ट्रंप और किम की मुलाक़ात, ऐसा मौक़ा जिसे दोनों खोना नहीं चाहेंगे
अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के साथ मुलाक़ात होना किम जोंग-उन के लिए एक बड़ी उपलब्धि है. यही वजह है कि उन्होंने अभी तक अपनी तरफ़ से कोई मांग नहीं रखी है.
किम जोंग-उन ने अपने दो परमाणु परीक्षण केंद्रों को खुद ही नष्ट कर दिया है. साथ ही उन्होंने तीन अमरीकी नागरिकों को भी रिहा कर दिया है.
अब उन्हें दुनिया के सबसे बड़े और ताक़तवर देश के नेता के साथ मुलाक़ात का मौक़ा मिल रहा है.
एक तरह से देखें तो जो उत्तर कोरिया पूरी दुनिया से बिलकुल अलग-थलग रहता था और आज वह पूरी दुनिया की राजनीति का केंद्र बन गया है.
हम हिंदी और उर्दू में किम जोंग-उन के बारे में बात कर रहे हैं, यही उनकी सबसे बड़ी कामयाबी है.
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ट्रंप की विदेश नीति में बदलाव
दूसरी तरफ़ अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के लिए यह मुलाक़ात पूरी दुनिया के सामने अपना एक और खुला प्रदर्शन करने का मौक़ा है.
वो अपने विरोधियों को इस मुलाक़ात के ज़रिए यह बताना चाहते हैं कि ट्रंप कुछ सकारात्मक भी कर सकते हैं. अभी तक तो उनकी विदेश नीति सिर्फ़ तोड़-फोड़ की ही रही है. वो जी-7 सम्मेलन में गए, वहां उन्होंने बातचीत ख़त्म कर दी. उन्होंने पेरिस जलवायु समझौते से खुद को बाहर कर लिया, नेटो को भी कमज़ोर कर दिया.
एक तरह से देखें तो ट्रंप की विदेश नीति अभी तक वैश्विक संवाद और नियमों को ख़त्म करने वाली ही प्रतीत होती है, लेकिन अब इस मुलाक़ात के बाद यह संदेश जाएगा कि ट्रंप भी दुनिया में शांति स्थापित करने की तरफ़ क़दम बढ़ा रहे हैं.
इतना ही नहीं पिछले तीन-चार महीनों से जब से ट्रंप ने किम जोंग-उन के साथ वार्ता की पहल का समर्थन किया है तब से उनके समर्थक यह भी कहने लगे हैं कि उन्हें नोबेल पुरस्कार दिया जाना चाहिए.
यह देखना होगा कि दोनों नेताओं की मुलाक़ात के दौरान जो असल मुद्दें हैं उन पर कितनी बात होती है, अभी इसका अनुमान लगा पाना बहुत मुश्किल है.
मुझे तो इस बात का भी डर है कि कहीं ट्रंप अपनी अच्छी छवि बनाने के लिए उत्तर कोरिया को बहुत अधिक छूट ना दे दें.
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क्या मील का पत्थर साबित होगी ये मुलाक़ात?
हम अपना ही इतिहास देखें तो एक बार पाकिस्तान के राष्ट्रपति जिआ-उल-हक़ क्रिकेट मैच देखने भारत आ गए थे. तो दोनों तरफ़ बहुत अधिक उत्सुकता पैदा हो गई थी.
फिर अटल बिहारी वाजपेयी चुनाव जीतने के बाद एक बार पाकिस्तान चले गए थे. नरेंद्र मोदी भी गए थे.
इस तरह के चंद ख़ुशफ़हमी भरे मौक़े होते रहते हैं, लेकिन इनका कोई ठोस नतीजा देखने को नहीं मिलता.
इसीलिए लोग कह रहे हैं कि कहीं ट्रंप और किम की ये मुलाक़ात वैसा ही मौक़ा हो सकता है जैसा 1970 में हुआ था, जब अमरीकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन चीन गए थे तो पूरी की पूरी अंतरराष्ट्रीय राजनीति उलट गई थी.
