अराजकता की तरफ अमेरिकी लोकतंत्र! भारत को ज्ञान देना बंद कर US को अपनी गिरहेबां में क्यों झांकना चाहिए?

Trump assassination attempt: अमेरिका के 45वें राष्ट्रपति की हत्या की कोशिश की है और अमेरिका के संभावित 47वें राष्ट्रपति की जान हत्या की कोशिश में बच गई है। जी हां, हम बात कर रहे हैं, डोनाल्ड ट्रंप की, जिनके ऊपर जानलेवा हमला किया गया, लेकिन एक गोली उनके कान को छूती गुजर गई और डोनाल्ड ट्रंप की जान बच गई है।

इसके साथ ही, इस हमले ने अमेरिका के लोगों को एक बार फिर से इस बात की याद दिलाई है, कि राजनीतिक हिंसा अमेरिकी लोकतंत्र के लिए कितना बड़ा खतरा है। और दूसरे देशों को अकसर ज्ञान देने वाला अमेरिका, अपने गिरहेबां में क्यों नहीं झांकता है?

donald trump assassination attempt

ये खुशकिस्मती की बात है, पिट्सबर्ग के उत्तर में पेनसिल्वेनिया के शहर बटलर में शाम को आयोजित एक चुनावी रैली में फायरिंग के बाद डोनाल्ड ट्रम्प को गोली लगने से गंभीर चोट नहीं आई, लेकिन अमेरिका के लिए ये गिरहेबां में झांकने का वक्त है, कि दूसरे देशों की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर बार बार बोलने वाला अमेरिका अपने देश के नेताओं की रक्षा करने में नाकाम हो जाता है।

खासकर जब अमेरिका भारत जैसे महान लोकतांत्रिक व्यवस्था पर टिप्पणी करने की हिमाकत करता है, जहां लाखों लोगों की रैलियों की नेता संबोधित करते हैं और एक दो घटनाओं को छोड़कर आज तक किसी भी नेता पर हमला नहीं हुआ है।

जबकि, इसी अमेरिका में करीब पांच साल पहले डोनाल्ड ट्रंप के समर्थकों ने उनके चुनाव हारने के बाद अमेरिका के संसद भवन कैपिटल हिल पर ही कब्जा करने की कोशिश की थी। 5 जनवरी 2021 की कैपिटल हिल पर ट्रंप समर्थकों के उत्पात को भला कैसे ये दुनिया भूल सकती है।

क्या अपनी गिरहेबां में झांककर देखेगा अमेरिका?

अमेरिका में कम से कम 25 राष्ट्रपतियों या पूर्व-राष्ट्रपतियों की या तो हत्या की गई या फिर हत्या की कोशिश की गई, लेकिन आजादी के बाद के भारत के इतिहास को देखें, तो सिर्फ एक प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की दु:खद हत्या की गई और एक पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की भी जान एक घातक बम धमाके में ली गई।

हालांकि, अभी तक बंदूकधारी के मकसद के बारे में कुछ भी जानकारी सामने नहीं आई है, जिसकी जांच फिलहाल हत्या की कोशिश के रूप में की जा रही है। लेकिन इतना तो साफ है, कि हिंसा के जरिए चुनाव पर असर डालने की कोशिश की गई है। अमेरिका को ये समझना होगा, कि हिंसा लोकतंत्र के जड़ को खत्म कर देती है, लिहाजा अमेरिकियों को हमेशा अपने मतभेदों को दूर करने के लिए गोलियों के बजाय मतपत्रों का इस्तेमाल करना चाहिए।

इसमें कोई शक नहीं, कि पिछले राष्ट्रपति चुनाव के बाद से ही अमेरिका का समाज दो हिस्सों में बंट गया है। डोनाल्ड ट्रंप के समर्थकों मानना है, कि उन्हें हटाने के लिए साजिश रची गई है, लिहाजा पिछले चुनाव से ही रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक पार्टी के बीच तनाव है। समर्थक डोनाल्ड ट्रंप को मसीहा मानते हैं और अब आशंका इस बात की है, कि अमेरिका में होने वाला ये चुनाव भी जहरीला हो रसकता है।

अब दोनों दलों के राजनीतिक नेताओं और व्यक्तिगत रूप से और सामूहिक रूप से अमेरिकियों पर यह दायित्व है कि वे हिंसा और उसे बढ़ावा देने वाली चरमपंथी भाषा के प्रसार को रोकें। शनिवार के हमले को उकसावे या औचित्य के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए। अमेरिकियों को भी इस देश के सामने आने वाली चुनौतियों के बारे में स्पष्ट रूप से पता होना चाहिए। शनिवार की घटनाओं को अपवाद के रूप में नहीं लिखा जा सकता। हिंसा अमेरिकी राजनीतिक जीवन को संक्रमित और प्रभावित कर रही है।

