के एक्टिविस्ट ओस्मान कवाला को जेल से रिहा करने को लेकर संयुक्त बयान जारी कर तुर्की का अपमान किया है.

लेकिन अब तुर्की का कहना है कि इन 10 देशों ने राजनयिक संबंधों में वियना कन्वेंशन को लेकर सार्वजनिक रूप से प्रतिबद्धता जताई है. इसलिए अब निष्कासन का फ़ैसला वापस लिया जाता है.

तुर्की अमेरिका और यूरोप से अपने संबंधों को लेकर सबसे बुरे दौर में है और उसकी मुद्रा लीरा भी लगातार लुढ़कती जा रही है. इसी बीच अर्दोआन ने 10 देशों के राजदूतों के बाहर करने की घोषणा की थी और इसे तुर्की के राष्ट्रवाद से जोड़ दिया था.

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आर्थिक पेच

अब एक टेलीविज़न संदेश में अर्दोआन ने कहा है, ''हमारा लक्ष्य संकट पैदा करना नहीं था बल्कि तुर्की की इज़्ज़त, गर्व और गरिमा की रक्षा करना है. राजदूतों की ओर से अब जो बयान आया है, उससे उनकी ग़लतियों को माफ़ करने का फ़ैसला लिया गया है. मेरा मानना है कि अब वे भविष्य में तुर्की की संप्रभुता को लेकर और सतर्क रहेंगे.''

48 घंटे के भीतर ही अर्दोआन का रुख़ बदल गया. कहा जा रहा है कि अंकारा के डिप्लोमैट अर्दोआन की घोषणा से चिंतित थे और उन्होंने पूरे मामले को ठीक से समझाने की कोशिश की.

अर्दोआन को समझाने की कोशिश की गई कि अगर जर्मनी, कनाडा, डेनमार्क, फ़िनलैंड, फ़्रांस, नीदरलैंड्स, न्यूज़ीलैंड, नॉर्वे, स्वीडन और अमेरिका के राजदूतों को निष्कासित किया गया तो अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा असर पड़ेगा और लीरा तो पहले ही कमज़ोर हो रहा है. तुर्की की मुद्रा लीरा में इस साल 20 फ़ीसदी की गिरावट आई है.

निवेशकों में अर्दोआन के आर्थिक प्रबंधन को लेकर भी चिंता है. सोमवार को लीरा एक अमेरिकी डॉलर की तुलना में 9.85 पर पहुँच गया. अगर इन दस देशों के राजदूतों को निष्कासित किया जाता तो लीरा में और गिरावट आने की आशंका थी.

https://twitter.com/USEmbassyTurkey/status/1452616273796419588

अर्दोआन ग़ुस्से में क्यों थे?

64 साल के ओस्मान कलावा तुर्की में पत्रकारों, एक्टिविस्टों और विपक्षी नेताओं के ख़िलाफ़ कार्रवाई के लिए सबसे लोकप्रिय बहाना बन गए हैं.

टर्किश समाज सेवी और एक्टिविस्ट ओस्मान कलावा को किसी भी अपराध में दोषी नहीं ठहराया गया है. तुर्की में वो पिछले चार साल से जेल में बंद हैं. 17 सितंबर को कांउसिल ऑफ़ यूरोप ने ओस्मान को जेल से बाहर करने की आख़िरी चेतावनी तुर्की को दी थी.

लेकिन तुर्की ने इस चेतावनी की अब तक उपेक्षा की है. 10 दिसंबर, 2019 को ही यूरोपीयन कोर्ट ऑफ़ ह्यूमन राइट्स ने कलावा को रिहा करने के पक्ष में फ़ैसला सुनाया था. कोर्ट ने कहा था कि कलावा की गिरफ़्तारी राजनीतिक है और उनके ख़िलाफ़ कोई सबूत नहीं है. तुर्की ने कहा था कि यूरोपीयन कोर्ट ऑफ़ ह्यूमन राइट्स का फ़ैसला अंतिम नहीं है. अब कई देश तुर्की पर कवाला को रिहा करने का दबाव डाल रहे हैं.

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18 अक्टूबर को तुर्की में जर्मनी, कनाडा, डेनमार्क, फ़िनलैंड, फ़्रांस, नीदरलैंड्स, न्यूज़ीलैंड, नॉर्वे, स्वीडन और अमेरिका के राजदूतों ने एक बयान जारी कर कहा था कि कवाला केस का तत्काल समाधान किया जाए.