निक्सन के चीन जाने से पहले अमेरिका ताइवान को ही चीन समझता था, लेकिन उनकी यात्रा के बाद इसमें बदलाव आया.
वहीं चीन और सोवियत संघ के बीच जो गठजोड़ बन रहा था, उन्होंने उसे भी तोड़ दिया था.
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गंभीर चिंतक और विश्लेषक अमरीका की तरफ़ से यही दो महत्वपूर्ण सवाल पूछ रहे हैं, एक तो यह कि उत्तर कोरिया चीन पर काफी निर्भर है, क्या अमरीका उत्तर कोरिया को चीन से अलग कर पाएगा और दूसरा ये कि क्या वह उत्तर और दक्षिण कोरिया को एकजुट कर पाएगा.
अगर ऐसा होता है तो अमरीका की सेना बिलकुल चीन की सीमा तक पहुंच जाएगी. दूसरी बात यह है कि अगर उत्तर कोरिया परमाणु निरस्त्रीकरण की तरफ़ बढ़ जाता है तो पूरे इलाक़े में अमरीका के लिए यह बहुत बड़ी जीत होगी.
वहीं उत्तर कोरिया की तरफ़ से यह चिंता रहेगी कि क्या इस मुलाक़ात के बाद अमरीका उत्तर कोरिया पर लगे आर्थिक प्रतिबंध हटाएगा.
साथ ही दक्षिण कोरिया में अमरीका की जो सैन्य टुकड़ियां मौजूद हैं वो वहां से बाहर चली जाएंगी.
ये सवाल बेहद अहम हैं और ये एक या दो मिनट की मुलाक़ात में हल होने वाले नहीं है. साथ ही दोनों नेताओं के मिजाज़ का भी इस मुलाक़ात पर बहुत असर पड़ेगा. अभी तक तो दोनों नेताओं के रवैए में स्थिरता कम दिखती है.
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क्या वर्चस्व की व्यवस्था में आएगा बदलाव?
कोई वैश्विक व्यवस्था तैयार करने के लिए एक दूरगामी नज़रिया होना बेहद ज़रूरी है. 1950 में अमरीका के पास दुनिया की 50 फ़ीसदी जीडीपी थी, यानी पूरी दुनिया में जो कुछ भी बनता था उसका 50 प्रतिशत सिर्फ़ अमरीका में बनता था. यही वजह है कि उन्होंने पूरी दुनिया में इतना अधिक निवेश किया.
अभी अमरीका का वर्चस्व नज़र आता है, उन्होंने ऐसी व्यवस्था तैयार की जिसमें सभी तरक्क़ी कर सकें.
दूसरे देशों ने हालांकि उस तरह कोई निवेश नहीं किया लेकिन इसका फायदा उन्हें ज़रूर मिला.
लेकिन अब इसमें बदलाव आ रहा है और अमरीका चाह रहा है कि वह इस व्यवस्था से अपना फ़ायदा किस तरह निकाल सके. और अगर ट्रंप ऐसा चाहते हैं तो इसमें बुराई नहीं है.
मौजूदा वक़्त में अमरीका दुनिया का महज 16 या 17 प्रतिशत जीडीपी का हिस्सा ही अपने पास रखता है, इसलिए अब उनका वर्चस्व पहले जितना प्रभावी नहीं रहा है.
चीन अपने 'वन बेल्ट वन रोड परियोजना' से अब इसको प्रत्यक्ष तौर पर ख़त्म करने की कोशिश कर रहा है और चीन की अर्थव्यवस्था भी बड़ी हो रही है. किम के साथ इस मुलाक़ात के बहाने ट्रंप की पॉपुलेरिटी एक सप्ताह के लिए तो बढ़ेगी ही साथ ही कुछ कारगर निकला को उनका नाम भी होगा.












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