डोनाल्ड ट्रंप और किम जोंग उन की मुलाकात से आखिर क्या चाहता है चीन?
नई दिल्ली। नॉर्थ कोरिया के लिए अमेरिका जितना बड़ा दुश्मन है, चीन ने उतना ही मजबूती के साथ मित्रता निभाई है। नॉर्थ कोरिया का चीन एक पुराना दोस्त है, जो शुरू से ही हर संभव मदद करता रहा है। यहां तक कि किम जोंग उन ने डोनाल्ड ट्रंप से मुलाकात से पहले चीन जाकर शी जिनपिंग से राय ली। सिंगापुर मीटिंग में भले ही चीन को दूर रखा गया है, लेकिन इसमें समिट में शी जिनपिंग का बहुत बड़ा रोल है। सिंगापुर में ट्रंप-किम समिट पर पूरी दुनिया की नजर है, लेकिन चीन को बहुत आशाएं हैं।

सीमा पर परमाणु खौफ नहीं चाहता चीन
एक शब्द में कहे तो, स्थिरता। चीन भले ही नॉर्थ कोरिया का मजबूत सहयोगी रहा है, लेकिन बीजिंग बिल्कुल नहीं चाहता की उनके आस-पास या बॉर्डर पर किसी भी प्रकार का तनाव पैदा हो। चीन निश्चित रूप से अपनी सीमा पर और अधिक परमाणु अस्थिरता नहीं चाहता है। एक चीन ही है, जो नॉर्थ कोरिया के पागलपन और किम के सनक को बहुत अच्छे से जानता और समझता है। चीन भली भांति जानता है कि कब वॉर ऑफ वर्ड्स सैन्य लड़ाई में तब्दील हो जाए। चीन बिल्कुल नहीं चाहता कि उनके पड़ोसी देश पर कोई दूसरा मुल्क आकर अटैक कर खौफ पैदा करे।
चीन को चाहिए सिर्फ व्यापार
पिछले साल 2017 में नॉर्थ कोरिया ने 15 से ज्यादा मिसाइलें लॉन्च कर कोरिया प्रायद्वीप में खतरनाक तनाव पैदा किया था। उसके बाद पिछले साल ही नवंबर में यूएन ने नॉर्थ कोरिया पर भारी आर्थिक प्रतिबंध लगाकर किम जोंग उन के साम्राज्य की कमर तोड़ने का किया था। वहीं, दूसरी ओर चीन और नॉर्थ कोरिया के बीच ना सिर्फ रणनीतिक बल्कि बहुत अच्छे व्यापारिक संबंध भी है। हालांकि, यूएन के प्रतिबंधों के बाद भी बीच-बीच में खबरे आई थी कि चीन चोरी-छुपे नॉर्थ कोरिया के साथ व्यापार कर रहा है। वहीं, चीन ने भी नॉर्थ कोरिया के खिलाफ ऐसा कोई कदम नहीं उठाया, जिससे की दोनों देशों को भारी व्यापारिक नुकसान हो। चीन अपने पड़ोसी मुल्क के साथ परमाणु खौफ से भी ज्यादा अपनी अर्थव्यवस्था को लेकर चिंतित है।












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