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है, कि इस हमले का इस्तेमाल डोनाल्ड ट्रंप राजनीतिक फायदा लेने के लिए करेंगे और जो बाइडेन का चुनावी कैम्पेन, जो पहले ही उनके बुढ़ापे की वजह से सवालों में है, उसे और कमजोर कर सकता है।

लिहाजा दोनों दलों के राजनीतिक नेताओं और हर एक आम अमेरिकियों पर यह दायित्व आ गया है, कि वे हिंसा और उसे बढ़ावा देने वाली चरमपंथी भाषा के प्रसार को रोकें। अमेरिका की राजनीति पिछले कुछ सालों में जितनी विभाजित हो गई है, उतनी शायद गृहयुद्ध के समय ही थी, लिहाजा अमेरिकियों को भी देश के सामने आने वाली चुनौतियों को गंभीरता से लेनी चाहिए। शनिवार की घटनाओं को हल्के में नहीं लिया जा सकता है, क्योंकि अगर डोनाल्ड ट्रंप को गोली लगती और अगर हमलावर अपने मकसद में कामयाब होता, तो अमेरिका को गृहयुद्ध में फंसने से कोई नहीं रोक सकता था।

ये राजनीतिक हिंसा, अमेरिकी राजनीतिक जीवन को संक्रमित और प्रभावित कर रही है।

डोनाल्ड ट्रंप को पहले ही राजनीति तौर पर निशाना बनाया गया है और अलग अलग मुकदमों में उनके नाम हैं। वहीं, हश मनी मामले में उन्हें दोषी भी ठहराया जा चुका है, जिसमें सजा का ऐलान होना बाकी है।

हिंसा से जूझता रहा है अमेरिका का लोकतंत्र

हिंसा की घटनाएं लंबे समय से अमेरिकी लोकतंत्र को लाल करती रही हैं, लेकिन हाल ही में वे और भी बड़ी और गहरी हो गई हैं। सांस्कृतिक और राजनीतिक ध्रुवीकरण, सब्जियों की तरह बंदूकों की उपलब्धता और इंटरनेट की कट्टरपंथी शक्ति, सभी इस लोकतंत्र को हिंसक बनाने में तुले हैं।

ये शक्तियां अमेरिका लोकतंत्र को ना सिर्फ बुरी तरह से विभाजित कर रही हैं, बल्कि उनके शांतिपूर्ण समाधान के लिए बतौर राष्ट्र अमेरिका की प्रतिबद्धता पर भी असर डालते हैं।

अमेरिका की राजनीति कितनी हिंसक बन रही है, इसका उदाहरण पिछले महीन ही शिकागो प्रोजेक्ट ऑन सिक्योरिटी एंड थ्रेट्स के सर्वे से पता चलता है। इस सर्वे में 10 प्रतिशक रिस्पाउंडर ने सहमति जताई, कि डोनाल्ड ट्रंप को दोबारा राष्ट्रपति बनने से रोकने के लिए बल प्रयोग करना सही है और 7 प्रतिशत रिस्पाउंडर ने कहा, कि ट्रम्प को राष्ट्रपति पद पर वापस लाने के लिए बल का प्रयोग उचित है।

डोनाल्ड ट्रम्प के राजनीतिक एजेंडे का विरोध का जवाब हिंसा नहीं हो सकता है। इसे हिंसा के जरिए आगे नहीं बढ़ाया जा सकता और न ही ऐसा किया जाना चाहिए, खासकर अमेरिका के लिए, जो यकीनन लोकतांत्रिक दुनिया के लिए एक उम्मीद है और यही वजह है, कि अमेरिका को दूसरे देशों की लोकतंत्र पर टिप्पणी करने से पहले, अपने घर को साफ करना चाहिए।

डोनाल्ड ट्रंप पर हुआ हमला अमेरिकी समाज और लोकतंत्र के लिए एक त्रासदी है और अब अमेरिका के सामने सबसे बड़ी चुनौती ये है, कि वो इस घटना को एक बड़ी त्रासदी बनने से रोके। और अमेरिका का लोकतंत्र कैसा होगा, ये अमेरिका को वोटर्स अपने वोटों की ताकत से तय करें, ना कि बंदूक से।

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