साझा बयान में इन देशों ने कहा था कि तुर्की कांउसिल ऑफ़ यूरोप के फ़ैसले का सम्मान करे. इन देशों ने अपने बयान में कहा था, ''जाँच में देरी लोकतंत्र, क़ानून के राज और तुर्की की न्यायपालिका में पारदर्शिता के ख़िलाफ़ है.''

इसी बयान के जवाब में तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन ने 21 अक्टूबर को कहा था, ''मैंने अपने विदेश मंत्री से कहा है कि हम इन्हें इस हद तक बर्दाश्त नहीं कर सकते. आप हमें पाठ पढ़ा रहे हैं? आप हैं कौन? ख़ुद को क्या समझते हैं?'' इसके बाद इन दस देशों के राजदूतों को तुर्की के विदेश मंत्रालय ने समन भेजा था.

तुर्की का कहना है कि 2013 में सरकार विरोधी प्रदर्शन और 2016 के तख़्तापलट की कोशिश के पीछे कवाला की बड़ी भूमिका थी. अर्दोआन कवाला को 'आतंकवादी' कहते हैं.

10 देशों के राजदूतों के साझे बयान की प्रतिक्रिया में अर्दोआन ने ग़ुस्से में कहा था, ''तुर्की को पाठ पढ़ाने वाले आप कौन होते हैं? क्या आप अपने देशों में डकैतों, हत्यारों और आतंकवादियों को रिहा कर देंगे?''

शनिवार को अर्दोआन ने कहा था कि उन्होंने अपने विदेश मंत्री को 10 देशों के राजदूतों को 'अस्वीकार्य' घोषित करने का आदेश दिया है. लेकिन रविवार की रात तक इन दसों राजदूतों को औपचारिक रूप से कोई पत्र नहीं मिला.

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अर्दोआन ने क़दम पीछे क्यों खींचे?

अंकारा के राजनयिकों ने फ़ाइनैंशियल टाइम्स से कहा है कि तुर्की के विदेश मंत्री मेवलुत चाउसोलो, अर्दोआन के प्रवक्ता और उनके सलाहकार इब्राहिम कालिन ने राष्ट्रपति को समझाने की कोशिश की कि ये फ़ैसला तुर्की पर भारी पड़ सकता है. इनमें से कुछ देश तुर्की के बड़े कारोबारी साझेदार और नेटो के अहम सहयोगी हैं.

सोमवार की दोपहर तुर्की स्थित अमेरिकी दूतावास ने एक ट्वीट किया जिसमें लिखा गया था कि वियना कन्वेंशन के अनुच्छेद 41 को लेकर अमेरिका प्रतिबद्ध है.

इस अनुच्छेद में कहा गया है कि कोई राजनयिक वहाँ के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकता है. दूसरे देशों ने भी यही संदेश दिया या फिर अमेरिकी दूतावास के इस ट्वीट को रीट्वीट किया. इसके तुरंत बाद तुर्की की सरकारी समाचार एजेंसी अनादोलु ने कहा कि अर्दोआन ने इस बयान का स्वागत किया है.

लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि अर्दोआन के बयान से रिश्तों को जितना नुक़सान होना था, वो हो चुका है. तुर्की पश्चिमी देशों का पारंपरिक सहयोगी रहा है लेकिन अर्दोआन के सत्ता में आने के बाद से रिश्ते नाटकीय रूप से बदले हैं.

अर्दोआन अमेरिकी कांग्रेस में बाइडन प्रशासन से दर्जनों एफ़-16 लड़ाकू विमान ख़रीदने के लिए समर्थन जुटाने में भी लगे हुए हैं. इस हफ़्ते रोम में जी-20 देशों के समिट में अर्दोआन अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडन से मिल सकते हैं.

दूसरी तरफ़ बाइडन तुर्की में अर्दोआन सरकार को लेकर कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं. यहाँ तक कि सितंबर में जब अर्दोआन न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र की आम सभा को संबोधित करने गए तो उनकी मुलाक़ात भी बाइडन से नहीं हो पाई थी.

(कॉपी - रजनीश कुमार)

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